Why is football famous in West Bengal: भारत में जब भी फुटबॉल की बात होती है तो सबसे पहले नाम आता है बंगाल का। कोलकाता को तो 'फुटबॉल का मक्का' तक कहा जाता है। कोलकाता की धरती पर पेले, रोनाल्डो और मेस्सी जैसे फुटबॉल के सबसे बड़े सितारे भी मैच खेल चुके हैं। आज भी जब फुटबॉल का विश्व कप होता है, तो बंगाल का हर कोना बदल जाता है। किसी का घर अर्जेंटीना के रंगों में रंगा होता है, तो किसी की दीवारों पर डियेगो मैराडोना और मेस्सी की तस्वीरें होती हैं। यह भी दिलचस्प है कि भारत खुद विश्व कप में नहीं खेलता, फिर भी बंगाल में विश्व कप एक निजी उत्सव बन जाता है। यह दीवानगी बताती है कि यहां फुटबॉल देश से भी बड़ा एक भाव बन चुका है, जहां लोग अपनी पसंदीदा टीम में खुद को ढूंढते हैं।
यह कहना कहीं से गलत नहीं होगा कि बंगालियों की रगों में फुटबॉल खून की तरह दोड़ता है। सीनियर स्पोर्ट्स जर्नलिस्ट आकाश बिस्वास का मानना है कि अगर आपने कभी किसी बंगाली फुटबॉल प्रेमी से बात नहीं की, तो शायद आपने जुनून का असली मतलब ही नहीं जाना। बंगाल के लोग फुटबॉल क्लबों के बारे में ऐसे बात करते हैं जैसे परिवार की कहानी हो। हर बंगाली या तो मोहन बागान को फैन होगा या फिर ईस्ट बागान क्लब का। किसी की जान अर्जेंटीना में बसती है तो किसी की ब्राजील में।
बंगाल की रगों में खून के साथ दौड़ता है फुटबॉल (AI Image)
दरअसल फुटबॉल बंगालियों के लिए महज एक खेल नहीं है। यह एक भावना, एक संस्कृति, एक पहचान और कई बार तो धर्म तक बन जाता है। बंगाली दुनिया में कहीं भी रहे, लेकिन मोहनबागान, ईस्ट बंगाल या मोहम्मदन स्पोर्टिंग जैसे क्लबों के नाम सुनते ही उसकी आंखों में अजीब सी चमक जरूर आ जाती है।
सीनियर आईटी प्रफेशनल सौरीश दत्ता अभी रह तो मेलबर्न में रहे हैं लेकिन बंगाल का फुटबॉल आज भी उनकी आत्मा में बसता है। वह बताते हैं कि बंगाल हमेशा से काफी गरीब रहा है। जहां क्रिकेट जैसे दूसरे खेल काफी महंगे होते हैं वहीं फुटबॉल के लिए सिर्फ एक बॉल की जरूरत होती है। बंगाल में फुटबॉल की लोकप्रियता का एक कारण ये भी है।
फुटबॉल कैसे बना बंगालियों की पहचान (AI Image)
सौरीश दत्ता ने बताया कि आज फुटबॉल के इंफ्रास्ट्रक्चर के मामले में बंगाल दुनिया में बहुत आगे पहुंच चुका है। कोलकाता में दुनिया का सबसे पुराने से लेकर विश्व का दूसरा सबसे बड़ा फुटबॉल ग्राउंड भी मिल जाएगा। हर शहर में ढेरों फुटबॉल ग्राउंड मिल जाएंगे।
अब सवाल उठता है कि जिस देश में खेल का पर्याय क्रिकेट हो और क्रिकेटर्स भगवान की तरह पूजे जाते हों, उसी देश के बंगाल में फुटबॉल इतना पॉपुलर क्यों है? क्यों बंगाल के लोगों के फुटबॉल के लिए जो दीवानगी है वह शायद दुनिया के किसी मुल्क में नहीं है। इस सवाल का जवाब जानने के लिए हमें जाना पड़ेगा ब्रिटिश काल में।
अंग्रेजों के साथ आया फुटबॉल
दूसरे खेलों की तरह फुटबॉल भी बंगाल में अंग्रेजों के साथ आया। 1870 का वह दौर जब ब्रिटिश सैनिक और अधिकारी मनोरंजन के लिए फुटबॉल खेला करते थे। फुटबॉल का मैदान उनके लिए शक्ति का प्रतीक था और भारतीय खासकर बंगाली उनकी नजर में कमजोर। 1872 में कलकत्ता फुटबॉल क्लब की नींव पड़ी। आने वाले सालों में बंगाल के कई हिस्सों में अंग्रेजों ने फुटबॉल क्लब खोले।
