Times Now Navbharat
live-tv
Premium

पोलैंड में चीफ जस्टिस के निलंबन से बिगड़ा माहौल, संवैधानिक तख्तापलट का खतरा, जानें क्या है पूरी इनसाइड स्टोरी

पोलैंड में प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क और राष्ट्रपति कारोल नावरोकी के बीच संवैधानिक जंग तेज हो गई है। ट्रिब्यूनल के चीफ जस्टिस के निलंबन और भारी पुलिस बल की तैनाती के बाद राष्ट्रपति ने अफ्रीका दौरा बीच में रद्द कर दिया है। जानते इस घटना की पूरी इनसाइड स्टोरी।

Image
चीफ जस्टिस के निलंबन से बिगड़ा माहौल (Newsroom Verified AI Created Image)
Authored by: निशांत तिवारी
Updated Oct 31, 2026, 14:56 IST
Follow on Google News

सोचिए कि किसी देश के राष्ट्रपति राजकीय दौरे पर अफ्रीका जाने के लिए अपने आधिकारिक जेट में हजारों फीट की ऊंचाई पर उड़ रहे हों, और अचानक उन्हें खबर मिले कि उनकी राजधानी में देश की सबसे बड़ी अदालत के मुख्य न्यायाधीश को सस्पेंड कर दिया गया है और कोर्ट की इमारत को हथियारों से लैस पुलिस ने घेर लिया है। राष्ट्रपति तुरंत पायलट को आदेश देते हैं, "विमान मोड़ो।" यह कोई काल्पनिक सीन नहीं है, बल्कि यह यूरोपीय संघ (EU) के प्रमुख और ताकतवर देश पोलैंड में शुक्रवार रात घटा एक बड़ा घटनाक्रम है। पोलैंड के राष्ट्रपति कारोल नावरोकी सेनेगल जाने के रास्ते में थे, लेकिन जैसे ही देश की शीर्ष अदालत यानी संवैधानिक ट्रिब्यूनल के चीफ जस्टिस बोगदान श्वेचकोव्स्की के निलंबन और वारसॉ में दंगा रोधी पुलिस की भारी तैनाती की खबर आई, उन्होंने अपनी यात्रा बीच हवा में रद्द कर दी और वारसॉ लौट आए।

दूसरी तरफ, यूरोप समर्थक प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क की सरकार और राष्ट्रपति नावरोकी के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी लॉ एंड जस्टिस (PiS) विचारधारा के बीच अब आर-पार की जंग छिड़ गई है। विपक्ष इसे 'कूप' यानी तख्तापलट बता रहा है, जबकि सरकार इसे न्यायपालिका में 'कानून के शासन की बहाली' करार दे रही है। आखिर 2026 में पोलैंड की संवैधानिक इमारत में अचानक यह धमाका कैसे हुआ? क्यों पोलैंड एक संवैधानिक संकट के मुहाने पर खड़ा हो गया है? आइए, इस राजनीतिक ड्रामे की परत-दर-परत इनसाइड स्टोरी समझते हैं।

60 हजार फीट की ऊंचाई से यू-टर्न: क्या हुआ राष्ट्रपति नावरोकी के साथ?

शुक्रवार को राष्ट्रपति कारोल नावरोकी अपने आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल के साथ सेनेगल के दौरे पर रवाना हुए थे। लेकिन जब उनका विमान अटलांटिक महासागर की दिशा में बढ़ रहा था, तभी वारसॉ से आई एक खबर ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया। पोलैंड के संवैधानिक ट्रिब्यूनल की सबसे वरिष्ठ जजों में से एक अन्ना कोरविन-पियोत्रोव्स्का ने कोर्ट के अध्यक्ष बोगदान श्वेचकोव्स्की और उनके डिप्टी बारटोमिएज सोहांस्की को एक महीने के लिए निलंबित कर दिया और खुद संस्था का अस्थायी नियंत्रण संभाल लिया। जैसे ही यह खबर राष्ट्रपति तक पहुंची, उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर लिखा कि "ऐसे क्षण में देश के राष्ट्रपति को पोलैंड में ही होना चाहिए। मैं सेनेगल की अपनी उड़ान बीच में ही रोक रहा हूं। मैं वापस आ रहा हूं।" वारसॉ पहुंचते ही राष्ट्रपति के कार्यालय ने स्पष्ट किया कि वे सुप्रीम कोर्ट के प्रेसिडेंट कापिनस्की के साथ इस आपातकालीन स्थिति और कथित "अवैध निलंबन" पर आपात समीक्षा बैठक करेंगे।

