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जब अपनों ने ही ठगा हो तो दूसरों से क्या गिला! नाम और निशान की लड़ाई में उलझ गईं ममता; आखिर कैसे बदली बगावत की कहानी?

TMC Symbol Row: ममता बनर्जी ने जिस बगावत के जरिए कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस की नींव रखी थी, 28 साल बाद वही बगावत पार्टी के भीतर चुनौती बनकर उभरी है। नाम-निशान पर विवाद ने तृणमूल की राजनीतिक विरासत और नेतृत्व पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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Photo : Times Now Digital
पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी
Edited by: अनुराग गुप्ता
Updated Sep 18, 2026, 17:51 IST
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TMC Symbol Row: पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का तृणमूल कांग्रेस से तकरीबन तीन दशक पुराना रिश्ता है और अब आलम ऐसा है कि ममता बनर्जी तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिह्न की लड़ाई लड़ रही हैं। बीते दिनों चुनाव आयोग ने ममता बनर्जी गुट और ऋतब्रत बनर्जी गुट के प्रतिनिधियों के साथ अलग-अलग सुनवाई की। इसके बाद देर रात जानकारी सामने आती है कि चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिह्न को फ्रीज कर दिया है और दोनों गुटों से नए विकल्प का सुझाव मांगा है।

तृणमूल कांग्रेस अस्तित्व में कैसे आई?

ममता बनर्जी ने करीब तीन दशक पहले कांग्रेस से बगावत करके अपनी अलग पार्टी बनाई और धीरे-धीरे पश्चिम बंगाल की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकतों में शुमार हो गईं, लेकिन अब 28 साल बाद हालात कुछ ऐसे हैं कि वह अपनी ही पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न इस्तेमाल नहीं कर पा रही हैं।

जिस बगावत के जरिए ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस की नींव रखी थी, वही बगावत अब पार्टी के भीतर उभकर सामने आई, जो सांसद उनसे छिटके उन्होंने ऐसी पार्टी के साथ विलय किया जिसके बारे में किसी को ज्यादा कुछ पता नहीं था और वो पार्टी है एनसीपीआई, जिसने एनडीए को अपना समर्थन दिया और उस गठबंधन की दूसरी बड़ी पार्टी बनकर उभरी।

नाम और निशान फ्रीज

जो दूर हो गए, वो तो हो गए, लेकिन जो करीब रहकर चोट पहुंचा रहे हैं, उन लोगों ने ममता बनर्जी की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। 6 अक्टूबर को होने वाले उपचुनावों से पहले एक तो चुनाव आयोग ने ममता बनर्जी खेमे और ऋतब्रत खेमे दोनों को ही तृणमूल कांग्रेस के नाम और निशान का इस्तेमाल न करने की हिदायद दी है। दरअसल, चुनाव आयोग ने तृणमूल नाम और चुनाव चिह्न को फ्रीज कर दिया है। साथ ही, नया नाम-निशान दोनों गुट को दे दिया।

दूसरी तरफ, आगामी नंदीग्राम विधानसभा उपचुनाव से पहले ममता खेमे की संचिता प्रधान डे ने मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी से शुक्रवार की दोपहर अचानक मुलाकात की और उसके बाद अपना नामांकन वापस ले लिया। जिसके बाद ममता बनर्जी को खुद सामने आकर प्रेस कॉन्फ्रेंस करनी पड़ी। इस दौरान, उन्होंने कांग्रेस को अपना समर्थन देने का ऐलान कर दिया। साथ ही, उन्होंने बताया कि राहुल गांधी ने बीती रात को उनसे बात की और हम अपने एलायंस पार्टनर्स को आगे बढ़ाएंगे।

दूध का जला छाछ भी फूंक फूंक कर पीता है- आप लोगों ने यह कहावत कई बार सुनी होगी, लेकिन ममता बनर्जी इसे चरितार्थ करने की कोशिश में नंदीग्राम से संचिता प्रधान पर दांव लगाया, जो न पुरानी नेता हैं और न ही पापुलर... और अब ममता को मुंह की खानी पड़ी।

ममता के दौर में बगावत नई नहीं

समाचार एजेंसी पीटीआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 1990 के दशक के मध्य में पश्चिम बंगाल कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष सोमेन मित्र के साथ संगठन पर नियंत्रण को लेकर उनका टकराव हुआ। सोमेन मित्र अपने पद पर बने रहे और ममता ने कांग्रेस से अलग होने का रास्ता चुना। एक जनवरी, 1998 को ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की। कांग्रेस संगठन के खिलाफ उनकी बगावत धीरे-धीरे उनके राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी परियोजना में बदल गई।

तब ममता का दांव सफल रहा। तृणमूल कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे के सामने खुद को प्रमुख चुनौती के तौर पर स्थापित किया और आखिरकार 2011 में 34 साल लंबे वाम मोर्चा शासन को खत्म कर सत्ता हासिल की।

देखते ही देखते तृणमूल कांग्रेस का चुनाव चिह्न भी पार्टी की पहचान से ज्यादा ममता बनर्जी की राजनीतिक यात्रा से जुड़ गया। ममता ने खुद घास से निकलते दो फूलों की तस्वीर बनाई थी, जो पार्टी की उभरती हुई पहचान का हिस्सा बना और लोगों के बीच पहुंची।

ममता को कोई हिला नहीं पाया!

