भारत में कई लोग परिवार के सदस्यों के नाम पर घर या जमीन खरीदते हैं। इसके पीछे परिवार की आर्थिक योजना, संपत्ति का बंटवारा या भविष्य की जरूरतें हो सकती हैं। लेकिन अगर प्रॉपर्टी किसी दूसरे व्यक्ति के नाम पर रजिस्टर्ड है और उसका पैसा कोई अन्य व्यक्ति दे रहा है, तो कुछ परिस्थितियों में आयकर विभाग इस लेनदेन की जांच कर सकता है। ऐसे मामलों में बेनामी संपत्ति कानून लागू होने का जोखिम भी हो सकता है। हालांकि, हर पारिवारिक लेनदेन को बेनामी नहीं माना जाता। यह इस बात पर निर्भर करता है कि पैसा कहां से आया, संपत्ति किसके लाभ के लिए खरीदी गई और कानून में दी गई छूट की शर्तें पूरी होती हैं या नहीं।
क्या पत्नी या बच्चों के नाम पर प्रॉपर्टी खरीद सकते हैं?
बेनामी लेनदेन निषेध अधिनियम, 1988 के तहत कुछ खास परिस्थितियों में छूट दी गई है। उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति अपनी पत्नी या बच्चे के नाम पर संपत्ति खरीदता है और पैसा उसकी आय के ज्ञात स्रोतों से आता है, तो यह व्यवस्था कानून में दी गई छूट के दायरे में आ सकती है। इसी तरह भाई, बहन, दादा-दादी, माता-पिता या संतान जैसे कुछ नजदीकी रिश्तों में संयुक्त मालिकाना हक से जुड़ी छूट भी है। इसके लिए संबंधित व्यक्ति और पैसा देने वाले व्यक्ति का दस्तावेजों में संयुक्त मालिक होना और धन का ज्ञात स्रोत से आना जरूरी है। इसलिए केवल रिश्तेदार का नाम इस्तेमाल करना अपने आप में कानूनी सुरक्षा नहीं देता।
किन परिस्थितियों में बढ़ सकती है परेशानी?
अगर संपत्ति खरीदने के लिए इस्तेमाल किए गए पैसे का स्रोत स्पष्ट नहीं है, तो आयकर विभाग सवाल पूछ सकता है। विभाग यह भी देख सकता है कि संपत्ति के दस्तावेजों में जिसका नाम है, क्या वही वास्तविक मालिक है या किसी दूसरे व्यक्ति के लाभ के लिए उसका नाम इस्तेमाल किया गया है। जांच के दौरान बैंक खाते, भुगतान का तरीका, होम लोन की EMI, संपत्ति पर कब्जा और किराये से मिलने वाली आय जैसी बातों पर गौर किया जा सकता है। यदि लेनदेन बेनामी साबित होता है, तो कानून के तहत संपत्ति जब्त होने और अन्य कानूनी कार्रवाई का जोखिम हो सकता है।
प्रॉपर्टी खरीदते समय कौन-से दस्तावेज रखें?
संपत्ति खरीदने से पहले यह स्पष्ट करें कि पैसा उपहार के रूप में दिया जा रहा है, कर्ज के रूप में या संयुक्त निवेश के तौर पर। भुगतान बैंक के माध्यम से करें और बैंक स्टेटमेंट, आय के प्रमाण, बिक्री विलेख, लोन की जानकारी तथा जरूरी कर दस्तावेज सुरक्षित रखें। अगर संयुक्त संपत्ति खरीदी जा रही है, तो दस्तावेजों में दोनों मालिकों के नाम और हिस्सेदारी स्पष्ट होनी चाहिए। इससे भविष्य में परिवार के भीतर विवाद होने पर भी स्थिति समझने में मदद मिल सकती है।
निवेश से पहले कानूनी सलाह क्यों जरूरी है?
प्रॉपर्टी की खरीद में गलती होने पर केवल टैक्स का मामला ही नहीं, बल्कि मालिकाना हक, विरासत और संपत्ति बेचने से जुड़ी समस्याएं भी पैदा हो सकती हैं। इसलिए किसी रिश्तेदार के नाम पर घर या जमीन खरीदने से पहले वकील या टैक्स विशेषज्ञ से सलाह लें। सबसे जरूरी बात यह है कि संपत्ति के दस्तावेज, पैसे का स्रोत और वास्तविक मालिकाना व्यवस्था एक-दूसरे के अनुरूप हों।