वारसॉ की सड़कों पर दंगा रोधी पुलिस और प्रदर्शन

शुक्रवार देर रात वारसॉ स्थित संवैधानिक ट्रिब्यूनल की इमारत के बाहर एक ऐसा नजारा देखने को मिला, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। ट्रिब्यूनल की इमारत को भारी हथियारों से लैस पुलिस और बख्तरबंद गाड़ियों से घेर लिया गया था। पुलिस बल को तैनात करने का अनुरोध जज अन्ना कोरविन-पियोत्रोव्स्का ने ही किया था, जिन्होंने दावा किया था कि कोर्ट के रिकॉर्ड और जजों की सुरक्षा को खतरा हो सकता है। खबर आग की तरह फैली और सैकड़ों की संख्या में राइट-विंग प्रदर्शनकारी ट्रिब्यूनल की इमारत के बाहर इकट्ठा हो गए। प्रदर्शनकारियों ने सरकार विरोधी नारेबाजी की। कुछ उपद्रवियों ने ट्रिब्यूनल की बाड़ तोड़कर अंदर घुसने का प्रयास किया और पुलिस पर सामान फेंका, जिसके बाद पुलिस ने तीन लोगों को हिरासत में ले लिया। निलंबन के तुरंत बाद सस्पेंड किए गए चीफ जस्टिस श्वेचकोव्स्की का नाम ट्रिब्यूनल की आधिकारिक वेबसाइट से हटा दिया गया। इस पर ट्रिब्यूनल के आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल ने बयान जारी करते हुए कहा कि वेबसाइट का "अवैध अधिग्रहण" हुआ है और पियोत्रोव्स्का के पास ऐसा करने का कोई अधिकार नहीं है; वे 'तख्तापलट का अपराध' कर रही हैं। इस बड़े बवाल से आहत होकर चीन में पोलैंड के राजदूत याकुब कुमोच ने शुक्रवार रात इस्तीफा दे दिया और कहा कि देश के इन हालात में वे अपना राजनयिक पद नहीं संभाल सकते।

वारसॉ में स्थित पोलैंड के संवैधानिक न्यायालय के पर खड़ी पुलिस

वारसॉ में स्थित पोलैंड के संवैधानिक न्यायालय के पर खड़ी पुलिस

टस्क सरकार का रुख: 'कानून का शासन बहाल करना दर्दनाक जरूर है, पर जरूरी'

इस विवाद के केंद्र में प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क हैं, जो 2023 में सत्ता में आए थे। यूरोपीय संघ (EU) के साथ संबंधों को सुधारने और न्यायपालिका की स्वायत्तता को वापस लाने के वादे पर टस्क चुनाव जीते थे। प्रधानमंत्री टस्क ने 'X' पर अपनी सरकार की कार्रवाई का बचाव करते हुए लिखा कि "कानून के शासन को बहाल करना हमारा नैतिक कर्तव्य है। PiS शासन के वर्षों के अराजक माहौल के बाद यह प्रक्रिया कठिन है, कभी-कभी दर्दनाक भी, और इसके लिए कड़े फैसलों की जरूरत है। इसके अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है।"

अटलांटा (अमेरिका) में G20 विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान जब समाचार एजेंसी ANI ने पोलैंड के विदेश मंत्री रादोस्लाव सिकोरस्की से इस संकट पर सवाल पूछा, तो सिकोरस्की ने स्पष्ट कहा कि निवर्तमान राष्ट्रपति और उनके पसंदीदा जज जनता द्वारा चुनी गई बहुमत की सरकार को काम करने से रोक रहे थे, न वे कानून बनाने दे रहे थे, न व्याख्या करने दे रहे थे और न ही अपना बजट पास करने दे रहे थे। इसलिए ट्रिब्यूनल को काम करने लायक बनाने के लिए यह एक्शन अनिवार्य हो गया था।"

2015 से चली आ रही इस विवाद की जड़ें कहां हैं?

