आज पूरी दुनिया एक गंभीर ऊर्जा संकट (Energy Crisis) से जूझ रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आए उछाल ने विकसित देशों से लेकर उभरती अर्थव्यवस्थाओं तक की कमर तोड़ दी है। जहां एक ओर यूरोप और एशिया के संपन्न देशों में पेट्रोल (Petrol) की कीमतें आसमान छू रही हैं, वहीं भारत में स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत बनी हुई है। आंकड़ों पर नजर डालें तो दुनिया के कई देशों में पिछले कुछ महीनों में पेट्रोल के दामों में 20% से 35% तक की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जबकि भारत में 28 फरवरी के बाद से कीमतों में स्थिरता देखी गई है।
दुनिया के आंकड़ों में 'पेट्रोल की आग'
वैश्विक स्तर पर पेट्रोल की कीमतों की तुलना करें तो हॉन्गकॉन्ग इस सूची में सबसे ऊपर है, जहां एक लीटर पेट्रोल के लिए लोगों को ₹295 तक चुकाने पड़ रहे हैं। यहां फरवरी के बाद से कीमतों में 25% का उछाल आया है। इसी तरह सिंगापुर में पेट्रोल ₹240 और नीदरलैंड में ₹225 प्रति लीटर तक पहुंच गया है। विकसित यूरोपीय देशों जैसे नॉर्वे, जर्मनी, फ्रांस और यूके में भी कीमतें ₹195 से ₹215 के बीच झूल रही हैं। इन देशों में बढ़ोतरी की दर 22% से लेकर 30% तक रही है। सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा स्पेन और जापान का है, जहां कीमतों में 34% और 35% तक की वृद्धि हुई है।
| देश | पेट्रोल कीमत (₹/लीटर) | बढ़ोतरी (28 फरवरी के बाद) |
| हॉन्गकॉन्ग | ₹295 | +25% |
| सिंगापुर | ₹240 | +30% |
| नीदरलैंड | ₹225 | +28% |
| नॉर्वे | ₹215 | +24% |
| इटली | ₹210 | +30% |
| जर्मनी | ₹205 | +27% |
| फ्रांस | ₹200 | +25% |
| UK | ₹195 | +22% |
| इज़राइल | ₹185 | +30% |
| स्पेन | ₹175 | +34% |
| जापान | ₹160 | +30–35% |
| दक्षिण कोरिया | ₹150 | +30% |
| भारत | ₹95 | 0% |
भारत में राहत का 'भंडार'
इन वैश्विक आंकड़ों के बीच भारत की तस्वीर काफी सुकून देने वाली है। जहां दक्षिण कोरिया जैसे पड़ोसी देशों में पेट्रोल ₹150 और इजराइल में ₹185 मिल रहा है, वहीं भारत के प्रमुख शहरों में औसत कीमत अब भी 95 के आसपास बनी हुई है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 28 फरवरी के बाद से, जब दुनिया भर में कीमतें 30% तक बढ़ीं, भारत में बढ़ोतरी का आंकड़ा 'शून्य' (0%) रहा है। यह तुलना दर्शाती है कि वैश्विक उथल-पुथल के बावजूद भारतीय उपभोक्ताओं को ईंधन की महंगाई से बचाने के लिए प्रभावी कदम उठाए गए हैं।
कैसे मुमकिन हुई यह स्थिरता?
भारत में पेट्रोल की कीमतों के स्थिर रहने के पीछे कई रणनीतिक कारण हैं। सरकार ने अंतरराष्ट्रीय बाजार से कच्चे तेल की खरीद के लिए अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। रियायती दरों पर कच्चे तेल का आयात और 'एनर्जी सिक्योरिटी' पर ध्यान केंद्रित करने से कीमतों को नियंत्रित करने में मदद मिली है। इसके अलावा, केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा समय-समय पर टैक्स (Excise Duty और VAT) में की गई कटौती ने भी आम आदमी की जेब पर बोझ नहीं बढ़ने दिया। जहां दुनिया के अन्य देश बढ़ती लागत का पूरा भार जनता पर डाल रहे हैं, वहीं भारत ने इसे एक 'बफर' के जरिए मैनेज किया है।
अर्थव्यवस्था पर इसका असर
पेट्रोल और डीजल की कीमतें किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के लिए 'पहिए' का काम करती हैं। जब ईंधन महंगा होता है, तो परिवहन लागत बढ़ती है, जिससे फल, सब्जी और अनाज जैसी बुनियादी चीजें भी महंगी हो जाती हैं। दुनिया के कई देश इस समय इसी 'महंगाई के चक्र' (Inflation Loop) में फंसे हुए हैं। भारत में ईंधन की कीमतों के स्थिर रहने का सीधा लाभ यह हुआ है कि यहां महंगाई दर अन्य देशों के मुकाबले काफी हद तक नियंत्रण में है। इससे न केवल आम नागरिकों को राहत मिली है, बल्कि लॉजिस्टिक्स और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को भी मजबूती मिली है।
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