सावन में कांवड़ यात्रा पर कोरोना ने लगाया 'ग्रहण', क्या है भक्ति के इस 'विराट' स्वरूप के मायने

Kavad Yatra in Sawan: 6 जुलाई से सावन का महीना शुरू हो रहा है। लेकिन इस बार भोले के भक्तों के लिए कांवड़ नहीं होगी और वह इसके जरिए अपने अराध्य को जलाभिषेक नहीं कर पाएंगे।

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सावन और कांवड़ यात्रा का आपस में गहरा संबंध है।   |  तस्वीर साभार: BCCL

मुख्य बातें

  • सावन का महीना 6 जुलाई से शुरू हो रहा है
  • कोरोना की वजह से देशभर में कांवड़ यात्रा स्थगित है
  • देश में सभी जगहों पर कांवड़ यात्रा को लेकर पाबंदी है

नई दिल्ली: सावन का महीना 6 जुलाई से शुरू हो रहा है। सावन महीने का एक अलग महत्व है। एक तरफ हरियाली के लिहाज से यह महीना जाना जाता है तो दूसरी तरफ भोले के भक्तों के लिए यह महीना उत्साह भरने वाला होता है। क्योंकि इस समय भगवान शंकर के मंदिरों में खासकर सोमवार के दिन उनकी भक्ति और जल अर्पित करने के लिए भारी भीड़ उमड़ती है। सावन के महीने में बारिश भी खूब होती है लिहाजा इस समय प्राकृतिक और आध्यात्मिक श्रृंगार का तारतम्य देखते ही बनता है।

सावन के महीने में भगवान शंकर के जलाभिषेक का विशेष महत्व है। पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक भोले जलाभिषेक से जल्‍द प्रसन्‍न होते हैं और भक्‍तों की इच्छाएं बड़ी जल्‍दी पूरी कर देते हैं। इस विशेष माह में भक्‍त लाखों की संख्‍या में कांवड़ यात्रा में हिस्‍सा लेते हैं। कांवड़ यात्रा करने के लिए शिव भक्‍त दूर-दूर से अपने कांवड में गंगाजल भर कर शिव मंदिर की ओर प्रस्‍थान करना शुरू कर देते हैं लेकिन इस बार कोरोना की वजह से ऐसा नहीं होगा। सावन के महीने में भोले के भक्त भक्ति जरूर करेंगे लेकिन कांवड़ यात्रा के जरिए यह नहीं होगा। ऐसा पहली बार शायद होगा जब एक महामारी की वजह से सदियों पुरानी परंपरा पर ब्रेक लगेगा।

कांवड़ यात्रा पर देशभर में पाबंदी

देशभर में कांवड़ यात्रा के लिए देवघर में बाबा बैधनाथ धाम काफी चर्चित है। पिछले 200 साल से यहां श्रावणी मेले का आयोजन होता आया है और कांवड़िए भगवान शंकर पर जलाभिषेक करते हैं। इस बार राज्य सरकार ने कांवड़ यात्रा निकालने की अनुमति देने से इंकार कर दिया है जिसकी वजह कोरोना है। सरकार ने राज्य में लॉकडाउन की अवधि 31 जुलाई तक बढ़ा दी है। इसके अलावा धार्मिक स्थल खोलने, मेले और सामाजिक आयोजन पर भी रोक जारी है। ऐसे में कांवड़ यात्रा की अनुमति नहीं दी सकती। मान्यता यह भी है कि कांवड़ यात्रा की शुरुआत वैद्यनाथ धाम मंदिर से ही देशभर में शुरू हुई।

महाकाल-हरिद्वार में भी कांवड़ पर पाबंदी 

महाकाल की नगरी उज्जैन की बात करें तो श्रावण मास में कावड़ यात्रियों का शहर में प्रवेश प्रतिबंध है। महाकालेश्वर मन्दिर में श्रावण मास में भस्म आरती का समय बदलने से दर्शनार्थियों को भगवान महाकाल के दर्शन प्रात: 5.30 बजे से रात्रि 9 बजे तक हो सकेंगे। नागपंचमी पर्व पर भगवान नागचंद्रेश्वर के स्क्रीन के जरिए से लाईव दर्शन होंगे। नागचंद्रेश्वर मन्दिर में दर्शनार्थियों के प्रवेश पर प्रतिबंध रहेगा। कोरोना के संक्रमण को देखते हुए उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से छह जुलाई से शुरू होने वाली कांवड़ यात्रा को स्थगित कर दिया गया है। उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश और हरियाणा के पुलिस अधिकारियों की बैठक में तय किया गया कि श्रद्धालुओं को अपने अपने क्षेत्र में सख्ती के साथ रोका जाएगा। इसके बावजूद  यदि कोई श्रद्धालु हरिद्वार आता है तो उसे 14 दिन के लिए क्वारंटीन किया जाएगा।

क्या है कांवड़ का अर्थ?

कांवड़ का मूल शब्द 'कावर' है जिसका मतलब कंधा होता है। यानी भगवान के लिए कंधे पर भार उठाना। कंधे पर भार को कुछ देर तक रखना और फिर उसे त्वदीयं वस्तु गोविंदम तुभ्यमेव समर्पयेत के तर्ज पर अर्पित करना। कांवड़ का एक और अर्थ परात्पर शिव के साथ विहार भी है। कांवड़ यात्रा के पीछे यह आशय होता है कि कि गंगा भगवान शिव की जटाओं में विराजमान हैं और उन्हें वह बहुत प्रिय भी है। इसलिए भगवान शंकर पर कांवड़ के जरिए कांवड़िए जलाभिषेक करते हैं। कंधे पर गंगा को धारण किए श्रद्धालु इसी आस्था और विश्वास को जीते हैं और कांवड़ यात्रा के जरिए भोले की भक्ति करते हैं। सावन में श्रद्धालु कांवड़ में पवित्र जल लेकर एक स्थान से लेकर दूसरे स्थान जाकर शिवलिंगों का जलाभिषेक करते हैं। यह परंपरा कब शुरू हुई इसका प्रमाण तो नहीं मिलता लेकिन झारखंड के देवघर में बाबा वैद्यनाथ धाम मंदिर से इसकी शुरुआत मानी जाती है। 
 

डिस्क्लेमर: इस प्रस्तुत लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं और टाइम्स नेटवर्क इन विचारों से इत्तेफाक नहीं रखता है।

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