Times Now Navbharat
live-tv
Premium

Dollar vs Rupee : सिर्फ युद्ध नहीं, 5 'विलेन' और हमारी 3 आदतों से घुटने टेकने को मजबूर हुआ रुपया

Dollar vs Rupee की लड़ाई में रुपया पिछले 3 सालों से पिट रहा है। अमेरिका-ईरान युद्ध ने तो बस उन असल वजहों को उजागर किया है, जिनकी वजह से रुपया पिछले तीन साल से लगातार गिरता चला जा रहा है।

Image
तीन साल में फॉरेक्स बढ़ा, लेकिन रुपये की कमजोरी ने बढ़ाया दबाव
Authored by: Yateendra Lawaniya
Updated May 15, 2026, 13:12 IST
Follow on Google News

Dollar vs Rupee : अमेरिकी डॉलर के सामने भारतीय रुपया पिछले तीन साल से लगातार कमजोर हो रहा है। आज जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विदेशी मुद्रा भंडार को बचाने की अपील की है। कंपनियां Diesel, Petrol, CNG, PNG और LPG के दाम बढ़ रही हैं, तो हमें भी इस कमजोरी का एहसास हो रहा है। लेकिन, जब पीछे मुड़कर देखते हैं, और सोचते हैं कि रुपया क्यों गिर रहा है (Rupee Kyu Gir Raha Hai) तो साफ पता चलता है कि डॉलर के सामने रुपये का यह संघर्ष नया नहीं है। बल्कि, तीन साल में हर रोज तिल-तिल करते हुए आज रुपया घुटने टेकता दिख रहा है।

जब भी हम डॉलर के मुकाबले रुपये को गिरते हुए देखते हैं, तो अक्सर हमारा ध्यान रूस-यूक्रेन युद्ध या इजराइल संकट की ओर चला जाता है। हमें लगता है कि दुनिया में कहीं बम चल रहे हैं, इसलिए हमारी करेंसी कमजोर हो रही है। लेकिन रुपये की इस लाचारी की कहानी दूसरे देशों के बॉर्डर पर नहीं, बल्कि पिछले 3 सालों से हमारे बाजारों और हमारी पसंद-नापसंद की आदतों ने लिखी है।

आंकड़े दिखा रहे आईना

आंकड़े बताते हैं कि रुपये की कमजोरी और हमारी गुल्लक यानी विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserve) अपेक्षा के हिसाब से नहीं भर पाने के पीछे सिर्फ बाहरी झटके नहीं, बल्कि एक गहरी 'स्ट्रक्चरल समस्या' है। यह एक ऐसा सी-सॉ (झूला) है, जहां डॉलर आने का रास्ता संकरा हो गया है और बाहर जाने का रास्ता हाईवे बन चुका है। आइए समझते हैं उस 'इनसाइड स्टोरी' को, जो बताती है कि आखिर क्यों हमारा रुपया बार-बार डॉलर के आगे घुटने टेकने पर मजबूर है।

डॉलर बाहर भेज रहीं हमारी ये 3 आदतें

अर्थव्यवस्था केवल कागजों पर नहीं चलती, वह आपकी और हमारी पसंद से चलती है। भारतीयों की तीन ऐसी आदतें हैं, जिन्होंने डॉलर की डिमांड को इतना बढ़ा दिया कि रुपया बेबस हो गया। जाहिर है कि यह एक दिन में नहीं हुआ है। लेकिन, जब पानी नाक तक पहुंच गया है, तो हालात की गंभीरता दिखने लगी है।

1. सोने के प्रति 'अंधाधुंध' मोह : भारत में सोना सिर्फ गहना नहीं, भावना है। लेकिन, अर्थशास्त्र की भाषा में यह एक 'डेड इन्वेस्टमेंट' है, जो भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में रखे डॉलर को लील रहा है। भारत अपनी जरूरत का लगभग पूरा सोना विदेशों से आयात करता है। जब, आप शादी या निवेश के लिए सोना खरीदते हैं, तो भारत सरकार को उसके बदले अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर चुकाने पड़ते हैं।

