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‘सेना के समर्थन से सत्ता पर कब्जा...’, इमरान खान के गढ़ में शहबाज-मुनीर ने क्यों लगाई इमरजेंसी?

पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में आपातकाल और गवर्नर शासन लागू करने के फैसले पर विवाद बढ़ गया है। इंटरनेशनल ह्यूमन राइट्स फाउंडेशन ने इसे सेना के समर्थन से सत्ता पर कब्जे जैसा कदम बताते हुए हिरासत में लिए गए नेताओं की रिहाई और लोकतांत्रिक अधिकारों की बहाली की मांग की है। वहीं, एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी मानवाधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर संभावित प्रतिबंधों को लेकर चिंता जताई है।

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जानें इमरान खान के गढ़ में इमरजेंसी पर क्यों भड़के मानवाधिकार संगठन। AI IMAGE

पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में आपातकाल लागू करने और गवर्नर शासन के फैसले को लेकर विवाद गहरा गया है। इंटरनेशनल ह्यूमन राइट्स फाउंडेशन ने इस कदम की आलोचना करते हुए इसे ‘सेना के समर्थन से सत्ता पर कब्जा’ करार दिया है। संगठन ने पूर्व मुख्यमंत्री सोहेल अफरीदी समेत हिरासत में लिए गए सभी नेताओं की रिहाई और लोकतांत्रिक अधिकारों की बहाली की मांग की है। वहीं, एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी चेतावनी दी है कि आपातकाल के नाम पर मानवाधिकारों और असहमति की आवाज को दबाया नहीं जाना चाहिए।

मानवाधिकार संगठन ने क्या कहा?

इंटरनेशनल ह्यूमन राइट्स फाउंडेशन ने मंगलवार को सोशल मीडिया मंच एक्स पर एक पोस्ट में खैबर पख्तूनख्वा के हालात पर चिंता जताई। संगठन ने सड़कों पर सैनिकों की मौजूदगी, निर्वाचित मुख्यमंत्री की हिरासत और इंटरनेट सेवाओं में बाधा का जिक्र करते हुए पाकिस्तान सरकार के फैसले पर सवाल उठाए।

संगठन ने कहा कि सोहेल अफरीदी और हिरासत में लिए गए अन्य नेताओं को रिहा किया जाना चाहिए तथा आपातकाल का आदेश वापस लिया जाना चाहिए। फाउंडेशन के मुताबिक, किसी सरकारी आदेश के जरिए लोगों के अधिकारों को मनमाने ढंग से खत्म नहीं किया जा सकता।

पाकिस्तान सरकार ने क्यों लगाया आपातकाल?

पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने 11 अक्टूबर को संघीय मंत्रिमंडल की सिफारिशों के बाद खैबर पख्तूनख्वा में आपातकाल और गवर्नर शासन लागू करने की मंजूरी दी। यह प्रांत पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) का मजबूत राजनीतिक गढ़ माना जाता है।

पाकिस्तान सरकार ने इस फैसले के पीछे आतंकवादी हमलों में बढ़ोतरी और प्रांतीय सरकार के सुरक्षा व्यवस्था संभालने में नाकाम रहने का हवाला दिया है। सरकार का दावा है कि प्रांत में संवैधानिक व्यवस्था प्रभावित हो रही थी और आतंकवाद से निपटने के लिए संघीय हस्तक्षेप जरूरी हो गया था। हालांकि, पीटीआई ने सरकार के कदम का विरोध किया है। पार्टी ने इसे राजनीतिक कार्रवाई बताते हुए फैसले को चुनौती देने की बात कही है।

सोहेल अफरीदी समेत कई नेताओं को हिरासत में लेने का दावा

आपातकाल लागू होने के बाद खैबर पख्तूनख्वा के मुख्यमंत्री सोहेल अफरीदी और प्रांतीय मंत्रिमंडल के सदस्यों ने अपने पद खो दिए। रिपोर्टों के मुताबिक, अफरीदी समेत कई नेताओं और पार्टी कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया है। इस घटनाक्रम के बाद प्रांत में राजनीतिक तनाव बढ़ गया है। पीटीआई ने अपने नेताओं की हिरासत और संघीय सरकार के हस्तक्षेप पर सवाल उठाए हैं। वहीं, सरकार का कहना है कि सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं।

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी जताई चिंता

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी पाकिस्तान में आपातकाल और गवर्नर शासन लागू करने पर चिंता जताई है। संगठन के दक्षिण एशिया उपनिदेशक बाबू राम पंत ने कहा कि प्रमुख राजनीतिक नेताओं की कथित मनमानी हिरासत और इंटरनेट सेवाओं में रुकावट से इन उपायों की जरूरत और उनके अनुपात को लेकर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने कहा कि आपातकाल मानवाधिकारों पर कार्रवाई करने, असहमति को दबाने या सत्ता को एक जगह केंद्रित करने का खुला अधिकार नहीं है। संगठन ने अधिकारियों से आपातकाल के तहत उठाए जाने वाले कदमों की स्वतंत्र निगरानी सुनिश्चित करने और यह ध्यान रखने की अपील की कि कोई भी प्रतिबंध केवल जरूरत के मुताबिक और उचित सीमा तक ही लगाया जाए।

आपातकाल से प्रांत की सत्ता व्यवस्था में क्या बदलाव आया?

पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 232 के तहत राष्ट्रीय आपातकाल और अनुच्छेद 234 के तहत प्रांतीय शासन से जुड़ी विशेष व्यवस्था लागू की जा सकती है। मौजूदा फैसले के तहत प्रांतीय विधानसभा की शक्तियां संघीय संसद के पास चली गई हैं, जबकि मुख्यमंत्री और प्रांतीय मंत्रिमंडल के सदस्य पद पर नहीं रहेंगे।

इस व्यवस्था से प्रांत के प्रशासन पर संघीय सरकार का नियंत्रण बढ़ गया है। साथ ही, सभा करने, संगठन बनाने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे मौलिक अधिकारों पर संभावित प्रतिबंधों को लेकर भी चिंता जताई जा रही है। खैबर पख्तूनख्वा में जारी घटनाक्रम ने पाकिस्तान में सुरक्षा व्यवस्था, निर्वाचित सरकार के अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं के बीच संतुलन को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

Piyush Kumar
पीयूष कुमारauthor

पीयूष कुमार टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल के न्यूज डेस्क पर Senior Copy Editor के रूप में कार्यरत हैं। देश-दुनिया की हलचल पर उनकी पैनी नजर रहती है और इन घटनाओं को सटीक, सरल और असरदार अंदाज में खबरों की भाषा देना उनकी सबसे बड़ी ताकत है। ब्रेकिंग न्यूज की रफ्तार हो या किसी जटिल मुद्दे को आसान बनाकर समझाने वाले एक्सप्लेनर—पीयूष दोनों में बराबर दक्षता रखते हैं। न्यूज जजमेंट, फैक्ट-बेस्ड राइटिंग और एंड-टू-एंड कॉपी प्रोडक्शन पर इनकी पकड़ मजबूत है और अबतक 4,000 से अधिक स्टोरी लिख चुके हैं।

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