Lat Bhairav Ramleela 2026: वाराणसी में गंगा-जमुनी तहजीब की 485 साल पुरानी परंपरा इस बार टूटती नजर आई। मामला लाट भैरव मंदिर परिसर का है, जहां हर साल रामलीला के दौरान एक अनोखा संगम देखने को मिलता है। हालांकि, इस बार तस्वीर बदली हुई रही। काशी में लाट भैरव पर होने वाली रामलीला काफी प्रसिद्ध है। इसके एक विशेष प्रसंग जयन्त-नेभंग की लीला का मंचन परंपरागत तरीके से किया गया। इस प्रसंग के दौरान लाट के चबूतरे से रामचरितमानस की चौपाइयां तो गूंजी, लेकिन बगल में स्थित मस्जिद से कुरान की आयतें और मगरिब की अजान नहीं सुनाई दी।
चौपाइयों के साथ पढ़ी जाती थी नमाज
दरअसल, इस रामलीला की सबसे बड़ी विशेषता यही रही है कि जब चबूतरे पर चौपाइयां पढ़ी जाती हैं, उसी दौरान मस्जिद से अजान भी दी जाती है। दोनों धर्मों के लोग इस दृश्य को एक साथ देखने के लिए जुटते हैं। इसे काशी की साझा संस्कृति की सबसे बड़ी मिसाल माना जाता है। लेकिन इस साल मस्जिद के मुतवल्ली और नमाजी वहां नहीं पहुंचे और 485 सालों में पहली बार अजान नहीं हुई। इस बदलाव की खबर मोहल्ले में तेजी से फैल गई। जो लोग हिंदू-मुस्लिम एकता की इस अनोखी परंपरा को देखने आए थे, वे भी हैरान रह गए।
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485 सालों में पहली बार नहीं पढ़ी गई नमाज
रामलीला समिति के व्यास पं. दयाशंकर त्रिपाठी ने कहा कि उनकी ओर से किसी तरह की रोक-टोक नहीं की गई थी। परंपरा को निभाने के लिए पूरी तैयारी थी। दूसरी ओर मुस्लिम पक्ष इस मुद्दे पर कुछ भी बोलने से बच रहा है और पूरी तरह चुप्पी साधे हुए है। स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि मस्जिद में प्रस्तावित निर्माण कार्य को अनुमति नहीं मिलने के कारण मुस्लिम पक्ष में नाराजगी है और इसी वजह से उन्होंने इस बार परंपरा से दूरी बनाई है। हालांकि इस बात की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। 485 सालों से चली आ रही यह परंपरा काशी की पहचान रही है। इसके टूटने से लोगों में कई तरह के सवाल उठ रहे हैं।