पिछले 3 सालों में गोल्ड इंपोर्ट ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं, जिससे भारी मात्रा में डॉलर देश से बाहर चला गया। गोल्ड के लिए हमारा मोह कितना बड़ा है, ये इस बात से समझा जा सकता है कि भारत के आम लोगों के पास करीब 40 हजार टन गोल्ड रखा है। यह G 20 देशों के केंद्रीय बैंकों के पास मौजूद करीब 25 हजार टन सोने से करीब दोगुना है।

2. 'रिवेंज टूरिज्म' और विदेशी यात्राओं का क्रेज : कोरोना के बाद भारतीयों में विदेश घूमने की एक नई लहर आई है। चाहे वेकेशन हो, पढ़ाई हो या इलाज, भारतीय अब विदेशों में जमकर खर्च कर रहे हैं। जब आप पेरिस या दुबई में अपना क्रेडिट कार्ड स्वाइप करते हैं, तो आप अनजाने में देश के डॉलर भंडार पर बोझ बढ़ा रहे होते हैं। टूरिज्म आउटफ्लो इतना बढ़ चुका है कि अब यह सर्विस सेक्टर से होने वाली कमाई को भी छोटा दिखाने लगा है।

3. विदेशी ब्रांड्स और महंगे गैजेट्स की बढ़ती भूख : हमें हाथ में आईफोन चाहिए, पैर में एडिडास और घर में विदेशी तकनीक। भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स का आयात कच्चे तेल के बाद दूसरे सबसे बड़े बोझ के रूप में उभरा है। हम जितना ज्यादा विदेशी सामान मंगवाते हैं, उतनी ही ज्यादा डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होता जाता है।

Dollar vs Rupee Infograph

Dollar vs Rupee Infograph

5 'विलेन' जिन्होंने रुपये को किया लहूलुहान

हमारी इन तीन व्यक्तिगत आदतों के दम पर 5 बड़े आर्थिक कारण (विलेन) ऐसे हैं, जो पर्दे के पीछे से भारतीय करेंसी की ताकत को दीमक की तरह चाट रहे हैं। मोटे तौर पर हमारी आदतों से ही इन पांच विलेन को ताकत मिल रही है।

1. बेलगाम व्यापार घाटा : Trade Deficit भारत की इकोनॉमी के लिए एक बड़ा विलेन है। हम दुनिया को बेचते कम हैं और खरीदते ज्यादा हैं। कच्चा तेल (Crude Oil) और सोना (Gold) हमारी सबसे बड़ी कमजोरी हैं। जैसे ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ती हैं, हमें ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। यह 'मर्चेंडाइज ट्रेड डेफिसिट' पिछले कुछ सालों में इतना बढ़ा है कि इसने पूरी अर्थव्यवस्था का बैलेंस बिगाड़ दिया है।

2. विदेशी निवेश का बदलता मिजाज : फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) को 'स्थिर पैसा' माना जाता है, लेकिन हालिया ट्रेंड चौंकाने वाले हैं। नई विदेशी कंपनियां भारत आने में संकोच कर रही हैं, जबकि पुरानी कंपनियां अपना मुनाफा (Profit) निकालकर अपने देश वापस ले जा रही हैं। नया डॉलर आ नहीं रहा, और जो यहां है, वह मुनाफे की शक्ल में बाहर जा रहा है। इसके पीछे टैक्स, ग्रोथ और डॉलर बनाम रुपये का गणित है।

3. 'हॉट मनी' की धोखेबाजी : विदेशी संस्थागत निवेशक (FII/FPI) भारतीय बाजार में उस पंछी की तरह हैं, जो ग्रोथ का दाना देखते ही आ जाते हैं, लेकिन जैसे कोई इकोनॉमिक आहट होती है, तुरंत फुर्र हो जाते हैं। अमेरिकी फेडरल रिजर्व, जब भी ब्याज दरें बढ़ाता है, तो ये निवेशक भारतीय शेयर बाजार से अपना पैसा निकालकर डॉलर में बदल लेते हैं और भाग जाते हैं। पिछले 2 सालों में इस 'हॉट मनी' की निकासी ने रुपये की कमर तोड़ कर रख दी है।

