Opinion India Ka: नेताओं को क्यों भाती है जाति, क्या मंडरा रहा है मंडल पार्ट-2 का खतरा

Opinion India Ka: इस समय देश में अलग अलग राजनीतिक दलों की तरफ से जातीय जनगणना की मांग की जा रही है। सवाल यहां अहम है कि नेताओं को जाति क्यों भाती है।

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नेताओं को क्यों भाती है जाति, क्या मंडरा रहा है मंडल पार्ट-2 का खतरा  

नेताओं को जनता की जाति क्यों है भाती? क्या देश में जातिगत जनगणना जरूरी है?जाति जानने से किसे फायदा..किसे नुकसान ?जाति जनगणना से मंडल पार्ट-2 का खतरा ?ये वो पॉलिटिकल पार्टियां हैं, जो 2021 में जाति आधारित जनगणना की मांग कर रही हैं। इन दलों में कुछ वो भी हैं, जो एनडीए का हिस्सा हैं। देश में जाति जनगणना की मांग तब उठी, जब इसी साल 20 जुलाई को संसद में मोदी सरकार ने ऐलान कर दिया है कि वो देश में जाति के आधार पर आबादी की गिनती नहीं करेगी।

सरकार के इसी बयान के बाद जाति जनगणना का जिन्न बोतल से बाहर निकल आया। इस मसले पर एक दूसरे के धुर विरोधी नीतीश और तेजस्वी एक साथ आ गए। एक सुर में पुकारने लगे कि देश में जाति जनगणना होनी चाहिए। लेकिन मोदी सरकार इसके खिलाफ है। जाति जनगणना पर मोदी सरकार का ये वही स्टैंड है, जो मनमोहन सरकार की थी। मतलब ये कि जाति जनगणना पर देश के दो सबसे बड़े दल खिलाफ हैं।इसीलिए देश में 90 सालों से जातिगत जनगणना नहीं हो रही है।


1931 में हुई थी अंतिम जातीय जनगणना
साल 1931 तक भारत में जातिगत जनगणना होती थी।1941 में जनगणना के समय जाति आधारित डेटा जुटाया ज़रूर गया था, लेकिन प्रकाशित नहीं किया गया।1951 से 2011 तक की जनगणना में हर बार अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का डेटा दिया गया, लेकिन ओबीसी और दूसरी जातियों का नहीं। यही वजह है कि भारत में ओबीसी आबादी कितनी प्रतिशत है, इसका कोई आधिकारिक डेटा नहीं है।


1990 में केंद्र की तत्कालीन विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार ने दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोगजिसे आमतौर पर मंडल आयोग के रूप में जाना जाता है, इसी की एक सिफ़ारिश को लागू किया था।ये सिफारिश अन्य पिछड़ा वर्ग के उम्मीदवारों को सरकारी नौकरियों में सभी स्तर पर 27 प्रतिशत आरक्षण देने की थी। इस फ़ैसले ने भारत, खासकर उत्तर भारत की राजनीति को बदल कर रख दिया।मंडल आयोग लागू होने के बाद जो गदर मचा था देश उसे अब तक नहीं भूल पाया है। बावजूद इसके कुछ दल जातिगत जनगणना की पैरवी कर रहे हैं।

जाति जनगणना पर देश के दो बड़े दल खिलाफ
मतलब ये कि जाति जनगणना पर देश के दो सबसे बड़े दल खिलाफ हैं।इसीलिए देश में 90 सालों से जातिगत जनगणना नहीं हो रही है।साल 1931 तक भारत में जातिगत जनगणना होती थी।1941 में जनगणना के समय जाति आधारित डेटा जुटाया ज़रूर गया था, लेकिन प्रकाशित नहीं किया गया।1951 से 2011 तक की जनगणना में हर बार अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का डेटा दिया गया, लेकिन ओबीसी और दूसरी जातियों का नहीं। 

