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FD कहकर बेच दी इंश्योरेंस पॉलिसी? अब कैसे मिलेगा पैसा वापस

अगर किसी एजेंट या बैंक ने गलत जानकारी देकर आपको इंश्योरेंस पॉलिसी बेच दी है, तो आप इसके खिलाफ शिकायत कर सकते हैं। इसके लिए सबसे पहले बीमा कंपनी के शिकायत निवारण सिस्टम में अपनी शिकायत दर्ज करानी चाहिए, और वहां से राहत न मिलने पर आप बीमा लोकपाल के पास अपना मामला ले जा सकते हैं।

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Insurance Policy Mis Selling

जरा सोचकर देखिए, आप अपनी मेहनत की कमाई को सुरक्षित रखने और उस पर ब्याज कमाने के लिए बैंक में फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) कराने जाते हैं। वहां बैंक का कोई कर्मचारी या एजेंट आपको बातों में उलझाकर कहता है कि FD से भी बेहतर एक नई निवेश स्कीम आई है, जिसमें आपको ज्यादा फायदा और गारंटीड रिटर्न मिलेगा। आप उन पर भरोसा करके साइन कर देते हैं, लेकिन बाद में जब कागजात घर आते हैं, तो पता चलता है कि जिसे आप सुरक्षित निवेश समझ रहे थे, वह असल में एक महंगी इंश्योरेंस पॉलिसी है।

फाइनेंस की भाषा में ऐसे मामलों को 'इंश्योरेंस मिस-सेलिंग' (Insurance Mis-selling) कहा जाता है। आज के समय में देश के भीतर ऐसे मामले बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं, जहां सीधे-साधे ग्राहकों को चूना लगाया जाता है। हालांकि, भारतीय कानून और रेगुलेटर्स ग्राहकों को इसके खिलाफ शिकायत करने और अपना पूरा पैसा वापस पाने का अधिकार देते हैं, लेकिन जागरूकता की कमी के कारण लोग समझ ही नहीं पाते कि उन्हें आगे क्या कदम उठाना चाहिए।

क्या है मिस सेलिंग?

सरल शब्दों में कहें तो जब किसी ग्राहक को गलत या अधूरी जानकारी देकर, धोखे से या किसी दूसरे फाइनेंशियल प्रोडक्ट के नाम पर इंश्योरेंस पॉलिसी थमा दी जाती है, तो उसे मिस-सेलिंग कहते हैं। इसके तहत बैंक में एफडी के नाम पर इंश्योरेंस बेचना, मैच्योरिटी पर मिलने वाले रिटर्न को लेकर झूठे और बड़े-बड़े दावे करना, पॉलिसी से जुड़े जोखिमों और कड़े नियमों को छिपाना, या फिर प्रीमियम और लॉक-इन पीरियड की सही जानकारी न देना शामिल है। कानूनन, इंश्योरेंस और फिक्स्ड डिपॉजिट दो बिल्कुल अलग चीजें हैं।

किसी भी ग्राहक को कोई भी पॉलिसी बेचने से पहले यह साफ-साफ बताना जरूरी है कि वह असल में कौन सा प्रोडक्ट खरीद रहा है, उसे कितने सालों तक और कितना प्रीमियम देना होगा, उसके क्या फायदे हैं और उसमें क्या जोखिम छिपे हैं। अगर इनमें से कोई भी बात छिपाई गई है, तो ग्राहक उस बिक्री प्रक्रिया को सीधे अदालत या अथॉरिटी में चुनौती दे सकता है।

मिस सेलिंग के शिकार हो जाएं तो क्या करें?

अगर आप भी ऐसी किसी धोखाधड़ी या मिस-सेलिंग के शिकार हो गए हैं, तो आपको तुरंत कुछ जरूरी कदम उठाने चाहिए। सबसे पहले पैनिक होने के बजाय अपने पक्ष को मजबूत करने के लिए सभी जरूरी सबूत इकट्ठा करें। इन सबूतों में आपके पॉलिसी के ओरिजिनल डॉक्यूमेंट्स, बैंक या एजेंट के साथ हुई कोई भी लिखित बातचीत, व्हाट्सएप मैसेज, ईमेल, प्रीमियम की रसीदें और यदि आपके पास कोई कॉल रिकॉर्डिंग उपलब्ध हो, तो उसे संभाल कर रख लें। ये सभी सबूत यह साबित करने में सबसे अहम भूमिका निभाते हैं कि आपको जो पॉलिसी बेची गई, उसका आधार पूरी तरह झूठा था।

इसके बाद, आपको सबसे पहले संबंधित बीमा कंपनी के 'ग्रीवांस रिड्रेसल मैकेनिज्म' (शिकायत निवारण सिस्टम) में अपनी लिखित शिकायत दर्ज करानी होगी। अपनी शिकायत में पूरी कहानी साफ-साफ लिखें कि बैंक में आपको क्या कहकर फंसाया गया था और असल में पॉलिसी की शर्तें क्या निकलीं।

यदि बीमा कंपनी आपकी शिकायत मिलने के बाद भी कोई संतोषजनक समाधान नहीं देती है या आपकी बात को अनसुना कर देती है, तो आप अपने मामले को आगे बढ़ा सकते हैं। ऐसी स्थिति में ग्राहकों के पास 'इंश्योरेंस ओम्बड्समैन' (बीमा लोकपाल) के पास जाने का कानूनी अधिकार होता है। ओम्बड्समैन एक स्वतंत्र संस्था है जो इस बात की निष्पक्ष जांच करती है कि क्या पॉलिसी बेचते समय ग्राहक को पूरी जानकारी दी गई थी या नहीं, और क्या कंपनी ने नियमों का पालन किया है। अगर लोकपाल की जांच में यह साबित हो जाता है कि ग्राहक के साथ सचमुच मिस-सेलिंग हुई है, तो वह तुरंत पॉलिसी को कैंसिल करने और ग्राहक का पूरा पैसा ब्याज समेत रिफंड करने का आदेश जारी कर सकता है।

Richa Tripathi
रिचा त्रिपाठीauthor

रिचा त्रिपाठी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में बिजनेस डेस्क पर सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। मीडिया इंडस्ट्री में 7 वर्षों के अनुभव के साथ रिचा, पर्सनल फाइनेंस, स्टॉक मार्केट, टैक्स प्लानिंग और अर्थव्यवस्था से जुड़े विषयों पर मजबूत पकड़ रखती हैं। अब तक 8,000 से अधिक कंटेंट लिख चुकी रिचा की विशेषता है—जटिल वित्तीय जानकारियों को सरल, स्पष्ट और भरोसेमंद तरीके से पाठकों तक पहुंचाना। वह ऐसी स्टोरीज तैयार करती हैं जो न केवल जानकारीपूर्ण होती हैं, बल्कि आम पाठक की वित्तीय समझ को बेहतर बनाने में भी मदद करती हैं।

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