Santoor History: राजनयिक मुलाकातों की तस्वीरों में अक्सर हाथ मिलाते नेता, औपचारिक मुस्कानें और समझौतों के दस्तावेज दिखाई देते हैं। लेकिन कभी-कभी कोई एक तस्वीर या वीडियो ऐसा भी सामने आ जाता है, जो राजनीति से आगे निकलकर संस्कृति की बात करता है।
हाल ही में भारत और जापान के प्रधानमंत्रियों की मुलाकात का एक वीडियो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शेयर किया है। इसमें जापान की प्रधानमंत्री उत्सुकता से संतूर बजाने की कोशिश कर रही हैं। सामने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मुस्कुराते हुए उनका उत्साह बढ़ा रहे हैं और आसपास मौजूद लोग तालियां बजा रहे हैं। कुछ पल का यह दृश्य शायद कार्यक्रम का एक छोटा-सा हिस्सा रहा हो, लेकिन इसने एक बार फिर उस भारतीय वाद्य यंत्र को चर्चा में ला दिया, जिसकी झंकार सुनते ही कश्मीर की वादियां, बहते झरने और ठंडी हवाओं का एहसास होने लगता है।
वह वाद्य है... संतूर।
PM मोदी के वीडियो के बाद चर्चा में संतूर
आज की तेज रफ्तार दुनिया में कोई पारंपरिक वाद्य यंत्र अचानक चर्चा में आ जाए, ऐसा कम ही होता है। लेकिन इस वीडियो ने वही कर दिखाया।
सोशल मीडिया पर लोगों ने सिर्फ वीडियो नहीं देखा, बल्कि संतूर के बारे में भी जानना शुरू कर दिया। कई लोगों ने पहली बार इस वाद्य का नाम सुना तो कई लोगों को पंडित शिवकुमार शर्मा की याद आ गई। यही तो किसी सांस्कृतिक विरासत की सबसे बड़ी ताकत होती है। उसे बार-बार याद दिलाने के लिए हमेशा किसी बड़े आयोजन की जरूरत नहीं पड़ती, कभी-कभी एक तस्वीर ही काफी होती है।
सिर्फ वाद्य नहीं, सुरों में बसा सुकून है संतूर
कुछ वाद्य ऐसे होते हैं जिन्हें सुनकर मन थिरक उठता है और कुछ ऐसे, जिन्हें सुनते ही मन ठहर जाता है। संतूर दूसरी श्रेणी का वाद्य है।
लकड़ी का चौड़ा-सा ढांचा, उस पर करीने से बंधी ढेर सारी तारें और उन्हें बजाने के लिए दोनों हाथों में छोटी-सी लकड़ी की कलम। देखने में इसकी बनावट जितनी सरल लगती है, इसकी ध्वनि उतनी ही गहरी और सुकून देने वाली होती है।
संतूर को उंगलियों से नहीं बजाया जाता। कलाकार लकड़ी की हल्की कलम से तारों को छूता है और हर स्पर्श के साथ जो झंकार निकलती है, वह धीरे-धीरे पूरे माहौल में बह जाती है। शायद इसलिए कहा जाता है कि संतूर को सिर्फ सुना नहीं जाता, महसूस भी किया जाता है।
कश्मीर की वादियों से शुरू हुई इसकी संगीत यात्रा
संतूर की कहानी किसी बड़े संगीत विद्यालय से नहीं, बल्कि कश्मीर की खूबसूरत वादियों से शुरू होती है। सदियों पहले यह वहां के लोक संगीत और सूफी परंपरा का अहम हिस्सा था। सूफी संत अपनी महफिलों में संतूर की मधुर धुनों के साथ आध्यात्मिक संदेश सुनाते थे। पहाड़ों के बीच गूंजती इसकी आवाज लोगों के लिए सिर्फ संगीत नहीं, बल्कि आत्मिक शांति का अनुभव भी होती थी।
इतिहासकार बताते हैं कि संतूर परिवार के वाद्य यंत्र फारस यानी आज के ईरान और मध्य एशिया के कई देशों में अलग-अलग रूपों में मौजूद रहे हैं। लेकिन भारत में आकर इस वाद्य ने अपनी अलग पहचान बनाई और कश्मीर ने इसे अपनी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा बना लिया। शायद यही वजह है कि आज भी संतूर का नाम लेते ही सबसे पहले कश्मीर याद आता है।
संतूर के हर सुर में है सुकून
जब लोक वाद्य से शास्त्रीय संगीत का सितारा बना संतूर
आज संतूर देश-विदेश के बड़े मंचों पर गूंजता है, लेकिन इसकी यात्रा इतनी आसान नहीं रही। एक समय था जब इसे केवल लोक संगीत का वाद्य माना जाता था। संगीत के जानकारों को लगता था कि इससे भारतीय शास्त्रीय संगीत के जटिल रागों को पूरी तरह निभाना मुश्किल है।
