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ग्लोबल वार्मिंग पर महा-संग्राम! मशहूर वैज्ञानिक ने अमेरिकी सरकार की रिपोर्ट को बताया 'भ्रामक'; जानें क्या है पूरा विवाद

अमेरिकी सरकार की एक आधिकारिक जलवायु रिपोर्ट पर दुनिया के चोटी के वैज्ञानिकों ने गंभीर सवाल उठाए हैं। जानिए क्या है यह पूरा विवाद और कैसे हमारी ही छोड़ी गैसें पृथ्वी का 'क्लाइमेट फिंगरप्रिंट' बदल रही हैं।

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Photo : Times Now Digital
अमेरिकी सरकार की रिपोर्ट पर क्यों भड़के दुनिया के टॉप वैज्ञानिक
Edited by: Nishant Tiwari
Updated Jul 4, 2026, 15:15 IST
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कोयला, पेट्रोल और फैक्ट्रियों से निकलने वाला धुआं हमारी धरती को बर्बाद कर रहा है, हम बचपन से यही पढ़ते आ रहे हैं। लेकिन क्या होगा अगर कोई यह कह दे कि ग्लोबल वार्मिंग में इंसानों का कोई हाथ ही नहीं है? अमेरिका में कुछ ऐसा ही हुआ है और दुनिया के चोटी के वैज्ञानिकों ने इस दावे को बेनकाब कर दिया है। जानते हैं क्या है पूरा मामला।

दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित जलवायु वैज्ञानिकों में से एक, प्रोफेसर बेंजामिन सैंटर, जो यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्ट एंग्लिया (UEA) में मानद प्रोफेसर हैं, इस समय अमेरिकी सरकार की एक आधिकारिक जलवायु रिपोर्ट के खिलाफ खुलकर मैदान में आ गए हैं। उनका आरोप है कि अमेरिकी ऊर्जा विभाग (DOE) ने अपनी एक बड़ी रिपोर्ट में उनके नाम और उनकी सालों की रिसर्च का इस्तेमाल "सफेद झूठ" फैलाने और ग्लोबल वार्मिंग में इंसानों की भूमिका को कमतर दिखाने के लिए किया है।

आइए इस पूरे मामले को बहुत ही आसान भाषा में समझते हैं कि आखिर यह पूरा विवाद क्या है और यह हमारी और आपकी सेहत से कैसे जुड़ा है।

क्या है पूरा विवाद?

मामले की शुरुआत होती है जुलाई 2025 में, जब अमेरिकी ऊर्जा विभाग (DoE) ने जलवायु विज्ञान पर एक विस्तृत समीक्षा रिपोर्ट जारी की। इस रिपोर्ट में प्रोफेसर सैंटर की रिसर्च का हवाला देते हुए निष्कर्ष निकाला गया कि धरती पर जो तापमान बढ़ रहा है, उसमें इंसानों की गतिविधियों का कोई खास रोल नहीं है।

चौंकाने वाली बात यह थी कि यह रिपोर्ट ठीक उसी दिन जारी की गई, जिस दिन अमेरिका की पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (EPA) ने साल 2009 के एक ऐतिहासिक फैसले, 'एंडेंजरमेंट फाइंडिंग' (Endangerment Finding) को पलटने का प्रस्ताव रखा। यह कानून अमेरिकी सरकार को यह ताकत देता है कि वह गाड़ियों, पावर प्लांट्स और बड़ी फैक्ट्रियों से निकलने वाले प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैसों पर कानूनी लगाम लगा सके। हाल ही में ट्रंप प्रशासन ने इस कानून को पूरी तरह रद्द करने का कदम आगे बढ़ा दिया है।

वैज्ञानिकों का आरोप है कि सरकार ने अपने इस राजनीतिक और उद्योग-समर्थित फैसले को सही ठहराने के लिए विज्ञान का गलत इस्तेमाल किया। यानी, नियम बदलने के लिए वैज्ञानिक डेटा को ही मरोड़ दिया गया।

क्या होता है 'क्लाइमेट फिंगरप्रिंट'?

प्रोफेसर सैंटर को विज्ञान की दुनिया में इसलिए जाना जाता है क्योंकि उन्होंने ही सबसे पहले पृथ्वी के पर्यावरण में इंसानों द्वारा छोड़े गए "फिंगरप्रिंट" या निशान को पहचाना था।

मान लीजिए किसी बंद घर में चोरी होती है। पुलिस वहां पहुंचकर चोर के उंगलियों के निशान (Fingerprints) ढूंढती है ताकि साबित हो सके कि वहां कोई बाहरी व्यक्ति आया था। ठीक इसी तरह, हमारी पृथ्वी का जो वायुमंडल (Atmosphere) है, वह भी अपने भीतर तापमान के निशान छोड़ता है। हमारी पृथ्वी के वायुमंडल की दो मुख्य परतें हैं- ट्रोपोस्फीयर (Troposphere) यानी वायुमंडल की सबसे निचली परत है, जिसमें हम सांस लेते हैं और स्ट्रैटोस्फीयर (Stratosphere), जो ट्रोपोस्फीयर के ठीक ऊपर की परत है।

