कट्टरपंथियों के दबाब में झुके तुर्की के राष्‍ट्रपति! महिलाओं के इस मुद्दे को लेकर हो रहा जबरदस्‍त विरोध

तुर्की महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े एक अहम अंतरराष्‍ट्रीय समझौते से अलग हो गया है। तुर्की का एक वर्ग इसे पारिवारिक संरचनाओं को कमजोर करने वाला मानता था।

कट्टरपंथियों के दबाब में झुके तुर्की के राष्‍ट्रपति! महिलाओं के इस मुद्दे को लेकर हो रहा जबरदस्‍त विरोध
कट्टरपंथियों के दबाब में झुके तुर्की के राष्‍ट्रपति! महिलाओं के इस मुद्दे को लेकर हो रहा जबरदस्‍त विरोध  |  तस्वीर साभार: AP

इस्तांबुल : महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े एक अंतरराष्ट्रीय समझौते से तुर्की को बाहर हो गया है। इसके बाद से तुर्की में विरोध-प्रदर्शनों का सिलसिला भी शुरू हो गया है। तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन के इस फैसले को लेकर विरोध जताने वालों में महिलाएं हैं, जिनका साफ मानना है कि महिलाओं के साथ होने वाली घरेलू हिंसा से निपटने के लिए इस संधि का बहाल होना जरूरी है।

महिलाओं को हिंसा से बचाने में अहम समझे वाले इस अंतरराष्‍ट्रीय समझौते से तुर्की 10 साल पहले साल 2011 में जुड़ा था। लेकिन तुर्की की सरकार ने शनिवार (20 मार्च, 2021) को इससे बाहर होने की घोषणा की। इसकी कोई साफ वजह न बताते हुए तुर्की की ओर से केवल इतना कहा गया है कि उसके कानून, संविधान में महिलाओं अधिकारों की गारंटी दी गई है और इस संबंध में देश में न्‍याय‍िक प्रणाली भी सशक्‍त व सक्रिय है।

कट्टपंथियों के दबाव में झुके एर्दोआन!

तुर्की के इस फैसले पर हालांकि हंगामा बरपा हुआ है, खासकर महिला अधिकारों की वकालत करने वालों ने इसे लेकर एर्दोआन सरकार के खिलाफ आवाज बुलंद की है। सरकार के इस फैसले को कट्टरपंथी दबाव में झुकने के तौर पर भी देखा जा रहा है। इसकी वजह संधि में उल्लिख‍ित बातें और इसे लेकर यहां उठने वाली वे आवाजें हैं, जिसमें एर्दोआन की पार्टी के कुछ पदाधिकारियों ने इसकी समीक्षा की वकालत की थी।

इस्तांबुल संधि के नाम से चर्चित इस अंतरराष्‍ट्रीय समझौते में महिलाओं और पुरुषों को समान अधिकार देने की बात कही गई है तो यह महिलाओं के खिलाफ लैंगिक हिंसा रोकने, पीड़ितों की रक्षा करने और अपराधियों पर मुकदमा चलाने के लिए कदम उठाने की जिम्‍मेदारी सरकारी अधिकारियों को सौंपती है। तुर्की का एक वर्ग इससे नाखुश था, जिनका कहना था कि यह देश के रूढ़िवादी मूल्यों के अनुरूप नहीं है।

इन रूढ़िवादियों का मानना है कि ये समझौता पारिवारिक संरचनाओं को कमजोर करता है। वे लैंगिक बराबरी का विरोध करते हैं। उनका यह भी कहना है कि इससे समाज में समलैंगिकता बढ़ेगी, इसमें सेक्शुअल ओरिएंटेशन के आधार पर भेदभाव नहीं किए जाने की बात कही गई है। इन सबके बीच तुर्की सरकार का यह फैसला एर्दोआन सरकार की नीतियों को लेकर कई सवाल खड़े करता है।

'तुर्की का फैसला विनाशकारी'

तुर्की के इस फैसले को द काउंसिल ऑफ यूरोप की महासचिव मारिजा पी ब्यूरिक ने 'विनाशकारी' करार दिया है तो यह भी कहा कि यह कदम महिलाओं की सुरक्षा और उन्‍हें हिंसा से बचाने के लिए किए जा रहे प्रयासों को एक बड़ा झटका है। तुर्की के इस कदम की आलोचना करते हुए उन्‍होंने यह भी कहा कि यह फैसला तुर्की के साथ-साथ यूरोप और दुनिया में अन्य जगहों पर भी महिलाओं की सुरक्षा के साथ समझौता करने वाला है।

इस्‍तांबुल में सड़कों पर उतरीं महिलाएं

ऐसा नहीं है कि सिर्फ यूरोपीय कार्यकर्ता तुर्की के इस कदम का विरोध कर रहे हैं। महिलाओं को सुरक्षा प्रदान करने वाले अंतरराष्‍ट्रीय संधि से अलग होने के एर्दोआन सरकार के इस फैसले के खिलाफ तुर्की में भी महिलाओं का विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गया है। शनिवार को इस्‍तांबुल में सैकड़ों महिलाओं ने इसके विरोध में प्रदर्शन किया और घरेलू हिंसा से निपटने में इसे अहम करार देते हुए इसे जल्‍द से जल्‍द लागू करने की मांग की।

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