लेकिन इतिहास अक्सर किसी एक व्यक्ति के जुनून से बदल जाता है। संतूर के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।
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पंडित शिवकुमार शर्मा ने बदल दी संतूर की पहचान
अगर संतूर आज भारतीय शास्त्रीय संगीत के सबसे प्रतिष्ठित वाद्यों में गिना जाता है, तो इसका सबसे बड़ा श्रेय पंडित शिवकुमार शर्मा को जाता है।
उन्होंने सिर्फ इसे मंच पर नहीं बजाया, बल्कि इसकी बनावट में भी कई बदलाव किए। तारों की संख्या, उनकी संरचना और वादन शैली पर लगातार काम किया। नतीजा यह हुआ कि वही संतूर, जिसे कभी लोक वाद्य माना जाता था, शास्त्रीय संगीत के बड़े मंचों तक पहुंच गया।
आज दुनिया में जहां भी संतूर की चर्चा होती है, वहां पंडित शिवकुमार शर्मा का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होंने साबित किया कि परंपरा को बचाने का सबसे अच्छा तरीका उसे समय के साथ आगे बढ़ाना है।
पंडित शिव कुमार शर्मा ने संतूर को बनाया लोकप्रिय
संतूर में कितनी तारें होती हैं
अगर आपने कभी संतूर को करीब से देखा हो तो सबसे पहले उसकी अनगिनत तारें ही ध्यान खींचती हैं। आमतौर पर एक भारतीय शास्त्रीय संतूर में करीब 100 तार होती हैं। ये छोटी-छोटी पुलियों यानी ब्रिज पर टिकी रहती हैं और अलग-अलग सुरों में बांधी जाती हैं।
जब कलाकार लकड़ी की कलम से इन तारों पर हल्की चोट करता है तो हर तार अपनी अलग ध्वनि के साथ गूंजती है। यही वजह है कि संतूर की आवाज में गहराई भी महसूस होती है और पारदर्शिता भी।
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क्यों कहते हैं कि संतूर को सुना नहीं, महसूस किया जाता है
संतूर की सबसे बड़ी खासियत इसकी ध्वनि का फैलाव है। इसकी झंकार अचानक तेज नहीं होती, बल्कि धीरे-धीरे पूरे वातावरण में उतरती है। यही कारण है कि इसे सुनते समय ऐसा लगता है जैसे कोई शांत नदी बह रही हो या पहाड़ों से आती ठंडी हवा चेहरे को छू रही हो।
इसी खूबी की वजह से बहुत से लोग संतूर को सुनना एक संगीत अनुभव नहीं, बल्कि भावनात्मक अनुभव मानते हैं।
संतूर की धुन सुनते ही मन शांत क्यों होने लगता है
दरअसल, हर वाद्य का अपना स्वभाव होता है। तबला ऊर्जा देता है, शहनाई उत्सव का एहसास कराती है, बांसुरी मन को बहा ले जाती है और संतूर... जैसे मन की रफ्तार धीमी कर देता है।
इसकी ध्वनि में कोई जल्दबाजी नहीं होती। हर सुर धीरे-धीरे खुलता है, ठहरता है और फिर वातावरण में घुल जाता है। यही कारण है कि मेडिटेशन, आध्यात्मिक संगीत और प्रकृति से जुड़े कई संगीत संयोजनों में संतूर को खास जगह दी जाती है।
कई लोग तो इसकी झंकार को कश्मीर के झरनों और देवदार के जंगलों में बहती हवा की आवाज से जोड़कर भी देखते हैं।
सदियों पुरानी विरासत, जो आज भी दुनिया को आकर्षित करती है
समय बदलता है, तकनीक बदलती है, संगीत सुनने के तरीके बदल जाते हैं। लेकिन कुछ धुनें ऐसी होती हैं, जो हर दौर में अपनी जगह बनाए रखती हैं। संतूर उन्हीं में से एक है। यह सिर्फ लकड़ी, तारों और सुरों का मेल नहीं है। यह कश्मीर की मिट्टी, भारतीय संगीत की परंपरा और सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत की गूंज है।
शायद इसलिए जब संतूर के तार बजते हैं तो सिर्फ एक धुन नहीं सुनाई देती, बल्कि ऐसा लगता है जैसे भारत की संस्कृति खुद अपने बारे में कुछ कह रही हो। और यही वजह है कि प्रधानमंत्री मोदी से शुरू हुई चर्चा, हमें फिर उस विरासत तक ले जाती है जिस पर हर भारतीय को गर्व होना चाहिए।
