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अंटार्कटिक सागर से पूरी तरह से गायब हुआ गोवा से भी बड़ा आइसबर्ग, वैज्ञानिकों को सता रही ये चिंता

दुनिया का सबसे बड़ा Iceberg, इतना बड़ा कि हमारा गोवा राज्य भी उससे छोटा है, A23a लगभग 40 साल की अपनी यात्रा के बाद अब पूरी तरह से खत्म हो गया है। वैज्ञानिक इसे सिर्फ एक प्राकृतिक घटना नहीं, बल्कि बदलती जलवायु का उदाहरण भी मान रहे हैं।

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40 साल बाद गायब हो गया अंटार्कटिका से अलग हुआ A23a हिमखंड
Authored by: Digpal Singh
Updated Jul 14, 2026, 17:21 IST

जब कोई चीज हमारे जीवन से अचानक चली जाती है तो उसके बिना सब कुछ खाली-खाली सा लगने लगता है। उसके जाने का दुख भी बहुत ज्यादा होता है। फिर चाहे वह कोई निर्जीव चीज ही क्यों न हो। आज दुनियाभर के वैज्ञानिकों के लिए वैसा ही समय है। क्योंकि करीब चार दशकों तक वैज्ञानिकों की निगरानी में रहने वाला दुनिया का सबसे बड़ा हिमखंड (Iceberg) A23a अब पूरी तरह खत्म हो चुका है। एक ऐसा आइसबर्ग जो हमारे देश में गोवा राज्य से भी बड़ा और लंदन से तो लगभग दो गुने क्षेत्रफल का था, उसके इस तरह गायब होने से वैज्ञानिक परेशान हैं। इतने बड़े आइसबर्ग का इस तरह से खंड-खंड होकर गायब हो जाना, जलवायु परिवर्तन की तरफ एक बार फिर सभी का ध्यान खींच रहा है।

कब अलग हुआ था A23a Iceberg?

सैटेलाइट तस्वीरों में यह विशाल हिमखंड अब नहीं दिखाई दे रहा है। यह आइसबर्ग, अंटार्कटिक के फिल्चनर-रोने (Filchner-Ronne) आइस शेल्फ से साल 1986 में टूटकर अलग हुआ था। यह विशाल हिमखंड करीब 40 साल की यात्रा के बाद लगातार गर्म होते समुद्र में धीरे-धीरे पिघल गया। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह सिर्फ एक हिमखंड का अंत नहीं, बल्कि पृथ्वी की बदलती जलवायु और ध्रुवीय क्षेत्रों में हो रहे परिवर्तनों को समझने का अहम अध्याय है।

A23a कितना बड़ा आइसबर्ग था, इस बात का अंदाजा कैप्चर नॉर्थ स्टूडियोज के ड्रोन पायलट और फोटोग्राफर एंड्रयू मिलर की उस बात से लगाया जा सकता है। जिसमें उन्होंने एक बार कहा था, जब आप इस हिमखंड की तरफ जाते हैं तो ऐसा नहीं लगता कि आप किसी आइसबर्ग की तरफ जा रहे हैं, बल्कि लगता है कि आप किसी जमीनी हिस्से की तरफ बढ़ रहे हैं।

30 साल तक समुद्र की गहराई में फंसा रहा A23a

एक समय पर A23a आइसबर्ग का क्षेत्रफल लगभग 3500 स्क्वायर किलोमीटर था। उस समय यह गोवा से बड़ा और यूरोप में लंदन शहर के लगभग दोगुना था। उस समय इसका वजन लगभग एक ट्रिलियन टन आंका गया था। अंटार्कटिक से टूटने के बाद यह आइसबर्ग करीब 30 साल तक समुद्र तल से फंसा रहा, लेकिन साल 2020 के बाद यह समुद्री धाराओं के साथ बहने लगा। आखिरकार दक्षिण अटलांटिक के अपेक्षाकृत गर्म पानी में पहुंचने के बाद यह छोटे-छोटे टुकड़ों में टूटकर खंड-खंड हो गया और पूरी तरह से समुद्र के पानी में विलीन हो गया।

क्या A23a का खंड-खंड होना जलवायु परिवर्तन का प्रमाण है?

