कैसे अकाउंट में गलती से आ जाते हैं करोड़ों रुपये, ऐसे होती है चूक

बिजनेस
प्रशांत श्रीवास्तव
Updated Sep 16, 2021 | 13:25 IST

Katihar Boys get 900 crore : प्रमुख तौर पर 5 वजहों से होते हैं गलत ट्रांजैक्शन और करोड़ों रुपये का हेर-फेर हो जाता है । इसके अलावा टेक्नोलॉजी पर जरुरत से ज्यादा निर्भरता भी बिगाड़ती है खेल।

Katihar Boys
कटिहार में दो युवकों के खातों में आ गए 900 करोड़ रुपये 
मुख्य बातें
  • बिहार में दो युवकों के खाते में 900 करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम गलती से जमा हो गई।
  • योजनाओं की राशि ट्रांसफर करने में कई बार फाइल करप्ट हो जाती है , जिसकी वजह से गलत ट्रांजैक्शन हो जाते हैं।
  • कई बार स्टॉक और कमोडिटी ट्रेडिंग में फटाफट ट्रांजैक्शन के चक्कर में फैटी फिंगर खेल बिगाड़ती है।

नई दिल्ली:  आज फिर बैंक अकाउंट में गलती से पैसे पहुंचने की खबर आई है। खबर बिहार के कटिहार की है, जहां दो युवकों के खाते में 900 करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम गलती से जमा हो गई। इसके पहले बुधवार (16 सितंबर) को खगड़िया में भी एक मामला सामने आया था। जिसमें एक युवक के खाते में 5.5 लाख रुपये गलती से जमा हो गए थे। ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि इस तरह के गलत ट्रांजैक्शन पहली बार हुए हैं, अक्सर इस तरह की खबरें आती रहती हैं कि लोगों के अकाउंट में गलती से पैसे जमा हो गए। सवाल उठता है कि जब आज के दौर में टेक्नोलॉजी इतनी मजबूत है तो ऐसा कैसे होता है। वह भी एक-दो लाख रुपये नहीं बल्कि 900 करोड़ रुपये गलती से ट्रांसफर हो जा रहे हैं। इस पहेली को समझने के लिए टाइम्स नाउ नवभारत ने देश के एक वेटरन बैंकर्स से बात की है।

SBI के पूर्व सीजीएम सुनील पंत के अनुसार इस तरह की गलतियां होने का कारण भी टेक्नोलॉजी में भी छुपा है। क्योंकि आज के दौर में यह मान लिया गया है कि टेक्नोलॉजी से कोई गलती नहीं होती है। लेकिन कोई भी सिस्टम 100 फीसदी फुल प्रूफ नहीं होता है। इसी वजह से इस तरह के मामले सामने आते हैं। पंत के अनुसार ऐसा होने की 5 प्रमुख वजहें हो सकती है...

योजनाओं (सब्सिडी आदि) की राशि ट्रांसफर होने पर

असल में आजकल बड़े पैमाने पर बल्क ट्रांजैक्शन होते हैं। इसके तहत कई बार हजारों -लाखों लोगों को एक साथ पैसा भेजा जाता है। जिसमें कई सौ करोड़ रुपये की रकम ऑनलाइन ट्रांसफर होती है। मसलन सरकार के किसी भी विभाग को अगर सब्सिडी  की रकम जारी करनी होती है। तो उसके कई लाख लाभार्थी होते हैं। इस तरह के बल्क ट्रांजैक्शन में संबंधित विभाग एक डिजिटल फाइल बना कर बैंक को भेज देते हैं। जिसमें लाभार्थियों के बैंक खाते, नाम सब्सिडी की राशि आदि सभी जरूरी जानकारियां मौजूद रहती हैं। और बैंक उस फाइल को एक साथ ट्रांजैक्शन के लिए जारी कर देते हैं। क्योंकि उनके लिए एक-एक अकाउंट की डिटेल चेक करना संभव नहीं होता है। 

