Release Of Accused of 2006 Mumbai Train Blasts: महाराष्ट्र सरकार ने मुंबई ब्लास्ट के आरोपियों की रिहाई को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी है। सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर गुरुवार को सुनवाई करेगा। महाराष्ट्र सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट से जल्द सुनवाई की मांग की थी। रिहाई के इस आदेश के बाद से लगातार यह सवाल खड़े हो रहे थे कि आखिर इन धमाकों और बेगुनाहों की मौत के पीछे असली आरोपी कौन है?
बॉम्बे हाई कोर्ट ने सभी 12 दोषियों को किया बरी
11 जुलाई 2006 को मुंबई की लोकल ट्रेनों में हुए बम धमाकों में 187 लोग मारे गए थे और 824 घायल हुए थे। ट्रायल कोर्ट ने 12 आरोपियों को दोषी ठहराया था, जिनमें से 5 को फांसी की सजा दी गई थी। लेकिन बॉम्बे हाईकोर्ट ने सबूतों को नाकाफी मानते हुए सभी को बरी कर दिया, जिसे महाराष्ट्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। टाइम्स नाउ नवभारत के पास महाराष्ट्र सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका से जुड़ी एक्सक्लूसिव जानकारी है। इस याचिका में मुंबई हाई कोर्ट के आदेश को कानूनी आधारों पर चुनौती दी गई है।
मुख्य आधार जिन पर फैसला चुनौती दी गई
- जांच एजेंसी को चार्जशीट करने से पहले कानून के मुताबिक मंजूरी मिली थी, फिर भी हाईकोर्ट ने मंजूरी को लेकर शक जताया जो गलत है।
- मकोका कानून में सैंक्शन का कोई तय फॉर्मेट नहीं है। सिर्फ यह देखना जरूरी है कि आरोपी लगातार संगीन अपराधों में शामिल रहा है। यहां संगीन अपराध का मतलब किसी संज्ञेय अपराध में जिसमें 3 या उससे अधिक साल की सजा का प्रावधान हो उसमें चार्जशीट दाखिल हो चुकी हो या और कोर्ट ने उसका संज्ञान लिया हो।
- पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि एक ही केस में MCOCA और UAPA दोनों लग सकते हैं, फिर भी हाईकोर्ट ने UAPA पर कोई चर्चा नहीं की। सुप्रीम कोर्ट ने अपने 2005 के एक फैसले में इस पर अपना रुख स्पष्ट कर दिया था।
- बचाव या आरोपी पक्ष ने जिन पुराने मामलों का हवाला दिया है, वे तीन साल से कम सजा वाले थे। जबकि मकोका के लिए जरूरी है कि पहले के मामले तीन साल से ज्यादा सजा योग्य हों।
- आरोपी नंबर 1 से 500 ग्राम RDX बरामद हुआ था लेकिन हाईकोर्ट ने इस सबूत को सिर्फ इसलिए खारिज कर दिया क्योंकि उस पर मोहर नहीं थी, जबकि RDX ज्वलनशील होता है और उस मोहर नहीं लगाई जा सकती थी।
- आरोपी नंबर 5 का कबूलनामा सिर्फ इस वजह से खारिज कर दिया गया कि उसने पाकिस्तानी नागरिकों के भारत आने मिनटवार पूरा ब्यौरा नहीं दिया। इसके अलावा हाईकोर्ट ने कहा कि कबूलनामें में पाकिस्तानी नागरिकों के आतंकी ट्रेनिंग कैंप से जुड़ी जानकारी भी नहीं थी। सिर्फ इन आधार पर हाईकोर्ट का कबूलनामें को नकार देना सही नहीं है।
- आरोपी नंबर 13 के घर से विस्फोटक सामग्री जैसे कि डेटोनेटर मिले थी, लेकिन हाईकोर्ट ने उसे सिर्फ इसलिए खारिज कर दिया गई क्योंकि उस पर मोहर नहीं थी। महाराष्ट्र सरकार ने इस पर दलील दी है कि ऐसी चीजें बाजार से आसानी से नहीं मिलतीं। हाईकोर्ट का ये आदेश गलत है।
- हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की UAPA और विस्फोटक अधिनियम के तहत दोषसिद्धि के कारणों को नजरअंदाज किया और बिना पर्याप्त आधार दिए सबको बरी कर दिया।
- पहचान परेड (TIP) सिर्फ जांच का हिस्सा मात्र होती है, लेकिन हाईकोर्ट ने उसे अंतिम सबूत मानकर बाकी सबूतों की अनदेखी कर दी।
11 जुलाई, 2006 को मुंबई की लोकल ट्रेन में धमाके, 187 की मौत
11 जुलाई, 2006 को मुंबई की लोकल ट्रेनों में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों में 187 लोग मारे गए थे। इन धमाकों में 2008 के आतंकवादी हमलों से भी ज्यादा लोग मारे गए थे और 824 लोग घायल हुए थे, जो भारत के अब तक के सबसे भीषण हमलों में से एक है। महाराष्ट्र के आतंकवाद निरोधी दस्ते ने इस मामले में तेरह लोगों को गिरफ्तार किया था। एक स्थानीय अदालत ने 2015 में एक को छोड़कर बाकी सभी को दोषी ठहराया था। सोमवार को हाई कोर्ट ने जांच में गंभीर खामियां गिनाते हुए 12 लोगों को बरी कर दिया, जिनमें से कई 19 साल जेल में बिता चुके थे। ट्रेन विस्फोट मामले के एक आरोपी कमाल अहमद अंसारी की 2021 में मृत्यु हो गई।
