प्रेमानंद महाराज जी पंचकोसी परिक्रमा
Premanand Maharaj SaptKosi Prikrama 2025: एक दिसंबर को मोक्षदा एकादशी और गीता जयंती के पावन पर्व पर वृंदावन के परम पूज्य संत श्री प्रेमानंद जी महाराज ने सप्तकोसीय परिक्रमा का शुभारंभ किया। उनके साथ चलते भक्तों के राधा-नाम के गुणगान से पूरा परिक्रमा मार्ग भक्ति रस में डूब गया।
प्रेमानंद जी महाराज सोमवार सुबह करीब 8 बजे छटीकरा मार्ग होते हुए राधाकुंड पहुंचे। वहीं से ही महाराज जी ने गिरिराज गोवर्धन की पावन सप्तकोसीय परिक्रमा का शुभारंभ किया। परिक्रमा के दौरान महाराज जी हर प्रमुख स्थान पर रुके और स्वयं गिरिराज प्रभु की शिला का गंगाजल से अभिषेक किया। कुसुम सरोवर, हरगोकुल, मानसी गंगा, मुखारविंद और दान घाटी पर उन्होंने फूल-चंदन चढ़ाया, दीप जलाया और आरती उतारी। भक्तों ने भी महाराज जी के साथ मिलकर पूरे मन से पूजन किया।
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परिक्रमा मार्ग पर मंजीरे, ढोलक, मृदंग और झांझ-मंजीरा की ध्वनि गूंज रही थी। भक्तों का एक बड़ा जत्था महाराज जी के पीछे-पीछे कीर्तन करते चल रहा था। कोई ‘राधे-राधे’ बोल रहा था तो कोई हरे कृष्ण महामंत्र का जप कर रहा था। पूरा गोवर्धन क्षेत्र राधा-रस में सराबोर हो गया। कई भक्त भाव-विभोर होकर रो रहे थे।
भक्तों की भारी भीड़ को देखते हुए प्रशासन पूरी तरह मुस्तैद रहा। परिक्रमा मार्ग पर भारी पुलिस बल तैनात रहा ताकि किसी तरह की असुविधा न हो। सुरक्षा व्यवस्था चुस्त-दुरुस्त रही और परिक्रमा पूरी तरह शांतिपूर्ण और आनंदमयी संपन्न हुई।
सप्तकोसी यानी सात कोस (लगभग 21 किलोमीटर) की पूरी परिक्रमा गोवर्धन पर्वत के चारों ओर घूमकर की जाती है। यह यात्रा मानसी गंगा कुंड से शुरू होती है और फिर से वहीं आकर पूरी होती है। रास्ते में राधा कुंड, श्याम कुंड, गोविंद कुंड, कुसुम सरोवर, दानघाटी मंदिर जैसे कई पवित्र स्थल आते हैं। पूरी परिक्रमा में करीब 6 से 8 घंटे लगते हैं।
हर साल लाखों भक्त गोवर्धन की 21 किलोमीटर लंबी परिक्रमा करते हैं। माना जाता है कि यही वो पावन पर्वत है जिसे बाल-रूप श्रीकृष्ण ने अपनी छोटी उंगली पर सात दिन तक उठाए रखा था। इंद्र के प्रकोप से ब्रजवासियों को बचाने वाली यह लीला इतनी चमत्कारी थी कि आज भी गोवर्धन के हर कंकड़-पत्थर में श्रीकृष्ण-राधा का वास माना जाता है। जो भी श्रद्धा-भक्ति से इसकी परिक्रमा करता है, उसके जीवन में सुख-शांति, समृद्धि और भगवान की सीधी कृपा बरसने लगती है।
सुबह जल्दी उठकर स्नान करें, साफ-सुथरे कपड़े पहनें और मानसी गंगा पहुंचें। वहां डुबकी लगाएं या आचमन करें। गिरिराज महाराज को प्रणाम करें और संकल्प लें कि आप पूरी श्रद्धा से सप्तकोसी परिक्रमा करेंगे। फिर नंगे पांव या मोजे पहनकर यात्रा शुरू करें। रास्ते में हर मंदिर में दर्शन करें, भजन गाते चलें। दानघाटी मंदिर में गिरिराज का दूध-दही से अभिषेक देखना न भूलें। राधा कुंड और श्याम कुंड का जल माथे से जरूर लगाएं। परिक्रमा पूरी होने पर फिर मानसी गंगा में स्नान करके गिरिराज को धन्यवाद दें।
अगर एक दिन में 21 किमी चलना मुश्किल लगे तो दो दिन में भी परिक्रमा की जा सकती है। पहले दिन मानसी गंगा से राधा कुंड तक (लगभग 11-12 किमी) चलें और राधा कुंड में रात रुकें। अगले दिन बाकी परिक्रमा पूरी करके वापस मानसी गंगा लौट आएं। फिर भी एक ही दिन में पूरी करने का पुण्य सबसे ज्यादा बताया गया है।
शास्त्रों में कहा गया है कि गोवर्धन परिक्रमा करने से जाने-अनजाने हुए सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। संतान, धन, स्वास्थ्य और वैवाहिक सुख की हर मनोकामना पूरी होती है। जीवन में आ रही बड़ी-बड़ी बाधाएं अपने आप दूर हो जाती हैं।
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