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सामने फांसी और बाहर बसंत, जब जेल की बैरक नंबर 11 से बिस्मिल ने रच दिया आजादी का सबसे बुलंद तराना

Mera Rang De Basanti Chola (मेरा रंग दे बसंती चोला): इस एक गीत ने भारतीयों के भीतर गुलामी के खिलाफ विद्रोह की ज्वाला भड़का दी। इसी गीत ने युवाओं को हथियार से पहले हौसला दिया।

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मौत की आंखों में आंखो डाल कर बिस्मिल का यह गीत गाते थे क्रांतिकारी (AI Image)
Authored by: Suneet Singh
Updated Jun 11, 2026, 11:58 IST
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Ram Prasad Bismil Jayanti: आज 11 जून है। भारत के इतिहास में यह तारीख राम प्रसाद बिस्मिल के नाम दर्ज है। रान प्रसाद बिस्मिल आजादी की उस जलती मशाल का नाम थे जिसने गुलामी की अंधेरी रात में लाखों भारतीयों के दिलों में स्वतंत्रता की लौ जला दी। भारत की आजादी का इतिहास गवाह है कि बिस्मिल की रगों में खून नहीं, मातृभूमि के लिए प्राण तक न्योछावर करने का जज्बा दौड़ता था। जब देश अंग्रेजों की जंजीरों में जकड़ा हुआ था, तब बिस्मिल ने हंसते-हंसते मौत को गले लगाकर दुनिया को बता दिया कि सच्चा देशभक्त अपनी मिट्टी के लिए किसी को मिट्टी में मिल भी सकता है और मिट्टी में मिला भी सकता है।

पंडित राम प्रसाद बिस्मिल ऐसे क्रांतिकारी थे जिनके एक हाथ में बंदूक तो दूसरे में कलम होती थी। वह शानदार कवि भी थे। बिस्मिल ने अपने आखिरी दिनों में जेल की कोठरी में बैठ ऐसा गीत लिखा जो देखते-देखते आजादी का तराना बन गया। इस गीत को गाते हुए आजादी के परवाने हंसते-हंसते फांसी का फंदा चूम लिया करते थे। यह गीत था- मेरा रंग दे बसंती चोला। फांसी से ठीक पहले भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के आखिरी शब्द भी यही थे।

भगत सिंह के आखिरी शब्द थे- मेरा रंग दे बसंती चोला

भगत सिंह के आखिरी शब्द थे- मेरा रंग दे बसंती चोला

राम प्रसाद बिस्मिल की कलम से निकले इस गीत में मातृभूमि से गुहार है कि वह अपने सपूत को ऐसा चोला पहनाए, जिसे पहनकर वह देश के लिए हंसते-हंसते प्राण न्योछावर कर सके। राम प्रसाद बिस्मिल ने इन अमर रचना को 1927 में जेल में उस दौरान स्वर दिया, जब फांसी का साया उनके सिर पर मंडरा रहा था।

दरअसल स्वतंत्रता संग्राम के दौरान 9 अगस्त 1925 को भारत के वीर क्रांतिकारियों ने लखनऊ के पास काकोरी में ट्रेन रुकवा कर ब्रिटिश सरकार का खजाना लूट लिया था। यह लूट काकोरी कांड के नाम से मशहूर हुई। अंग्रेजी खजाना लूटने का प्लान बनाया था अमर क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल और उनके साथियों ने। साल 1927 में बिस्मिल, ठाकुर रोशन सिंह, अशफाक उल्ला खान और राजेंद्र लाहिड़ी को अंग्रेजी हुकूमत ने गिरफ्तार कर मौत की सजा सुनाई।

राम प्रसाद बिस्मिल को गोरखपुर की जेल में कैद कर दिया गया। वह जेल में बंद होकर भी अपनी कलम से लोगों में देशप्रेम की अलख जगाते रहे। एक तरफ मौसम बसंत का था और दूसरी तरफ कैदी क्रांतिकारी साथियों की फरमाइश कि बिस्मिल कुछ लिख दें। बसंती फुहार और बिस्मिल का देशप्रेम, जब दोनों मिले तो गोरखपुर जेल की बैरक नंबर 11 में आजादी के सबसे अमर तराने के जन्म हुआ- मेरा रंग दे बसंती चोला।

