शेयर बाजार में निवेश करना 'जोखिमों के अधीन' होता है, यह लाइन हम सभी ने कई बार सुनी है। लेकिन एक आम निवेशक के लिए सबसे बड़ा डर यही होता है कि क्या उसका निवेश किया गया पैसा कभी 'जीरो' हो सकता है? शेयर बाजार की चकाचौंध में अक्सर हम सिर्फ मुनाफे की कहानियां देखते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि गलत चुनाव और बाजार की बदलती चाल किसी भी निवेशक की पूंजी को पूरी तरह खत्म कर सकती है। ऐसे में यह जानना बहुत जरूरी है कि पैसा कब डूबता है और एक गिरते हुए शेयर को कब तक पकड़ कर रखना समझदारी है।
क्या पैसा पूरी तरह डूब सकता है?
इसका सीधा जवाब है हां शेयर बाजार में पैसा पूरी तरह डूब सकता है। ऐसा तब होता है जब आप जिस कंपनी के शेयर खरीदते हैं, वह दिवालिया (Bankrupt) हो जाए। यदि कोई कंपनी कानूनी रूप से खुद को कंगाल घोषित कर देती है, तो उसके शेयरों की वैल्यू शून्य हो सकती है। इसके अलावा, यदि सेबी (SEBI) किसी कंपनी को धोखाधड़ी या नियमों के उल्लंघन के कारण स्टॉक एक्सचेंज से डीलिस्ट (Delist) कर देती है, तो उस स्थिति में भी आपके पास मौजूद शेयरों को बेचना नामुमकिन हो जाता है और आपका निवेश रद्दी के बराबर हो जाता है। अक्सर 'पेनी स्टॉक्स' (बहुत कम कीमत वाले शेयर) में ऐसा जोखिम सबसे ज्यादा होता है, जहां ऑपरेटर गेम के कारण कीमतें बढ़ाई जाती हैं और फिर अचानक कंपनी गायब हो जाती है।
गिरते हुए शेयर को कब तक पकड़ कर रखें?
निवेशकों की सबसे बड़ी गलती होती है 'लॉस' को स्वीकार न करना। जब कोई शेयर नीचे गिरने लगता है, तो कई निवेशक इस उम्मीद में उसे पकड़ कर बैठ जाते हैं कि "कभी तो ऊपर आएगा"। इसे 'सनकेन कॉस्ट फैलेसी' कहा जाता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि शेयर को पकड़ कर रखने की भी एक सीमा होनी चाहिए। अगर शेयर के गिरने की वजह बाजार की अस्थिरता (Market Volatility) है, तो अच्छी कंपनियों के शेयर वापस बढ़ जाते हैं। लेकिन अगर गिरावट कंपनी के 'फंडामेंटल्स' में खराबी की वजह से है जैसे कंपनी पर कर्ज बढ़ना, मैनेजमेंट में फ्रॉड, या मुनाफे में लगातार कमी तो ऐसे शेयर को पकड़ कर रखना अपनी पूंजी को और ज्यादा डूबने के लिए छोड़ने जैसा है।
कब छोड़ देनी चाहिए उम्मीद?
एक समझदार निवेशक को कुछ खास संकेतों (Red Flags) को पहचानकर उम्मीद छोड़ देनी चाहिए और 'एग्जिट' (Exit) कर लेना चाहिए। पहला संकेत है 'प्रमोटर होल्डिंग' में लगातार गिरावट। अगर कंपनी के मालिक ही अपने शेयर बेचकर निकल रहे हैं, तो इसका मतलब है कि उन्हें कंपनी के भविष्य पर भरोसा नहीं है। दूसरा, अगर कंपनी के खिलाफ कोई बड़ा कानूनी मामला या घोटाले की बात सामने आती है, तो बिना देर किए बाहर निकलना ही बेहतर होता है। तीसरा, 'स्टॉप लॉस' (Stop Loss) का नियम अपनाएं। निवेश करने से पहले ही तय कर लें कि आप कितना नुकसान सह सकते हैं। अगर आपने तय किया है कि 15% या 20% से ज्यादा गिरावट होने पर आप बेच देंगे, तो उस पर टिके रहें।
गिरते बाजार में रिकवरी की रणनीति
कई बार निवेशक गिरते हुए शेयरों को और ज्यादा खरीदकर 'एवरेज' (Average) करने की कोशिश करते हैं। यह रणनीति तभी काम आती है जब कंपनी बुनियादी तौर पर मजबूत हो (जैसे ब्लू-चिप कंपनियां)। अगर कंपनी कमजोर है, तो एवरेज करने का मतलब है 'डूबती नाव में और ज्यादा वजन डालना'। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर कोई शेयर अपनी उच्चतम कीमत से 50% से ज्यादा गिर चुका है और कंपनी के मुनाफे में कोई सुधार नहीं दिख रहा, तो वहां से घाटा बुक करके निकलना ही समझदारी है ताकि बची हुई पूंजी को किसी दूसरी अच्छी कंपनी में लगाकर नुकसान की भरपाई की जा सके।
