आर्थिक तौर पर भी देश कराह रहा है। ये ऐसा विरला देश है जो 1958 से लगातार आईएमएफ के सामने गिड़गिड़ाता रहा है और अब तक 24 बेल आउट पैकेज झोली में गिरवा चुका है। ये मदद उसके व्यवस्थित आर्थिक कुप्रबंधन का परिणाम है। देश का आर्थिक मॉडल ध्वस्त हो चुका है। दिवालिया देश दिखता कुछ और है और खुद को दिखाता कुछ और है। अपनी संरचनात्मक कमजोरियों पर गंभीरता से विचार करने के बजाय लगातार छुपाने में यकीन रखता है।
पाकिस्तान की 40 फीसदी से ज्यादा आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रही है, लेकिन मुल्क के लिए ये कोई बड़ी बात नहीं है। उसके लिए ये सब सामान्य सी बात है।
सबसे हैरानी की बात ये है कि महज 2.4 प्रतिशत आबादी ही रिटर्न फाइल करती है (पाकिस्तान के फेडरल बोर्ड ऑफ रेवेन्यू ने 2024 में डेटा जारी किया था)। कह सकते हैं कि कर प्रणाली भी एक तमाशे से ज्यादा कुछ नहीं है और हुक्मरान तमाशबीन से ज्यादा कुछ नहीं!
इस देश की दुर्दशा की कहानी वैश्विक भूख सूचकांक (ग्लोबल हंगर इंडेक्स) भी कहता है। 127 देशों की फेहरिस्त में पाकिस्तान 109वें पायदान पर है। यहां करीब 82 प्रतिशत आबादी स्वस्थ आहार का खर्च तक उठाने में असमर्थ है।
बात सैन्य हथियारों की करें तो सेना जिन हथियारों का ढिंढोरा पीटती रही, उसे तो भारत के एयर डिफेंस सिस्टम ने धूल में मिला दिया। इनके टैंक खराब हो जाते हैं, प्रशिक्षण के दौरान जेट दुर्घटनाग्रस्त हो जाते हैं। चीन और तुर्की से आयात किए कई ड्रोन अक्सर मिशन के बीच में ही विफल हो जाते हैं। हाल ही में बड़े पैमाने पर भारतीय स्थानों पर 400 ड्रोन तैनात किए गए जो लगभग पूरी तरह से विफल हो गए। ये ड्रोन अधिकतर नागरिक क्षेत्रों में रोके गए या दुर्घटनाग्रस्त हो गए।
सेना और सरकार भू-राजनीतिक रणनीति को लेकर भी जाल बुनती है। पाकिस्तान ने चीन की बेल्ट एंड रोड पहल से इतनी हताशा में हाथ मिलाया कि वह आर्थिक रूप से खुद को नुकसान पहुंचाने की हद तक पहुंच गया है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा जिसे गेम चेंजर साझेदारी के रूप में प्रचारित किया गया, अब दम तोड़ रहा है। इस क्षेत्र में रहने वाले लोग जबरदस्त विरोध कर रहे हैं, जिस कारण ड्रैगन भी कुछ खास प्रसन्न नहीं है।
बलूचिस्तान खुद को पहले ही पाकिस्तान से आजाद करने की मुनादी कर चुका है। बीएलए ने पाकिस्तानी सेना की ताकत की कलई खोल दी है तो देश के भीतर बेरोजगारी जैसे मुद्दों ने हुक्मरानों की बोलती बंद कर रखी है।