बिस्मिल के कलम की स्याही से निकला आजादी का सबसे बड़ा नारा

बिस्मिल के कलम की स्याही से निकला आजादी का सबसे बड़ा नारा

राम प्रसाद बिस्मिल ने अपने अंदर पल रहे आजादी और स्वराज के सपनों को स्याही बनाकर ये गीत कुछ यूं लिखा-

मेरा रंद दे बसंती चोला, माए रंग दे

मेरा रंग दे बसंती चोला

बड़ा ही गहरा दाग है यारों

जिसका गुलामी नाम है

उसका जीना भी क्या जीना

जिसका देश गुलाम है

सीने में जो दिल था यारों आज बना वो शोला

मेरा रंग दे बसंती चोला

मेरा रंग दे बसंती चोला

इस एक गीत ने भारतीयों के भीतर गुलामी के खिलाफ विद्रोह की ज्वाला भड़का दी। इसी गीत ने युवाओं को हथियार से पहले हौसला दिया। इसने समझाया कि सच्ची देशभक्ति बलिदान मांगती है। इसका असर ये हुआ कि आने वाले दिनों में अंग्रेजों के बनाए फांसी के तख्ते की ओर बढ़ते युवा कदमों में डर नहीं, मेरा रंग दे बसंती चोला का साज सुनाई देने लगा। यह गीत सिर्फ गीत ना रहकर आजादी का सबसे बुलंद नारा बन गया। ऐसा नारा जिसने ऐसी अलख जगाई कि अंग्रेजी हुकूमत की सांसे उखड़ने लगी।

टाइम्स नाउ नवभारत पर ये भी पढ़ें: खून में उबाल ला देंगी बिस्मिल की ये 5 कविताएं

जैसे जैसे हिंदुस्तान की आजादी का समर आगे बढ़ता गया ये गीत भी बढ़ता गया। क्रांतिकारियों और देशभक्तों ने इस गीत भारत की गौरव गाथा से सजाना शुरू कर दिया। आजादी के मुहाने पर पहुंचते-पहुंचते इस गीत का स्वरूप कुछ ऐसा हो गया:

मेरा रंद दे बसंती चोला, माए रंग दे

मेरा रंग दे बसंती चोला

बड़ा ही गहरा दाग है यारों

जिसका गुलामी नाम है

उसका जीना भी क्या जीना

जिसका देश गुलाम है

सीने में जो दिल था यारों आज बना वो शोला

मेरा रंग दे बसंती चोला

मेरा रंग दे बसंती चोला

इसी रंग में गांधी जी ने,

नमक पर धावा बोला

मेरा रंग दे बसंती चोला.

इसी रंग में वीर शिवा ने

मां का बंधन खोला

मेरा रंग दे बसंती चोला.

इसी रंग में भगत दत्त ने

छोड़ा बम को गोला

मेरा रंग दे बसंती चोला.

इसी रंग में पेशावर में

पठानों ने सीना खोला

मेरा रंग दे बसंती चोला.

इसी रंग में बिस्मिल अशफाक ने

सरकारी खजाना खोला

मेरा रंग दे बसंती चोला.

इसी रंग में वीर मदन ने

गवर्नमेंट पर धावा बोला

मेरा रंग दे बसंती चोला.

इसी रंग में पद्मकांत ने

मार्डन पर धावा बोला

मेरा रंग दे बसंती चोला

अगर किसी को भी अपने वतन से प्यार होगा को आज भी यह गीत सुनकर उसके रोंगटे खड़े हो जाएंगे। बिस्मिल का यग अमर गीत आज 100 साल बाद भी इस बात की तस्दीक करती है कि आजादी किसी कागजी दस्तावेज पर लिखी इबारत नहीं, उन अनगिनत शहीदों के लहू से लिखी गई अमर गाथा है, जिन्होंने अपने लिए नहीं, आने वाली पीढ़ियों के लिए सांसें कुर्बान कर दीं।

टाइम्स नाउ नवभारत धरती मां के वीर सपूत और अमर सेनानी राम प्रसाद बिस्मिल को उनकी जयंती पर नमन करता है। जय हिंद।

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