वैज्ञानिकों के अनुसार A23a का टूटना अपने आप में असामान्य घटना नहीं है। बड़े हिमखंडों का आइस शेल्फ से अलग होना (Calving) अंटार्कटिक की प्राकृतिक प्रक्रिया का हिस्सा है। हालांकि, लगातार बढ़ते समुद्री तापमान और गर्म होती हवाओं ने इसके पिघलने की रफ्तार को तेज कर दिया था। यही कारण है कि वैज्ञानिक इस घटना को वैश्विक जलवायु परिवर्तन के व्यापक संदर्भ में भी देख रहे हैं। नासा के साल 2002 में लॉन्च हुए एक्वा सैटेलाइट पर मौजूद अर्थ ऑब्जर्विंग सेंसर मॉडरेट रेजोल्यूशन इमेजिंग स्पेक्ट्रोरेडियोमीटर (MODIS) की 7 जनवरी 2026 और 13 जनवरी 2026 की दो तस्वीरें इस आइसबर्ग के तेजी से पिघलने की कहानी बयां कर रही हैं।

7 जनवरी और 23 जनवरी की सैटेलाइट तस्वीर में फर्क देखने के लिए यहां क्लिक करें

A23a के पिघलने का समुद्री जीवन पर क्या असर पड़ेगा?

ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वे (British Antarctic Survey) के वैज्ञानिकों के अनुसार, A23a के पिघलने से समुद्र में बड़ी मात्रा में खनिज और पोषक तत्व पहुंचे हैं। इससे स्थानीय स्तर पर फाइटोप्लैंकटन और समुद्री फूड चेन को कुछ समय के लिए फायदा मिल सकता है। दूसरी तरफ, समुद्री जल की लवणता (नमक), तापमान और महासागरीय धाराओं में बदलाव जैसी प्रक्रियाओं का भी अध्ययन किया जा रहा है।

A23a के पिघलने पर वैज्ञानिक क्या कहते हैं?

ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वे के समुद्र विज्ञानी और ओशियन आइस प्रोजेक्ट के को-लीडर डॉ. एंड्रयू मेयर्स (Andrew Meijers) पहले भी कह चुके हैं कि ऐसे विशाल हिमखंड वैज्ञानिकों को यह समझने का अनोखा अवसर देते हैं कि समुद्री धाराएं, पोषक तत्व और समुद्री पारिस्थितिकी एक-दूसरे को किस तरह प्रभावित करते हैं। वह कहते हैं, यह किसी काल्पनिक कहानी जैसा था - समुद्र के बीचों-बीच बर्फ की एक ऐसी विशाल दीवार, जो किसी बड़े जहाज से भी ऊंची थी। इसका गायब होना हमें यह समझने का मौका देता है कि महासागरीय धाराएं और पोषक तत्व पर्यावरण को कैसे प्रभावित करते हैं। । वहीं NASA के अर्थ ऑब्जर्वेटरी प्रोग्राम के अनुसार, A23a की अंतिम अवस्था ने यह दिखाया कि गर्म समुद्री जल में पहुंचने के बाद विशाल हिमखंड कितनी तेजी से टूट सकते हैं।

जीवन में इसकी कमी तो खलेगी

पृथ्वी और सौरमंडल में कहीं पर भी अगर बर्फ में दरार पड़ती है तो उन दरारों के अध्ययन में विशेषज्ञ अमेरिकी वैज्ञानिक कैथरीन वॉकर ने A23a के पिघलने पर दुख जताया है। उनका कहना है, अंटार्कटिक में पिघलने वाली बाकी चीजों की तरह ही, इसे गायब होते देखना दुखद है। मुझे निश्चित रूप से इसकी कमी खलेगी और उस चीज की भी कमी खलेगी, जिसे मैं लगातार देखती रहती थी और सोचती थी कि ‘आज यह कहां है?’ या ‘यह कहां चला गया?’ हर हफ्ते इसकी तस्वीरें देखने का जो उत्साह था, अब वह चला गया।'

पर्यावरणविदों की चेतावनी

पर्यावरण संगठनों का कहना है कि अकेले A23a के समाप्त होने से समुद्र का जलस्तर अचानक नहीं बढ़ेगा, क्योंकि यह पहले से ही समुद्र में तैर रहा था। लेकिन अंटार्कटिक की बर्फ लगातार कमजोर होती रही तो भविष्य में महाद्वीपीय बर्फ (Land Ice) के तेजी से पिघलने का खतरा बढ़ सकता है, जिसका सीधा असर वैश्विक समुद्र-स्तर पर पड़ेगा। यानी समुद्र किनारे के शहरों के डूबने की स्थिति बन सकती है।

हमारे लिए इसका क्या मतलब है?

जानकारों का मानना है कि A23a का अंत किसी तत्काल वैश्विक आपदा का संकेत नहीं है, लेकिन यह पृथ्वी की जलवायु प्रणाली में हो रहे छोटे-छोटे और लंबी अवधि के बदलावों की याद जरूर दिलाता है। अंटार्कटिक में हो रहे परिवर्तन आखिरकार समुद्री पारिस्थितिकी, मौसम के पैटर्न और वैश्विक जलवायु संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए वैज्ञानिक इस घटना को एक महत्वपूर्ण चेतावनी के साथ-साथ भविष्य के रिसर्च के लिए बहुमूल्य अवसर भी मान रहे हैं।

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