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सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरों की कमी पर लिया स्वत: संज्ञान, कस्टोडियल डेथ पर जताई चिंता

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  • Updated Sep 4, 2025, 12:13 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने देशभर के पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरे न होने और खराब पड़े रहने पर स्वत: संज्ञान लिया है। कोर्ट ने कहा कि 2020 के आदेश के बावजूद अनुपालन अधूरा है और हिरासत में मौतों के मामलों पर गंभीर चिंता जताई। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने इस पर रिपोर्ट मांगी है।

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सुप्रीम कोर्ट ने 4 सितंबर को देशभर के पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरे न होने और खराब पड़े रहने के मुद्दे पर स्वत: संज्ञान किया है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने यह कदम मीडिया रिपोर्ट के आधार पर उठाया है, जिसमें बताया गया कि पिछले सात-आठ महीनों में करीब 11 लोगों की पुलिस हिरासत में मौत हुई है।

सीसीटीवी को लेकर SC ने 2020 में दिया था आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 2020 में *लपरमवीर सिंह सैनी बनाम बलजीत सिंह मामले में सुनवाई करते हुए देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को आदेश दिया था कि हर पुलिस थाने में सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं। कोर्ट ने कहा था कि इन कैमरों का उद्देश्य पुलिस हिरासत में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश का नहीं हो रहा पालन

मीडिया रिपोर्ट में सामने आया कि कई पुलिस थानों कैमरे लगाए ही नहीं गए और जहां लगे हैं वहां भी बड़ी संख्या में कैमरे खराब पड़े हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा कि इसका सीधा असर हिरासत में लोगों की सुरक्षा और मानवाधिकारों पर पड़ रहा है।

कस्टोडियल डेथ पर NHRC का डेटा

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के आंकड़े बताते हैं कि भारत में हर साल बड़ी संख्या में कस्टोडियल डेथ यानी पुलिस और न्यायिक हिरासत में मौतें दर्ज की जाती हैं। आयोग की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, केवल साल 2022-23 में ही 2,300 से अधिक हिरासत में मौतें दर्ज की गईं। इनमें से लगभग 160 से ज्यादा मौतें पुलिस हिरासत में और बाकी न्यायिक हिरासत में हुईं।

विशेषज्ञों का मानना है कि इन मौतों के पीछे ज्यादातर मामलों में थानों में सीसीटीवी की कमी, हिरासत में पारदर्शिता की कमी और जांच में लापरवाही बड़ी वजह बनती है। सुप्रीम कोर्ट पहले भी कई बार कह चुका है कि सीसीटीवी कैमरे लगाने से हिरासत में होने वाले अत्याचार और मौतों को काफी हद तक रोका जा सकता है, लेकिन NHRC का डेटा यह दिखाता है कि हालात अब भी गंभीर हैं।

Gaurav Srivastav
गौरव श्रीवास्तवauthor

टीवी न्यूज रिपोर्टिंग में 10 साल पत्रकारिता का अनुभव है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट से लेकर कानूनी दांव पेंच से जुड़ी हर खबर आपको इस जगह मिलेगी। साथ ही चुनाव आयोग, विपक्ष के राजनीतिक घटनाक्रम से लेकर हर जनहित मुद्दे पर मेरी नजर रहती है।

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