इसके बाद पार्टी में कई बड़े नेताओं ने ममता के खिलाफ बगावत की, लेकिन कोई भी विद्रोह उन्हें पार्टी के राजनीतिक केंद्र से हटा नहीं सका। पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष पंकज बनर्जी पार्टी बनने के कुछ समय बाद कांग्रेस में चले गए और बाद में वापस भी आए। 2001 में पार्टी के संस्थापक नेताओं में शामिल अजीत पांजा का ममता से मतभेद हुआ और उन्होंने अलग राजनीतिक मंच बनाने की कोशिश की।

सुदीप बंद्योपाध्याय को ममता से टकराव के बाद पार्टी से निष्कासित किया गया, लेकिन वह बाद में वापस लौटे। ममता के राजनीतिक मार्गदर्शकों में गिने जाने वाले सुब्रत मुखर्जी ने भी एक समय अलग राह अपनाई, फिर तृणमूल में लौटे और बाद में ममता सरकार में मंत्री बने।

तृणमूल कांग्रेस के भीतर टकराव का यह सिलसिला आगे भी जारी रहा। दिनेश त्रिवेदी और मुकुल रॉय भी ऐसे ही कुछ उदाहरण हैं। इन घटनाओं की वजह से पार्टी की छवि जरूर धूमिल हुई, लेकिन इन सभी दौर में ममता पार्टी की निर्णायक राजनीतिक ताकत बनी रहीं।

लेकिन मौजूदा संकट को समझने के लिए 2026 के विधानसभा चुनाव के नतीजों पर गौर करना जरूरी है। साल 2021 में हुए विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने 294 में से 215 सीटों पर जीत हासिल की थी, लेकिन 2026 में सीटों की संख्या घटकर महज 80 रह गई। इस चुनावी शिकस्त के बाद पार्टी के भीतर मतभेद उभरकर सामने आने लगे। लोग सीधे ममता बनर्जी के खिलाफ बोलने से तो बच रहे थे, परंतु अभिषेक बनर्जी को सभी ने निशाने पर लिया।

कुछ ही हफ्तों में 58 विधायकों ने निष्कासित नेता ऋतब्रत बनर्जी को अपना विधायक दल का नेता घोषित किया। बाद में उन्हें नेता प्रतिपक्ष के तौर पर मान्यता मिली। वहीं, ममता की ओर से नामित शोभनदेव चट्टोपाध्याय को बागी गुट ने स्वीकार नहीं किया।

बाकी लोकसभा की कहानी तो आप लोगों को उपर बता ही चुका हूं। काकोली घोष दस्तीकार के नेतृत्व में 20 सांसदों ने बगावत पर दी और अलग गुट के तौर पर मान्यता की मांग करते हुए एनडीए को अपना समर्थन देने की इच्छा जताई। मामला लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष पहुंचा। बाद में एनसीपीआई के साथ उनका विलय हो गया।

अब आगे क्या?

तृणमूल कांग्रेस के भीतर हुए उतार-चढ़ाव को आप लोगों ने बखूबी देखा और पढ़ा होगा, लेकिन इस बार कहानी थोड़ी अलग है, क्योंकि इस बार ममता बनर्जी को चुनौती कोई बाहरी व्यक्ति नहीं दे रहा, बल्कि संगठन के भीतर से ही मिल रही है और चुनाव आयोग के फैसले ने मौजूदा संघर्ष को और जटिल बना दिया है। ममता गुट और ऋतब्रत गुट को अपनी राजनीतिक पहचान को अब नए सिरे से सभी के सामने रखना होगा। इसलिए मौजूदा विवाद सिर्फ यह सवाल नहीं है कि तृणमूल कांग्रेस का नाम और निशान किसके पास रहेगा, बल्कि बड़ा सवाल तो यह है कि 28 साल पहले ममता ने जिस राजनीतिक संगठन को अपनी पहचान के साथ खड़ा किया था अब उस विरासत और नेतृत्व पर किसका दावा मजबूत होगा?

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