Forex Reserve यानी विदेशी मुद्रा भंडार फिलहाल राष्ट्रीय चिंता का विषय है। Dollar vs Rupee की जंग में रुपया लगातार पिट रहा है। रिजर्व बैंक कई उपाय कर चुका है। जब कुछ भी काम नहीं आया, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उद्योग मंत्री पीयूष गोयल और सूचना प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव सहित सरकार के तमाम नेता अपील कर रहे हैं कि विदेशी मुद्रा भंडार को बचाने की कोशिश करें। सरकार ने खासतौर पर गोल्ड की खरीद घटाने, वर्क फ्रॉम होम अपनाने, विदेश यात्राओं से बचने जैसे उपायों पर जोर देने की बात कही है।
यहां तक कि खुद PM Modi ने अपने काफिले को छोटा कर दिया है। इसके अलावा केंद्र के तमाम मंत्रियों और राज्यों के मुख्यमंत्री व मंत्रियों के काफिले छोटे हुए हैं। सरकार जोर दे रही है कि ज्यादा से ज्यादा बैठकें वर्चुअल की जाएंगी। इस पूरी मशक्कत का एक ही मकसद है, विदेशी मुद्रा भंडार बचाना। बहरहाल, यहां समझते हैं कि आखिर यह विदेशी मुद्रा भंडार क्या है, कैसे काम करता है और इसमें पैसा कहां से आता है और कहां जाता है?
क्या है विदेशी मुद्रा भंडार?
भारत सरकार के बजट दस्तावेजों में दी गई जानकारी के मुताबिक विदेशी मुद्रा भंडार को आधिकारिक तौर पर Forex Reserve यानी
फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व कहा जाता है। यह विदेशी व्यापार में भुगतान संतुलन यानी बैलेंस ऑफ पेमेंट्स बनाए रखने की अहम कड़ी है। आम आदमी की भाषा में कहें, तो यह देश की एक 'गुल्लक' या 'तिजोरी' है, जिसे देश का केंद्रीय बैंक यानी भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) संभालता है। यह ठीक उसी तरह है, जैसे आप अपने घर में किसी आपात स्थिति (जैसे बीमारी या अचानक नौकरी जाने) के लिए कुछ बैंक बैलेंस या सेविंग्स रखते हैं, ठीक उसी तरह देश की अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रखने के लिए विदेशी मुद्रा का भंडार रखा जाता है।
इसमें क्या-क्या शामिल होता है?
फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व को अक्सर डॉलर की वैल्यू में व्यक्त किया जाता है। लेकिन, इसका मतलब यह नहीं कि इसमें सिर्फ डॉलर रखे जाते हैं। असल में इसके 4 हिस्से होते हैं। पहला और सबसे बड़ा हिस्सा फॉरेन करेंसी एसेट्स (FCA) यानी विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों का होता है। इसमें अमेरिकी डॉलर, यूरो, ब्रिटिश पाउंड और जापानी येन जैसी मुद्राएं शामिल होती हैं। FCA का सबसे बड़ा हिस्सा अमेरिकी डॉलर में रखा जाता है और सभी करेंसी की कुल वैल्यू को डॉलर के टर्म में ही व्यक्त की जाती है। इसके अलावा फॉरेक्स रिवर्ज का एक बड़ा हिस्सा Gold Reserves के तौर पर भी रखा जाता है। यह प्योर गोल्ड होता है, जो रिजर्व बैंक के सेफ वॉल्ट्स में रखा रहता है।
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SDR और RTP क्या होते हैं?
विदेशी मुद्रा भंडार का एक हिस्सा स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स यानी SDR और रिजर्व ट्रैंच पोजिशन यानी RTP कहा जाता है। ये दोनों असल में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से जुड़े होते हैं। SDR एक तरह का इंटरनेशनल रिजर्व है। यह कोई फिजिकल करेंसी फंड नहीं, बल्कि डॉलर, यूरो, चीनी युआन, जापानी येन और ब्रिटिश पाउंड जैसी प्रमुख मुद्राओं के इंडेक्स आधारित एक रिजर्व एसेट है।
- आसान शब्दों में इसे IMF के सदस्य देशों का Forex Credit Card कहा जा सकता है। इसमें प्रत्येक देश को एक लिमिट मिलती है। उसका इस्तेमाल वह देश कुछ शर्तों के साथ कर सकता है।
- RTP भी IMF से जुड़ा है। इसे कुछ ऐसे समझ लें कि मानो आपने अपने बचत खाते में कुछ रकम आपात स्थिति के लिए जमा कर रखी है, जिसे आप जब चाहें, बिना रोक टोक निकाल सकते हैं।
आखिर यह विदेशी खजाना भरता कैसे है?
अब सवाल उठता है कि आखिर देश का फॉरेक्स रिजर्व भरता कैसे है? इसमें डॉलर या दूसरी मुद्राएं और गोल्ड कहां से आते हैं। ये ठीक वैसे ही काम करता है, जैसे आपके घर या कारोबार का काम चलता है। मसलन, आपके घर के खजाने में जैसे पैसा नौकरी या कारोबार से आता है। वैसे ही विदेशी मुद्रा अर्जन के चार प्रमुख स्रोत होते हैं।
- निर्यात (Exports): जब भारत का कोई कारोबारी अपना सामान (जैसे कपड़े, कृषि उत्पाद, दवाइयां) या सेवाएं (जैसे आईटी और सॉफ्टवेयर सर्विसेज) विदेशों में बेचता है, तो विदेशी खरीदार उसका भुगतान मुख्य रूप से अमेरिकी डॉलर में करते हैं। यह डॉलर सीधे हमारे भंडार में जुड़ जाता है।
- विदेशी निवेश (FDI और FPI): जब कोई विदेशी कंपनी भारत में फैक्ट्री लगाती है, अपना ऑफिस खोलती है (FDI) या विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार में करोड़ों रुपये लगाते हैं (FPI), तो वे अपने साथ भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा लेकर आते हैं।
- रेमिटेंस (Remittances): खाड़ी देशों, अमेरिका, यूरोप और दुनिया के अन्य हिस्सों में काम करने वाले लाखों प्रवासी भारतीय जब अपनी मेहनत की कमाई का कुछ हिस्सा अपने परिवार को भारत भेजते हैं, तो वह भी विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाता है। आपको जानकर गर्व होगा कि दुनिया में सबसे ज्यादा रेमिटेंस प्राप्त करने वाला देश भारत ही है।
- पर्यटन (Tourism): जब विदेशी टूरिस्ट ताजमहल देखने या भारत दर्शन के लिए आते हैं, तो वे अपनी करेंसी को रुपये में एक्सचेंज करते हैं, जिससे RBI के पास डॉलर जमा होते हैं।
कहां खर्च होता है यह पैसा?
