Manifesto: सबके वादे और दावे अब सामने आए, बिहार रण में कौन मारेगा बाजी ?

बिहार विधानसभा चुनाव के लिए करीब करीब सभी राजनीतिक दलों की तरफ से घोषणापत्र जारी हो चुका है।अगर नजर डालें तो एक बात साफ है कि सभी दलों ने मतदाताओं के सामने चारा डालने की कोशिश की है।

Manifesto: सबके वादे और दावे अब सामने आए, बिहार रण में कौन मारेगा बाजी ?
बिहार में मतदाताओं को लुभाने के लिए वादों की झड़ी 

मुख्य बातें

  • बिहार में तीन चरणों में होने जा रहे हैं चुनाव, पहला चरण 28 अक्टूबर, दूसरा 3 नवंबर और तीसरा चरण 7 नवंबर
  • सभी दलों की तरफ से घोषणापत्र जारी,लोकलुभावन वायदों की भरमार
  • 10 लाख नौकरी के तेजस्वी यादव के वादे के जवाब में 19 लाख नौकरियों के सृजन पर बीजेपी का दांव

पटना। बिहार विधानसभा चुनाव में राजनीतिक दलों को तीन चरणों में परीक्षा देनी है, और उसका नतीजा 10 नवंबर को सामने आएगा। एक अच्छे परीक्षार्थी की तरह सभी दल बेहतर करने का दावा कर रहे हैं कि इस बार बिहार की जनता का सेवा करने का मौका उन्हें जरूर मिलेगा और उसके लिए राजनीतिक दलों की तरफ से लोकलुभावन घोषणाएं भी की गई हैं कि सत्ता मिलने पर वो बहुत कुछ बदल देंगे। राज्य के सभी दलों के घोषणापत्र अलग अलग नामों से अब सबके सामने हैं। 

सबके दावे और सबके वादे
कांग्रेस ने अपने बदलाव पत्र में बदले हुए बिहार का सपना दिखाया है जिसमें वो लोगों को रोजगार देगी, किसानों की मुंहमागे दाम मिलेंगे, बेटियों को सुरक्षा मिलेगी, तो लोकजनशक्ति पार्टी की तरफ करीब करीब उन्हीं सभी बातों को दोहराने की कोशिश की गई है। तेजस्वी यादव पहले से ही कह रहे हैं कि सरकार बनते ही पहली कैबिनेट मीटिंग में 10 लाख नौकरियों पर मुहर लगाएंगे। अब यही एक ऐसा बिंदू है जहां बीजेपी और जेडीयू की राय एक दूसरे से अलग हो गई। नीतीश कुमार ने जहां एक तरफ तेजस्वी यादव के इस वादे को अनुभव की कमी बताते हैं तो दूसरी तरफ बीजेपी को शायद यह समझ में आया कि यह तुरुप का पत्ता साबित हो सकता है। लिहाजा 19 लाख के रोजगार का वादा कर दिया। 

जनता इसलिए झुक जाती है
सभी राजनीतिक दलों के घोषणापत्र पर नजर डालें तो इसमें शक नहीं कि अगर सभी शब्द जमीन पर उतार लिए जाएंगे तो बिहार देश का नंबर एक राज्य बन सकता है। लेकिन उन वादों को पूरा करने के लिए संसाधन कहां से जुटाएंगे इस मुद्दे पर खामोशी है। जानकार कहते हैं कि इस बड़े विषय पर राजनीतिक दल या तो जवाब नहीं देते या सुविधा के हिसाब से बताते हैं। जहां तक जनता का सवाल है तो वो खुद के लिए तुरंत का फायदा देखती है, लिहाजा जिस दल का घोषणापत्र ज्यादा लुभावना होता है जनता उस तरफ मुड़ जाती है। 

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