देहरादून।
पड़ौसी राज्य उत्तर प्रदेश में आजकल किसानों को खाद की कमी से जूझ रहें हैं किसान सड़कों पर है। लगातार इस तरह की कमियां देखने को मिल रही है। उत्तराखण्ड भी इस कमी से अछूता नहीं है उत्तराखण्ड एक पहाड़ी राज्य है, जहां कृषि मुख्य रूप से खरीफ और रबी फसलों पर निर्भर करती है। खरीफ सीजन (जून-जुलाई से सितंबर-अक्टूबर) में धान, मक्का, और बाजरा जैसी फसलें प्रमुख हैं, जिनके लिए यूरिया, डीएपी (डाय-अमोनियम फॉस्फेट), और एनपीके जैसे उर्वरकों की आवश्यकता होती है। हालांकि, खाद की कमी की समस्या समय-समय पर देश के विभिन्न हिस्सों में सामने आती रही है, और उत्तराखंड भी इससे प्रभावित हो सकता है। आपको बता दें पिछले 3 महीनों से उत्तराखंड में मानसून प्रभावित है जिसकी वजह से किसानों को खेती करने में दिक्कत आ रही है। अनुमान लगाया जा रहा है कि आने वाले 15 दिनों में उत्तराखंड से मानसून में कमी आई जिसके बाद किसानों को खाद की कमी सता सकती है। जब हमारी बात कुछ किसान नेताओं से हुई तो उन्होंने भी इसी तरह की आशंका जताई आइए जानते हैं आखिर हम ऐसा अनुमान क्यों लगा रहे हैं।
उपलब्ध जानकारी के आधार परखाद की आपूर्ति और वितरण:
उत्तराखंड में खेती का क्षेत्र सीमित है, जिसमें कुल भौगोलिक क्षेत्र का केवल 16% हिस्सा कृषि योग्य है। यह कम क्षेत्रफल खाद की मांग को अन्य बड़े कृषि राज्यों (जैसे उत्तर प्रदेश या पंजाब) की तुलना में कम करता है, लेकिन आपूर्ति में देरी या कालाबाजारी जैसी समस्याएं छोटे किसानों को प्रभावित कर सकती हैं। हाल के वर्षों में, खासकर 2024 और 2025 में, उत्तर प्रदेश और पंजाब जैसे पड़ोसी राज्यों में डीएपी और यूरिया की कमी की शिकायतें दर्ज की गई हैं। उत्तराखंड में भी समान समस्याएं हो सकती हैं, खासकर खरीफ सीजन के दौरान, जब मांग बढ़ जाती है। आपको बता दें कि उत्तराखण्ड में खेती की बेहद सीमित जमीन है खासकर हरिद्वार और उधम सिंह नगर कुछ छोड़कर पहाड़ों में खेती की ज़मीन की बेहद ज्यादा कमी है लेकिन किसान नेताओं का कहना है कि आने वाले समय में उन्हें खाद। की कमी का सामना करना पड़ेगा इसके लिए वह एक बड़े आंदोलन। करने की तैयारी भी कर रहे हैं।
उत्तर प्रदेश में, 18 अगस्त 2025 तक, 37.70 लाख मीट्रिक टन यूरिया उपलब्ध था, जिसमें से 31.62 लाख मीट्रिक टन की खरीद हो चुकी थी, और 9.25 लाख मीट्रिक टन डीएपी उपलब्ध था, जिसमें से 5.38 लाख मीट्रिक टन बिक चुका था। उत्तराखंड में भी समान आपूर्ति व्यवस्था होने की संभावना है, लेकिन छोटे पैमाने पर।
खाद की कालाबाजारी:
उत्तर प्रदेश और हरियाणा में खाद की कालाबाजारी की शिकायतें सामने आई हैं, जहां किसानों को बाजार में 1350 रुपये प्रति 50 किलो की निर्धारित दर के बजाय 2000 रुपये तक चुकाने पड़े। उत्तराखंड में भी, विशेष रूप से देहरादून, हरिद्वार, और उधमसिंह नगर जैसे मैदानी क्षेत्रों में, जहां कृषि गतिविधियां अधिक हैं, ऐसी समस्याएं हो सकती हैं।
उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्रों में परिवहन और भंडारण की चुनौतियों के कारण खाद की समय पर उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।
सरकारी प्रयास:
भारत सरकार ने डीएपी की कीमतों में कमी के लिए 2025 में अतिरिक्त सब्सिडी की घोषणा की, जिससे 50 किलो डीएपी की कीमत 1500 रुपये तक कम हो गई। यह उत्तराखंड के किसानों के लिए राहत हो सकती है।
उत्तराखंड में जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन (NMNF) लागू किया गया है, जिसके तहत जैविक खाद और जैव-उर्वरकों का उपयोग प्रोत्साहित किया जा रहा है। यह रासायनिक खाद की कमी को कम करने में मदद कर सकता है।
प्राकृतिक आपदाओं का प्रभाव:
अनुमान लगाया जा रहा है कि उत्तराखंड में 2025 में भारी बारिश और बादल फटने की घटनाएं (जैसे धराली गांव में) दर्ज की गईं, जिससे परिवहन और आपूर्ति श्रृंखला बाधित हुई। इससे खाद की डिलीवरी में देरी हो सकती है, विशेष रूप से पहाड़ी क्षेत्रों में।
आंकड़े (सामान्य अनुमान):
यूरिया खपत: उत्तराखंड में यूरिया की खपत अन्य बड़े राज्यों की तुलना में कम है। उत्तर प्रदेश में 2024 के खरीफ सीजन में 39 लाख मीट्रिक टन यूरिया की खपत हुई, जिसमें 19 अगस्त 2025 तक 32.07 लाख मीट्रिक टन बिक चुका था। उत्तराखंड में यह मात्रा अनुपातिक रूप से कम होगी, संभवतः 1-2 लाख मीट्रिक टन के आसपास।
डीएपी मांग: उत्तराखंड में डीएपी की मांग भी सीमित है, लेकिन खरीफ सीजन में धान और मक्का की बुवाई के लिए इसकी आवश्यकता बढ़ जाती है। पंजाब में 2024 के रबी सीजन के लिए 5.5 लाख मीट्रिक टन डीएपी की जरूरत थी, जबकि उत्तराखंड में यह मांग कुछ हज़ार मीट्रिक टन तक है।
नैनो डीएपी: छत्तीसगढ़ में डीएपी की कमी को पूरा करने के लिए 3 लाख से अधिक बोतल नैनो डीएपी का भंडारण किया गया। उत्तराखंड में भी इस तरह के वैकल्पिक उर्वरकों का उपयोग शुरू करने की योजना बनाई जा रही है।
