बिजनेस

ट्रंप को नहीं शांति की चाह? पीछे हटने की वजह कुछ और, मिसाइल आंकड़ों ने खोली पोल

ट्रंप शांति की बात करते हैं, लेकिन ऐसी शर्तें रख देते हैं, जिन्हें ईरान शायद कभी नहीं माने। ट्रंप कह चुके हैं कि वे ईरान को मिटा देना चाहते हैं। फिर अचानक सीजफायर क्यों, जवाब आंकड़ों में छिपा है।

Image

सीजफायर को मजबूर हुए ट्रंप

US IRAN War 2026 : अमेरिका को अपनी जमीन से दूर लंबे समय तक युद्ध लड़ने की क्षमता के चलते मिलिट्री सुपरपावर माना जाता है। लेकिन, ईरान के सामने US War Machine हांफ रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप (US President Trump) एकतरफा सीजफायर को लगातार बढ़ाते जा रहे हैं। ईरान आरोप का कहना है कि अमेरिका बात नहीं करना चाहता, बल्कि बातचीत के बहाने जंग के लिए हथियारों का जखीरा जुटाने में लगा है।

ईरान के इन आरोपों में दम भी दिखता है, क्योंकि ट्रंप एक तरफ शांति की बातें करते हैं, वहीं साथ ही ऐसी शर्तें रख देते हैं, जिन्हें ईरान के लिए मानना शायद मुमकिन नहीं। इस बीच ट्रंप बार-बार फिर से और बड़े हमले की बातें भी करते हैं। इससे यह सवाल उठता है कि क्या वाकई ट्रंप शांति की चाह रखते हैं, या सीजफायर की वजह कुछ और है?

आंकड़े खोल रहे अमेरिका की पोल

CSIS की रिपोर्ट के मुताबिक ईरान के साथ युद्ध के 39 दिनों में अमेरिका ने कई अहम मिसाइलों का बड़ा हिस्सा खर्च कर दिया है। ऐसे में अब अमेरिका के पास इस जंग को बहुत लंबा खींचने की क्षमता नहीं है। यह रिपोर्ट इस तरफ इशारा करती है कि ट्रंप का सीजफायर असल में शांति की पहल नहीं, बल्कि मिसाइल भंडार पर बढ़ते दबाव का असर भी हो सकता है। आंकड़े बताते हैं कि अमेरिका ने बेहद तेजी से अपने अहम हथियार खर्च किए।

मिसाइल खर्च ने बढ़ाई टेंशन

Center for Strategic and International Studies (CSIS) की 21 अप्रैल, 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, 39 दिन के एयर और मिसाइल कैंपेन में अमेरिका ने टॉमहॉक, JASSM, Patriot, THAAD और SM-6 जैसे 7 प्रमुख मुनिशन का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया। कुछ श्रेणियों में यह खर्च प्री-वार स्टॉक के आधे से भी ज्यादा तक पहुंच गया।

रिपोर्ट के डेटा के अनुसार, टॉमहॉक मिसाइल की करीब 3,100 की इन्वेंट्री में से 850 से ज्यादा इस्तेमाल हो गई, जबकि JASSM के 4,400 स्टॉक में से 1,000 से ज्यादा खर्च हो चुके हैं। Patriot इंटरसेप्टर का उपयोग 1,000 से ऊपर पहुंचा, जो एयर डिफेंस सिस्टम पर भारी दबाव को दिखाता है।

सीजफायर के पीछे की रणनीति

रिपोर्ट सीधे तौर पर यह नहीं कहती कि सीजफायर का कारण मिसाइलों की कमी थी, लेकिन यह जरूर बताती है कि शुरुआती दिनों में भारी खपत के बाद अमेरिका ने धीरे-धीरे सस्ते और कम दूरी वाले हथियारों का इस्तेमाल बढ़ा दिया। इसका मतलब साफ है कि हाई-एंड मुनिशन को बचाने की रणनीति अपनाई गई। यही बदलाव इस बात का संकेत देता है कि युद्ध को लंबा खींचना अमेरिका के लिए महंगा साबित हो सकता था। ऐसे में सीजफायर को सिर्फ कूटनीतिक फैसला नहीं, बल्कि संसाधन प्रबंधन के नजरिए से भी देखा जा रहा है।

युद्ध जारी रखने की क्षमता पर सवाल

CSIS रिपोर्ट का सबसे बड़ा अलर्ट युद्ध को जारी रखने की अमेरिका की क्षमता को लेकर है। रिपोर्ट साफ कहती है कि अमेरिका के पास किसी बड़े और लंबे संघर्ष के लिहाज से अब मिसाइलों का भंडार पर्याप्त नहीं है। खासकर अगर रूस और चीन जैसे प्रतिद्वंद्वी इस युद्ध में अगर उतर जाते हैं, तो अमेरिका गहरे संकट में होगा।

मैन्युफैक्चरिंग सबसे बड़ी चिंता

रिपोर्ट में बताया गया है कि मिसाइलों की कमी से ज्यादा चिंता इन मिसाइलों के स्टॉक को दोबारा पहले के स्तर तक लाने में लगने वाला समय है। रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका को अपने मिसाइल भंडार को पहले के स्तर पर लाने में 1 से 4 साल तक का समय लग सकता है। कई अहम सिस्टम की डिलीवरी टाइमलाइन 42 से 64 महीने तक है, यानी उत्पादन और सप्लाई में लंबा गैप बना रहेगा।

यूक्रेन और सहयोगियों पर भी असर

रिपोर्ट यह भी बताती है कि घटते स्टॉक का असर अमेरिका के सहयोगी देशों पर भी पड़ेगा। यूक्रेन जैसे देशों को Patriot और अन्य सिस्टम की सप्लाई पर दबाव बढ़ सकता है। वहीं, जापान समेत कई देशों को मिलने वाली मिसाइल डिलीवरी में देरी की आशंका जताई गई है।

सस्ता हथियार बना नया विकल्प

अमेरिका 39 दिनों में इन 7 म्युनिशन के जरिये युद्ध पर 16 से 24 अरब डॉलर के बीच खर्च कर चुका है। लिहाजा, अब महंगी मिसाइलों की कमी के बीच अमेरिका अब कम लागत वाले विकल्पों पर जोर दे रहा है। JDAM, SDB और ड्रोन जैसे सिस्टम ज्यादा उपयोग में लाए गए, लेकिन इनकी सीमाएं भी हैं, खासकर लंबी दूरी और हाई-डिफेंस टारगेट्स पर।

Yateendra Lawaniya
यतींद्र लवानियाauthor

प्रिंट और डिजिटल मीडिया में बिजनेस एवं इकोनॉमी कैटेगरी में 10 वर्षों से अधिक का अनुभव। पिछले 7 वर्षों से शेयर बाजार, कॉरपोरेट सेक्टर और आर्थिक नीतियों से जुड़ी खबरों पर विशेष पकड़। लेखन में केवल हेडलाइन तक सीमित न रहकर आंकड़ों, नीतिगत फैसलों और कॉरपोरेट दावों के पीछे की वास्तविक तस्वीर को बैलेंस्ड और आसान शब्दों में पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास। वर्तमान में Times Now Hindi के लिए बाजार की हर हलचल और आर्थिक घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं।

और पढ़ें
End of Article