4. डॉलर की वैश्विक दादागिरी : यह एक कड़वा सच है कि रुपया सिर्फ अपनी कमजोरी से नहीं गिर रहा, बल्कि डॉलर की मजबूती भी उसे गिरा रही है। पूरी दुनिया में अनिश्चितता का माहौल है, ऐसे में निवेशक सुरक्षित ठिकाने के तौर पर डॉलर को चुन रहे हैं। जब पूरी दुनिया डॉलर खरीदना चाहती है, तो उसकी कीमत बढ़ना तय है और रुपये जैसी उभरती करेंसी का गिरना स्वाभाविक है।

5. सर्विस सेक्टर का घटता 'सपोर्ट' : सालों से आईटी (IT) और सर्विस सेक्टर भारत के लिए डॉलर लाने वाली मशीन रहे हैं। लेकिन अब स्थिति बदल रही है। दुनिया भर में छंटनी और मंदी के डर से आईटी सेक्टर की ग्रोथ धीमी हुई है। सर्विस सेक्टर अभी भी डॉलर ला तो रहा है, लेकिन अब वह इतना पर्याप्त नहीं है कि गुड्स डेफिसिट (सामान के आयात का घाटा) को पूरी तरह कवर कर सके।

क्यों भरकर भी खाली रहा खजाना

पिछले तीन साल में आंकड़ों लिहाज से तो देश का विदेशी मुद्रा भंडार भरा है। लेकिन, डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी के लिहाज से देखें, तो यह 'नजर के धोखे' जैसा है। जब रुपया गिरता है, तो हमारे पास रखे हर डॉलर की कीमत रुपये में बढ़ जाती है। मान लीजिए 2022 में आपके गुल्लक में $100 थे और तब डॉलर 75 रुपये का था, तो आपके पास 7,500 रुपये थे। आज 2026 में आपके पास $105 हैं (भंडार थोड़ा बढ़ा) लेकिन अब डॉलर 95 रुपये का हो चुका है, तो आपके पास 9,975 रुपये दिख रहे हैं।

मापदंडशुरुआती 2022मई 2026 (अनुमानित)वृद्धि (%)
डॉलर टर्म में भंडार$640 बिलियन$690 बिलियन~7.8%
रुपये टर्म में भंडार₹48 लाख करोड़₹65.5 लाख करोड़~36.5%
डॉलर की कीमत₹75₹95~26% गिरावट
रुपये में देखने पर लग रहा है कि आप बहुत अमीर हो गए, लेकिन हकीकत में आपके पास सिर्फ 5 डॉलर ही बढ़े हैं। भारत के साथ भी यही हो रहा है; खजाना रुपये में तो 'रिकॉर्ड हाई' पर दिख रहा है, लेकिन डॉलर के रूप में वह लगभग वहीं खड़ा है जहाँ 3-4 साल पहले था। ऐसा इसलिए क्योंकि हम जितना डॉलर कमाते हैं, उससे ज्यादा तेल और सोना खरीदने में खर्च कर देते हैं, और बाकी बचा हुआ डॉलर RBI गिरते रुपये को सहारा देने के लिए बाजार में बेच देता है।

क्या है आगे का रास्ता?

रुपये की इस 3 साल पुरानी बैकस्टोरी से एक बात साफ है कि डॉलर के मुकाबले रुपया सिर्फ युद्ध रुकने से मजबूत नहीं होगा। बल्कि रुपये को मजबूती तभी मिलेगी जब हम अपनी 'इंपोर्ट डिपेंडेंसी' (आयात पर निर्भरता) को कम करेंगे। मेक इन इंडिया को सिर्फ नारा नहीं, बल्कि हकीकत बनाना होगा, ताकि हमें कार से लेकर क्रूड तक डॉलर कम से कम खर्च करना पड़े। अगली बार जब आप डॉलर की बढ़ती कीमत देखें, तो याद रखें कि यह सिर्फ ग्लोबल पॉलिटिक्स का नतीजा नहीं है, बल्कि यह हमारे व्यापारिक घाटे, विदेशी निवेशकों के पलायन और हमारी अपनी 'गोल्ड और लग्जरी' वाली आदतों का सामूहिक नतीजा है।

End of Article