आजादी के बाद, भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू जिस कार का इस्तेमाल करते थे, वह सिर्फ एक वाहन नहीं बल्कि 1947 के दौर में विलासिता का प्रतीक और चलती-फिरती इतिहास की मिसाल थी। यह थी रोल्स-रॉयस सिल्वर रेथ (Rolls-Royce Silver Wraith) जिसे लॉर्ड माउंटबेटन ने नेहरू को उपहार स्वरूप दी थी। बाद में इस कार का उपयोग लाल बहादुर शास्त्री जैसे नेताओं ने भी किया और यह कई वर्षों तक देश की आधिकारिक राज्य कार बनी रही।
शाही तोहफा
1947 में, क्वीन एलिजाबेथ ने रोल्स-रॉयस सिल्वर रेथ कार भारत के अंतिम वायसराय लुई माउंटबेटन को भेंट की थी। 4.3-लीटर इंजन और 4-स्पीड मैनुअल गियरबॉक्स वाली यह कार उस समय इंजीनियरिंग और कारीगरी का अद्भुत नमूना थी। सिल्वर हुड ऑर्नामेंट, क्रोम ग्रिल और स्लीक डिजाइन के साथ, इसका लुक बेहद शानदार था। अंदर से यह कार बेहद विशाल थी, जिसमें रेडियो, लकड़ी की पॉलिश और आलीशान लेदर सीटें लगी थीं। बाद में यह कार भारत सरकार को दी गई, जहां पंडित नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री ने इसका इस्तेमाल किया।
नए भारत का प्रतीक
आजादी के बाद 1947 में, रोल्स-रॉयस सिल्वर रेथ भारत की पहली आधिकारिक राज्य कार बनी। पंडित नेहरू इसमें सफर करने वाले पहले भारतीय नेता बने। यह कार भारत के नेताओं को दुनिया के मंच पर ले जाने वाला एक राजनयिक और सांस्कृतिक प्रतीक बन गई।
शक्ति, गरिमा और भव्यता का संगम
शुरुआती मॉडल में 4.3-लीटर इनलाइन-सिक्स इंजन और 4-स्पीड मैनुअल गियरबॉक्स था, जबकि बाद के मॉडल 4.9-लीटर इंजन तक अपग्रेड हुए। इसे ग्राहक की पसंद के अनुसार खास तरीके से सजाया जा सकता था। नेहरू द्वारा इस्तेमाल किया गया वर्जन अपनी क्लासिक और सादगीपूर्ण शाही लुक में ही बरकरार रहा, क्योंकि यह एक विरासत के रूप में मिला था।
उपेक्षा से रैलियों की शान तक का सफर
समय के साथ, यह कार उपेक्षा का शिकार हो गई, लेकिन विंटेज कार प्रेमी यशवर्धन रूइया ने इसे खरीदा और पूरी तरह से बहाल कर दिया। आज यह कार देशभर में विंटेज कार रैलियों में प्रदर्शित होती है और कारीगरी, विरासत और इतिहास की याद दिलाती है।
सिर्फ कार नहीं, एक कूटनीतिक प्रतीक
पंडित नेहरू ने एक बार महारानी ऑफ़ बड़ौदा, महारानी चिमनाबाई द्वितीय के लिए एच.जे. मुलिनर एंड कंपनी द्वारा कस्टमाइज्ड रोल्स-रॉयस सिल्वर रेथ का ऑर्डर भी दिया था। यह एक अनोखा मॉडल था। राजशाही के प्रति विशेष झुकाव न होने के बावजूद, नेहरू ने इसे स्वतंत्र भारत के शुरुआती दौर में रियासतों के साथ सद्भाव बनाए रखने के एक माध्यम के रूप में देखा।