मंडल के बाद गदर को देश आज तक नहीं भूला
मंडल आयोग लागू होने के बाद जो गदर मचा था देश उसे अब तक नहीं भूल पाया है। बावजूद इसके कुछ दल जातिगत जनगणना की पैरवी कर रहे हैं।उनका तर्क है कि जब किसी जाति की आबादी पता होगी, तो उनकी तरक्की होगी। सरकार को स्कीम्स बनाने में मदद मिलेगी।लेकिन सरकार का मानना है कि इससे देश में कुछ नई समस्याओं का जन्म हो जाएगा। देश जाति के आधार पर बंट जाएगा। एक जाति से दूसरे जाति में इतनी लंबी और चौड़ी खाई तैयार हो जाएगी, जिससे भरना आसान नहीं होगा।

क्या कहते हैं राजनीतिक जानकार
राजनीतिक पंडितों की मानें तो जाति आधारित जनगणना से ये पता चल जाएगा कि देश या राज्य में किस जाति की कितनी आबादी है? किस क्षेत्र में कौन सी जाति रहती है?सामाजिक पिछड़ापन आंकने के मापदंड बदल जाएंगे।कई जातियों की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति का सही पता चलते ही पुराने मापदंड बदल सकते हैं।किस जाति की जनसंख्या कम हो रही है किसकी बढ़ी है इसकी जानकारी सार्वजनिक होगी...तो देश में राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तन होगा। 
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जाति पर बाबा साहेब के विचार 

  • जाति प्रथा भारत की बहुत बड़ी समस्या
  • जाति तोड़े बिना समाज सुधार संभव नहीं
  • जाति सामाजिक बुराइयों का मूल कारण
  • जाति की वजह से समाज सुधार विफल होता है
  • जाति प्रथा से देश का बंटवारा होता है

भीमराव आंबेडकर जाति के आधार पर आरक्षण के खिलाफ थे
इतना ही नहीं संविधान का बनाने में बड़ी भूमिका निभाने वाले भीमराव आंबेडकर तो जाति के आधार पर आरक्षण के भी खिलाफ थे। 
उन्होंने संविधान में आरक्षण का की व्यवस्था तो की, लेकिन अस्थाई तौर पर। सिर्फ दस सालों के लिए। उन्होंने कहा था कि 10 साल में इस बात की समीक्षा हो कि जिन्हें आक्षण दिया गया, क्या उनकी स्थिति में कोई सुधार हुआ या नहीं? उन्होंने ये भी कहा था कि यदि आरक्षण से किसी वर्गा का विकास हो जाता है, तो उसके आगे की पीढ़ी को आरक्षण का लाभ नहीं देना चाहिए। इसके पीछे उन्होंने वजह बताई थी कि आरक्षण का मतलब बैसाखी नहीं है, जिसके सहारे पूरी जिंदगी काट दी जाए। विकास की मुख्यधारा में आने के लिए आरक्षण एक सहारा भर है।

  • आरक्षण की स्थाई व्यवस्था नहीं की
  • 10 साल के लिए आरक्षण का प्रावधान
  • 10 साल बाद समीक्षा करने को कहा
  • आरक्षण का मतलब बैसाखी नहीं 
  • आरक्षण विकास का एक सहारा है

देश में जातिगत जनगणना की जरूरत नहीं
हकीकत ये है कि देश में जातिगत जनगणना की जरूरत नहीं। ये उन्हीं नेताओं और राजनीतिक दलों के लिए जरूरी है, जिनकी सियासी गाड़ी जाति के ईंधन से दौड़ती है। असल में जाति और धर्म के आधार पर बिना भेद किए सबका साथ और सबका विकास होना चाहिए। सबको समान अवसर मिलना चाहिए। खासकर किसान, महिला, गरीब, बेरोजगार, दिव्यांग और रेप पीड़ितों को। अगर जाति जानने से विकास होता है, तो इन लोगों को जाति मानिए। इनका विकास कीजिए।

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