Earthquake Research Stanford: स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने हाल ही में पृथ्वी के रहस्यों को सुलझाने की दिशा में एक बड़ी कामयाबी हासिल की है। वैज्ञानिकों ने दुनिया में पहली बार उन दुर्लभ भूकंपों का 'ग्लोबल मैप' (वैश्विक मानचित्र) तैयार किया है, जो जमीन की ऊपरी सतह (Crust) के बजाय उसके बहुत नीचे यानी 'मेंटल' (Mantle) में पैदा होते हैं। मशहूर जर्नल 'साइंस' (Science) में छपी इस स्टडी से वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिलेगी कि आखिर भूकंप शुरू कैसे होते हैं और पृथ्वी की गहराई में क्या हलचल चल रही है।
जमीन के नीचे कैसे आते हैं ये भूकंप?
आमतौर पर हम जिन भूकंपों को महसूस करते हैं, वे पृथ्वी की सबसे ऊपरी परत 'क्रस्ट' में आते हैं, जो लगभग 6 से 18 मील की गहराई तक होती है। लेकिन स्टैनफोर्ड के वैज्ञानिकों ने जिन भूकंपों का नक्शा बनाया है, वे 'मोहो' (Moho) रेखा के नीचे 'मेंटल' में आते हैं। बता दें, कि 'मोहो' वह काल्पनिक सीमा है जो ठंडी और भंगुर ऊपरी सतह (Crust) को नीचे मौजूद गर्म और सघन परत (Mantle) से अलग करती है। वैज्ञानिकों के लिए यह आश्चर्य की बात है क्योंकि माना जाता था कि मेंटल इतना गर्म होता है कि वह चट्टान की तरह टूटने के बजाय मोम की तरह मुड़ जाता है, इसलिए वहां भूकंप आना नामुमकिन सा लगता था।
दुनिया में कहां-कहां हैं ये 'मेंटल भूकंप'?
स्टैनफोर्ड के 'डोअर स्कूल ऑफ सस्टेनेबिलिटी' के प्रोफेसर साइमन क्लेम्परर और पूर्व पीएचडी छात्र शिकी (एक्सल) वांग के नेतृत्व में हुए इस अध्ययन ने बताया कि ये दुर्लभ भूकंप पूरी दुनिया में फैले हुए हैं, लेकिन कुछ खास जगहों पर इनका जमावड़ा ज्यादा है, और ऐसे ही दो इलाके हैं हिमालय क्षेत्र और बेरिंग स्ट्रेट। दक्षिण एशिया में हिमालय के नीचे इन गहरे भूकंपों का एक बड़ा समूह देखा गया है। इसके अलावा बेरिंग जलडमरूमध्य (Bering Strait) में एशिया और उत्तरी अमेरिका के बीच, आर्कटिक सर्कल के पास भी ये भूकंप काफी सक्रिय हैं।
mantle earthquakes on earth map
कैसे पकड़ी गई पृथ्वी की 'हलचल'?
इन गहरे भूकंपों को पहचानना बहुत मुश्किल था क्योंकि ये सतह पर ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचाते। शोधकर्ता वांग और क्लेम्परर ने भूकंपीय तरंगों (Seismic Waves) की तुलना करने की Sn वेव्स और Lg वेव्स की एक नई तकनीक विकसित की। Sn वेव्स मेंटल के ऊपरी हिस्से में चलती हैं और Lg तरंगें केवल क्रस्ट (ऊपरी सतह) के जरिए कुशलतापूर्वक चलती हैं। इन दोनों के अनुपात को मापकर वैज्ञानिक अब सटीक तौर पर बता सकते हैं कि भूकंप ऊपर शुरू हुआ या मेंटल की गहराई में। वांग ने इसे 'गेम-चेंजर' बताया है क्योंकि अब केवल तरंगों के आधार पर ही इनकी पहचान संभव है।
क्यों जरूरी है यह शोध?
हालांकि ये भूकंप जमीन पर तबाही नहीं मचाते, लेकिन इनका अध्ययन हमारे लिए दो वजहों से महत्वपूर्ण है। पहली तो यह कि मेंटल भूकंपों को समझकर वैज्ञानिक यह जान पाएंगे कि सामान्य और खतरनाक भूकंपों के पीछे की मुख्य वजहें क्या होती हैं और दूसरा पृथ्वी का आंतरिक ढांचा। मेंटल ही वह हिस्सा है जहां से ज्वालामुखी का लावा (Magma) निकलता है और जो टेक्टोनिक प्लेटों को खिसकाने में मदद करता है। इसे समझने से हम अपनी धरती के काम करने के तरीकों को बेहतर जान पाएंगे। इसके लिए स्टैनफोर्ड की टीम ने 1990 के बाद से आए लगभग 46,000 भूकंपों के डेटा का विश्लेषण किया और 459 'कॉन्टिनेंटल मेंटल भूकंपों' की पुष्टि की। वैज्ञानिकों का मानना है कि जैसे-जैसे तिब्बत जैसे दुर्गम इलाकों में निगरानी बढ़ेगी, ऐसे और भी भूकंपों का पता चलेगा