जैसे आपका घर चलता है, कुछ उसी तरह देश भी चलता है। आप नौकरी या व्यापार से पैसा कमाते हैं, जिससे घर चलता है। ठीक उसी तरह देश को चलाने के लिए डीजल, पेट्रोल चाहिए, खेती के लिए उर्वरक चाहिए, गोल्ड, टेक्नोलॉजी, रेयर अर्थ मटेरियल ऐसी तमाम चीजें हैं, जो हमें विदेश से लानी हैं। इसके लिए हम या तो सर्विस एक्सपोर्ट करते हैं, या वस्तुएं। उनके बदले हमें विदेशी मुद्रा मिलती है। मोटे तौर पर 4 ऐसे मद हैं, जहां विदेशी मुद्रा खर्च होती है।
- आयात का बिल चुकाने में (Import Bill): भारत अपनी जरूरत का लगभग 80 से 85 प्रतिशत कच्चा तेल (पेट्रोल-डीजल) खाड़ी देशों और रूस आदि से खरीदता है। इसके अलावा हम सोना, अत्याधुनिक रक्षा उपकरण (हथियार), और भारी मात्रा में इलेक्ट्रॉनिक सामान भी आयात करते हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में लगभग सभी लेनदेन डॉलर में होते हैं, इसलिए इस बड़े बिल को चुकाने के लिए विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल होता है।
- रुपये को गिरने से बचाने में: जब भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर की डिमांड बढ़ जाती है और हमारा 'रुपया' डॉलर के मुकाबले तेजी से कमजोर होने लगता है, तब RBI एक्शन में आता है। वह अपने भंडार से डॉलर निकालकर बाजार में बेचना शुरू कर देता है, जिससे रुपये की कीमत संभल जाती है।
- विदेशी कर्ज का भुगतान: भारत सरकार और कई बड़ी भारतीय कंपनियों ने विदेशों से कर्ज ले रखा है। इस कर्ज की ईएमआई (मूलधन और ब्याज) का भुगतान डॉलर में ही करना पड़ता है।
- आपात स्थिति : यदि कोई युद्ध या कोरोना जैसी वैश्विक महामारी आ जाए, जिससे हमारे निर्यात पूरी तरह ठप हो जाएं, तो देश की अर्थव्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए इसी 'गुल्लक' को फोड़ा जाता है।
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क्यों पड़ती है डॉलर की जरूरत?
यह सवाल बेहद लाजमी है कि आखिर अंतरराष्ट्रीय कारोबार में डॉलर, यूरो, येन या युआन जैसी मुद्राओं की जरूरत क्यों पड़ती है और हर जगह रुपये में भुगतान क्यों नहीं हो सकता। इसका जवाब वैश्विक डिमांड, स्वीकार्यता और भुगतान संतुलन में छिपा है। दुनिया में वही मुद्रा ज्यादा इस्तेमाल होती है, जिस पर ज्यादा देशों और निवेशकों का भरोसा हो और जिसे आसानी से कहीं भी स्वीकार किया जा सके।
इसे आसान भाषा मे इस तरह समझें कि पूरी दुनिया क्रूड का कारोबार डॉलर में करती है, इस वजह से डॉलर की डिमांड रहती है। यूरोप और ब्रिटेन ग्लोबल फाइनेंशियल हब हैं।
गोल्ड-सिल्वर का बड़ा कारोबार इन मुद्राओं में होता है। वहीं, चीन पूरी दुनिया की फैक्ट्री है, जो तमाम चीजें एक्सपोर्ट करता है, जिससे युआन की डिमांड रहती है। वहीं, जापान को दुनिया का बैंक माना जाता है, जहां से सस्ता कर्ज लेकर निवेशक दुनिया के बाजारों में निवेश करते हैं। लेकिन, भारतीय रुपये की उतनी डिमांड नहीं रहती, क्योंकि भारत न तो चीन की तरह बड़ा एक्सपोर्टर है, न भारत के पास क्रूड है और न भारत जापान की तरह सस्ता कर्ज दे सकता है।
रुपये जैसे क्यों नहीं छाप सकते?
हम अपना रुपया छापते हैं, ताे आखिर डॉलर क्यों नहीं छाप लेते, यह भी एक सवाल होता है। इसका जवाब है, संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानून। असल में कोई भी देश किसी दूसरे देश की मुद्रा छापकर इस्तेमाल नहीं कर सकता है। यह न केवल अनैतिक है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभुता का उल्लंघन है। यह ठीक वैसा ही है, जैसे किसी देश की जमीन पर कब्जा कर लेना। यही वजह है कि हम डॉलर नहीं छाप सकते हैं। बल्कि, इसे उचित तरीकों से ही हासिल कर सकते हैं।