यह विवाद शुक्रवार को अचानक पैदा नहीं हुआ, बल्कि इसकी जड़ें 2015 में हैं। 2015-2023 तक जब जब राइट-विंग लॉ एंड जस्टिस (PiS) पार्टी सत्ता में थी, तो उस पर आरोप लगे कि उसने न्यायपालिका का राजनीतिकरण कर दिया और अपने वफादार जजों को शीर्ष पदों पर बिठा दिया। यूरोपीय संघ ने पोलैंड पर आर्थिक जुर्माना भी लगाया था। 2023 में जब डोनाल्ड टस्क पीएम बने, तो उन्होंने PiS द्वारा नियुक्त जजों के फैसलों को अवैध मानना शुरू कर दिया। 2026 की शुरुआत में तनाव तब और बढ़ा, जब राष्ट्रपति नावरोकी ने संसद द्वारा चुने गए 6 में से 3 जजों को शपथ दिलाने से मना कर दिया। जवाब में, चीफ जस्टिस बोगदान श्वेचकोव्स्की ने संसद द्वारा चुने जजों को कोर्ट में बैठने ही नहीं दिया। इसी गतिरोध के बीच जज अन्ना कोरविन-पियोत्रोव्स्का, जिनका कार्यकाल और भागीदारी श्वेचकोव्स्की द्वारा रोकी जा रही थी, ने अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर चीफ जस्टिस पर "कर्तव्यहीनता" का आरोप लगाकर उन्हें सस्पेंड कर दिया।

विपक्ष ने कहा: "पोलैंड एक पुलिस स्टेट बन गया है"

विपक्षी PiS पार्टी के कद्दावर नेता और पूर्व प्रधानमंत्री यारोस्लाव काचिनस्की ने टस्क सरकार पर लोकतंत्र को कुचलने का आरोप लगाते हुए बेहद कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया। काचिनस्की ने कहा कि "आज से पोलैंड एक पुलिस स्टेट बन गया है, और यहां से तानाशाही और सर्वसत्तावाद की ओर सीधा रास्ता जाता है। ट्रिब्यूनल हमारी आजादी और संप्रभुता की गारंटी था, जिसे टस्क रौंद रहे हैं।" यूरोपीय संसद की सदस्य और पोलैंड की पूर्व पीएम बीता शिदलो ने लिखा कि टस्क सरकार द्वारा भेजी गई पुलिस ने स्वतंत्र संवैधानिक अदालत पर हमला बोला है और सुरक्षा रिकॉर्ड्स व वाइस-प्रेसिडेंट को बाहर कर दिया है। पूर्व न्याय मंत्री जियोब्रो ने कहा, "यह संवैधानिक व्यवस्था पर एक खुला और आपराधिक हमला है। मैं देशवासियों से अपील करता हूं कि वे निर्भीक होकर इसका विरोध करें।"

आने वाले दिन मुश्किल

संवैधानिक ट्रिब्यूनल के चीफ जस्टिस के सस्पेंशन और राष्ट्रपति नावरोकी के वारसॉ लौटने के बाद पोलैंड में कार्यपालिका और न्यायपालिका का टकराव चरम पर पहुंच गया है। एक तरफ टस्क सरकार यह संदेश देना चाहती है कि वह पुरानी PiS सरकार की "अवैध नियुक्तियों" को उखाड़ फेंकेगी, वहीं दूसरी तरफ विपक्ष और राष्ट्रपति इसे लोकतंत्र का अंत बताकर सड़कों पर उतरने की तैयारी में हैं। क्या पोलैंड की अदालतें फिर से निष्पक्ष रूप से काम कर पाएंगी, या फिर दो राजनीतिक दिग्गजों, टस्क और नावरोकी की इस जंग में पोलैंड का संविधान और उसकी संस्थाएं पिसकर रह जाएंगी? आने वाले कुछ दिन पोलैंड के भविष्य के लिए बेहद निर्णायक साबित होने वाले हैं।

End of Article