जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुला को ईडी वाले मामले में बहुत बड़ी राहत मिली है। जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने ईडी की ओर से दर्ज मनी लॉन्ड्रिंग मामले को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट के इस फैसले से ईडी को बड़ा झटका लगा है, वहीं फारूक अब्दुला के लिए यह राहत वाली बात है।
'नहीं बनता कोई अपराध'
न्यायमूर्ति संजीव कुमार द्वारा पारित एकल पीठ के आदेश में कहा गया कि इन व्यक्तियों के विरुद्ध कोई विधेय अपराध नहीं बनता है, इसलिए ईडी द्वारा दायर आरोपपत्र और पूरक आरोपपत्र को रद्द किया जाता है। ईडी ने आरोपपत्र में नेशनल कॉन्फ्रेंस प्रमुख अब्दुल्ला, अहसान अहमद मिर्जा (जेकेसीए के पूर्व कोषाध्यक्ष), मीर मंजूर गजनफर (जेकेसीए के एक अन्य पूर्व कोषाध्यक्ष) और कुछ अन्य को आरोपी बनाया था। आरोप पत्र में सूचीबद्ध लोगों ने इसे रद्द करने का अनुरोध करते हुए उच्च न्यायालय का रुख किया था।
क्या कहा न्यायमूर्ति ने
न्यायमूर्ति संजीव कुमार ने 2020 में मामले में श्रीनगर की एक अदालत द्वारा तय किए गए आरोपों को भी खारिज कर दिया। हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट किया कि आरोपों को खारिज करने के बावजूद, ईडी के लिए मामला नए सिरे से दर्ज करना और कानून के अनुसार आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चलाना खुला रहेगा। अदालत ने आरोपियों को तकनीकी आधार पर राहत दी - कि केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा दर्ज किए गए अपराध में धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत कोई अनुसूचित अपराध शामिल नहीं था।
क्या था मामला
संघीय जांच एजेंसी ने पूर्व में जारी तीन अलग-अलग आदेशों के तहत अब्दुल्ला और अन्य की 21.55 करोड़ रुपये मूल्य की संपत्ति कुर्क की थी। एजेंसी का मामला इन्हीं आरोपियों के खिलाफ सीबीआई द्वारा दायर 2018 के आरोपपत्र पर आधारित है। अब्दुल्ला, मिर्जा, गजनफर और पूर्व लेखाकार बशीर अहमद मिसगर और गुलजार अहमद बेग के खिलाफ दायर सीबीआई के आरोपपत्र में आरोप लगाया गया है कि 2002 से 2011 के बीच तत्कालीन राज्य में खेल को बढ़ावा देने के लिए ‘भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड’ (बीसीसीआई) द्वारा दिए गए अनुदान से ‘‘जेकेसीए के 43.69 करोड़ रुपये के धन का दुरुपयोग’’ किया गया था।