अंग्रेजों के साथ भारत आया फुटबॉल (AI Photo)
ब्रिटिश अधिकारियों की नजर में फुटबॉल खेलने के लिए मजबूत शरीर और फुर्ती चाहिए। उनकी नजर में ये दोनों चीजें भारतीय खासकर बंगाल के लोगों में नहीं थी। उन्हें लगता था ये कमजोर और आलसी बंगाली क्या ही फुटबॉल खेलेंगे। समय के साथ अंग्रेजों ने महसूस किया कि अगर इन बंगालियों से अपने लिए मेहनत मजदूरी का काम करवाना है तो उन्हें शारीरिक तौर पर मजबूत बनाना होगा। इसी सोच के साथ उन लोगों ने बंगालियों के लिए क्लब के सीमित दरवाजे खोल दिये।
बंगाली लड़कों ने हाथों हाथ लिया मौका
अंग्रेजों के इस फैसले को उन मिडिल क्लास बंगालियों ने हाथों हाथ लिया जो ब्रिटिश-प्रबंधित या फिर एंग्लो-इंडियन कॉलेजों में पढ़े थे। इन कॉलेजों के पूर्व छात्रों ने बंगाल में कई प्रतिष्ठित फुटबॉल क्लबों की स्थापना की। इनमें सबसे ज्यादा नाम कमाया मोहन बागान क्लब ने।
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1889 में जब भूपेन्द्र नाथ बोस मोहुन बागान क्लब की स्थापना की तो शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यही क्लब फुटबॉल के खेल में बंगाली अस्मिता का प्रतीक बनेगा। 1911 आते-आते ये सपना भी सच हो गया। दरअसल यही वह साल था जब मोहन बागान क्लब ने अंग्रेजों की ईस्ट यॉर्कशायर टीम को 2-1 से हराकर IFA शील्ड जीत लिया। अंग्रेजी सोच पर बंगालियों के फुटबॉल की यह सबसे पहली और मजबूत किक थी।
मोहन बागान ने रौंद डाला था अंग्रेजी अभिमान (AI Image)
मोहन बागान ने नंगे पैरों से रौंद दिया अंग्रेजों का गुरूर
यह वह मुकाबला था जिसमें अंग्रेजी खिलाड़ियों के खास तकनीक से सजे जूतों के मुकाबले मोहन बागान के खिलाड़ी नंगे पैर मैदान में उतरे और जीत का परचम लहरा दिया। मोहन बागान की इस जीत ने अंग्रेजों को समझा दिया कि बंगाली कहीं से भी कमजोर या कमतर नहीं है।
इस जीत के बाद तो फुटबॉल का मैदान सिर्फ खेल का नहीं, बल्कि आत्मसम्मान का युद्धक्षेत्र बन गया। यहां बंगालियों का हर गोल सिर्फ प्रतीक था कि हम भी कम नहीं। धीरे-धीरे फुटबॉल बंगाल में राष्ट्रवाद की अभिव्यक्ति बन गया। मैदान पर जीत का मतलब महज जीत नहीं था। यह उस भावना का उदय था, जो कहती थी कि गुलाम भी अपनी पहचान बना सकते हैं।
आज भी फुटबॉल को जीता है बंगाल (AI Image)
टाइम्स नाऊ नवभारत बंगाल के एडिटर बोधिसत्व भट्टाचार्य के मुताबिक फुटबॉल का खेल ब्रिटिश काल में बंगाल के सामाजिक मनोविज्ञान को दर्शाता है। एक ऐसा समाज, जो खुद को साबित करना चाहता था। फुटबॉल ने उन्हें वह मंच दिया, जहां वे बिना हथियार के भी लड़ सकते थे। इस तरह फुटबॉल एक सांस्कृतिक हथियार बन गया, जिससे बंगाल ने अपनी पहचान गढ़ी।
कहा जाता है कि बंगाल में फुटबॉल को समझना, दरअसल बंगाल को समझना है। यह खेल वहां की संस्कृति, इतिहास और भावनाओं का आईना है। यहां फुटबॉल देखा नहीं जाता, जिया जाता है। फुटबॉल के हर पास में उम्मीद होती है, हर गोल में इतिहास और हर हार में एक नई कहानी। शायद इसलिए, बंगाल में फुटबॉल केवल खेल नहीं जुनून की एक भावना है, जो पीढ़ियों से धड़क रही है।