यह सारी प्रक्रिया ऑटोमेटिक होती है। इसमें कई बार फाइल करप्ट हो जाती है। ऐसे में टोटल अमाउंट तो सही रहेगा। लेकिन इसमें अकाउंट के आधार पर पैसा ट्रांसफर होना गड़बड़ हो जाता है। मसलन अगर किसी के अकाउंट में 500 रुपये जाने थे तो हो सकता है वहां 5 लाख जमा हो जाएं। करप्ट फाइल कुछ भी कर सकती है। ऐसा गलतियां बहुत कम होती है। लेकिन जब होती है तो इसी तरह के बड़े अमाउंट के मामले सामने आते हैं। इसलिए सेफ्टी के तरीके अपनाने चाहिए। क्योंकि फाइल करप्ट हो सकती है यह विभाग को भी पता होता है और बैंक को भी पता होता है। 

इसलिए एक इंटरनल वैरिफिकेशन सिस्टम का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसमें टेक्नोलॉजी के जरिए संदेहास्पद या यू कहें कि अजूबा ट्रांजैक्शन पर बैंक को अलर्ट मिल जाएगा। और एक अलग फाइल बन जाएगी। और संदेहास्पद ट्रांजैक्शन का पहले से ही वैरिफिकेशन किया जा सकेगा। 

फैटी फिंगर ट्रांजैक्शन

इस तरह की गलतियां स्टॉक और कमोडिटी ट्रेडिंग में कई बार हो जाती है। असल में वहां पर बड़ी राशि वाले लेन-देने काफी होते हैं। और बहुत तेज होते हैं। ऐसे में कई बार कंप्यूटर पर डाटा फीड करने वाले की अंगुलियां गलत राशि फीड कर देती है। इसलिए इस तरह के ट्रांजैक्शन को फैटी फिंगर कहा जाता है। इसमें कई बार 90 की जगह 900 भी फीड हो सकता है। मसलन कंप्यूटर की की-बोर्ड में बगल के बटन गलती से दब जाते हैं।  और अगर ट्रेडिंग में एक बार बल्क शेयर या कमोडिटी ट्रांसफर हुई तो फिर उसके आधार पर रकम निकल जाएगी। 

नाम से ज्यादा अंकों पर भरोसा

देखिए ऑनलाइन ट्रांजैक्शन में जो सिस्टम होता है। उसमें बैंक अकाउंट नंबर, खाता धारक का नाम, आईएफएससी कोड फीड होते हैं। इसमें ऑनलाइन ट्रांजैक्शन न्यूमेरिक वैल्यू पर ज्यादा जोर देता है। ऐसे में अगर खाता धारक के नाम की स्पेलिंग गलत हैं तो उसे बैंक तरजीह नहीं देता हैं। क्योंकि अकाउंट क्लीयरिंग सिस्टम इस तरह से बनाया गया है जिसमें बैंक,  अकाउंट नंबर और आईएफएसी कोड का वैरिफिकेशन किया जाता है। इसीलिए ऐसा वैरिफिकेशन सिस्टम होना चाहिए, जिसमें नाम गलत होने पर भी अलर्ट मिल सके। 

बैंक और कस्टमर की गलती 

कई बार बैंक कस्टमर ही गलती से अकाउंट नंबर और दूसरी जानकारियां गलत भर या फीड कर देते हैं। ऐसी स्थिति में गलत ट्रांजैक्शन हो जाते हैं। इसके अलावा कई बार बैंकर भी पैसे ट्रांसफर करते समय अकाउंट नंबर या पैसे की राशि  गलत फीड कर देता है। जिसकी वजह से ज्यादा पैसा चला जाता है। या फिर गलत खाता धारक के पास पैसे ट्रांसफर हो जाते हैं।

ऐसे हमें यह समझना चाहिए कि टेक्नोलॉजी जब गलती करती है तो बड़ी चोट लगती है। इसलिए उस पर जरूर से ज्यादा निर्भरता नहीं बढ़ानी चाहिए। और साथ ही बैंक कस्टमर की यह जिम्मेदारी है कि अगर उसके अकाउंट में गलत राशि आ गई है, तो वह तुरंत बैंक को सूचना दे।


 

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