जब सूरज की रोशनी सामान्य रूप से आती और जाती है, तो वायुमंडल का तापमान एक निश्चित संतुलन में रहता है। लेकिन जब इंसान भारी मात्रा में कोयला, पेट्रोल, डीजल जलाते हैं और फैक्ट्रियों से कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ते हैं, तो यह CO2 नीचे की परत (ट्रोपोस्फीयर) में एक मोटे कंबल की तरह जमा हो जाती है। नतीजा यह होता है कि नीचे की परत गर्म होने लगती है और ऊपर की परत (स्ट्रैटोस्फीयर) तक गर्मी पहुंच ही नहीं पाती, जिससे वह ठंडी होने लगती है।

सैटेलाइट से मिले आंकड़ों में यह साफ देखा गया है कि नीचे की परत गर्म हो रही है और ऊपर की परत ठंडी। इसी को विज्ञान की भाषा में 'ह्यूमन फिंगरप्रिंट' कहा जाता है। यह इस बात का अकाट्य सबूत है कि ग्लोबल वार्मिंग प्राकृतिक नहीं, बल्कि इंसानों की फैलाई आफत है।

वैज्ञानिकों का पलटवार: 'सच्चाई को छिपाया नहीं जा सकता'

इस सरकारी रिपोर्ट के झूठ को बेनकाब करने के लिए प्रतिष्ठित जर्नल 'AGU Advances' में एक नया पेपर प्रकाशित किया गया है। इसमें प्रोफेसर बेंजामिन सैंटर के साथ मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) की प्रोफेसर सुसान सोलोमन, कोलोराडो स्टेट यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डेविड थॉम्पसन और वाशिंगटन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर कियांग फू जैसे दिग्गज वैज्ञानिक शामिल हुए हैं।

इन वैज्ञानिकों ने साफ कहा है कि अमेरिकी सरकार की रिपोर्ट तथ्यात्मक रूप से पूरी तरह गलत है। प्रोफेसर सैंटर ने कहा, कि जब आधिकारिक सरकारी रिपोर्टों में स्पष्ट रूप से गलत वैज्ञानिक दावे किए जाते हैं, तो पीयर-रिव्यूड लेख के जरिए रिकॉर्ड को दुरुस्त करना बेहद जरूरी हो जाता है। यह रिपोर्ट पर्यावरण से जुड़े कानूनी फैसलों का आधार बनने के बिल्कुल भी लायक नहीं है।

राजनीति और पर्यावरण का खतरनाक खेल

इस विवाद के बाद अमेरिका में एक मुकदमा भी दर्ज हुआ, जिसमें आरोप लगाया गया कि ऊर्जा विभाग ने इस रिपोर्ट को तैयार करते समय जरूरी संघीय नियमों का पालन नहीं किया। इसके बाद सरकार ने सितंबर की शुरुआत में इस रिपोर्ट को बनाने वाली टीम को तो भंग कर दिया, लेकिन रिपोर्ट को न तो वेबसाइट से हटाया गया और न ही उसमें सुधार किया गया।

वैज्ञानिक इस बात से सबसे ज्यादा चिंतित हैं कि अमेरिकी ऊर्जा सचिव (DOE Secretary) अभी भी सार्वजनिक मंचों पर इस गलत रिपोर्ट को जलवायु विज्ञान का एक 'विश्वसनीय स्रोत' बता रहे हैं।

हम पर और हमारी आने वाली पीढ़ी पर क्या असर होगा?

यदि वैज्ञानिक दावों को दरकिनार करके सरकारें प्रदूषण फैलाने वाले कड़े नियमों को वापस लेती हैं, तो इसका सीधा असर आम जनता पर पड़ेगा:

पब्लिक हेल्थ को खतरा: गाड़ियों और फैक्ट्रियों से बिना किसी रोक-टोक के निकलने वाला धुआं सांस की बीमारियों, अस्थमा और दिल के दौरों के खतरों को कई गुना बढ़ा देगा।

मौसम का बिगड़ता मिजाज: ग्लोबल वार्मिंग बढ़ने से बेमौसम भारी बारिश, भयंकर सूखा और विनाशकारी चक्रवातों की संख्या बढ़ेगी (जैसा कि हम अक्सर अपने आसपास भी देखते हैं)।

यह विवाद हमें याद दिलाता है कि जब विज्ञान को राजनीति के चश्मे से देखा जाने लगता है, तो नुकसान पूरी मानवता का होता है। वैज्ञानिकों का यह साझा प्रयास दुनिया को सचेत करने की एक बड़ी कोशिश है कि हम चाहे जो नियम बदल लें, लेकिन प्रकृति के फिंगरप्रिंट को नहीं बदल सकते।

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