India Heritage Diplomacy: इंडोनेशिया के ऐतिहासिक प्रम्बानन मंदिर (Prambanan Temple) के जीर्णोद्धार में मदद करने का भारत सरकार का फैसला सिर्फ एक पुरातत्व परियोजना नहीं है, बल्कि यह भारत की बढ़ती 'हेरिटेज डिप्लोमेसी' (विरासत कूटनीति) का एक बड़ा प्रतीक है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस हफ्ते होने वाले इंडोनेशिया (Yogyakarta) दौरे के दौरान 9वीं शताब्दी के इस भव्य शिव मंदिर परिसर के संरक्षण प्रोजेक्ट को औपचारिक रूप से लॉन्च किया जा सकता है।
इस परियोजना के साथ ही प्रम्बानन भी दक्षिण-पूर्व एशिया (Southeast Asia) के उन ऐतिहासिक हिंदू मंदिरों की सूची में शामिल हो गया है, जिनके जीर्णोद्धार और संरक्षण की जिम्मेदारी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को सौंपी गई है। भारत अपनी 'एक्ट ईस्ट पॉलिसी' (Act East Policy) के तहत सदियों पुराने साझा सभ्यतागत संबंधों को आधुनिक कूटनीति का जरिया बना रहा है।
1. प्रम्बानन प्रोजेक्ट (इंडोनेशिया): AI और प्राचीन तकनीक का संगम
जकार्ता के योग्याकर्ता (Yogyakarta) क्षेत्र में स्थित प्रम्बानन इंडोनेशिया का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर परिसर और एक यूनेस्को (UNESCO) विश्व धरोहर स्थल है।
त्रिदेवों को समर्पित: 9वीं शताब्दी का यह विशाल परिसर हिंदू त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश (शिव) को समर्पित है, जिसमें गगनचुंबी शिव मंदिर इसका मुख्य केंद्र है।
एनास्टाइलोसिस पद्धति (Anastylosis): एएसआई (ASI) के विशेषज्ञ इस मंदिर को संवारने के लिए 'एनास्टाइलोसिस' तकनीक का उपयोग करेंगे। इस संरक्षण तकनीक में स्मारकों को मुख्य रूप से उनके मूल पत्थरों का उपयोग करके ही दोबारा बनाया जाता है। नए पत्थरों का उपयोग केवल वहीं किया जाता है जहां संरचनात्मक रूप से बेहद जरूरी हो।
डिजिटल और AI की मदद: बिखरे हुए हजारों पत्थरों को सूचीबद्ध करने और संरचना को फिर से खड़ा करने के लिए इंडोनेशियाई सरकार डिजिटल तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद भी ले रही है।
2. अंगकोर वाट और ता प्रोम (कंबोडिया): भारत का फ्लैगशिप प्रोजेक्ट
प्रम्बानन से बहुत पहले, विदेशों में भारत का सबसे बड़ा और सफल संरक्षण प्रोजेक्ट कंबोडिया का अंगकोर वाट (Angkor Wat) था।
अंगकोर वाट (1986-1993): एएसआई ने दुनिया के इस सबसे बड़े हिंदू मंदिर परिसर को ढहने से बचाने के लिए बड़े पैमाने पर ड्रेनेज सिस्टम में सुधार, वनस्पतियों को हटाने और जटिल पत्थर की नक्काशी को संरक्षित करने का काम किया था।
ता प्रोम और प्रीह विहियर: साल 2004 से भारत कंबोडिया के 'ता प्रोम' (Ta Prohm) मंदिर का जीर्णोद्धार कर रहा है-यह वही प्रतिष्ठित मंदिर है जो विशाल पेड़ों की जड़ों से घिरा हुआ है। इसके अलावा प्रीह विहियर और आश्रम महा रुसई में भी भारत का संरक्षण कार्य जारी है।

सिर्फ हिंदू मंदिर बनाने पर ही नहीं ध्यान
3. माई सोन अभयारण्य (वियतनाम): प्राचीन चंपा साम्राज्य की कड़ियां
वियतनाम में यूनेस्को-सूचीबद्ध माई सोन अभयारण्य (Mỹ Sơn Sanctuary) भारत की विरासत कूटनीति का एक और महत्वपूर्ण अध्याय है।
शिवलिंग की खोज: एएसआई ने यहां 2017 में काम शुरू किया था। यह परिसर प्राचीन चंपा साम्राज्य का धार्मिक केंद्र हुआ करता था, जहां 4वीं से 14वीं शताब्दी के बीच निर्मित शैव मंदिर हैं। संरक्षण कार्य के दौरान भारतीय पुरातत्वविदों को यहां सदियों पुराना एक शिवलिंग भी मिला था, जिसने भारत-वियतनाम के ऐतिहासिक संबंधों को पुनर्जीवित किया। इसके तीन समूहों (A, H और K) का काम 2023 में पूरा हो चुका है।
4. वाट फू (लाओस) और थिरुकेतीश्वरम (श्रीलंका)
लाओस (Vat Phou): भारत 2009 से दक्षिणी लाओस में स्थित वाट फू में काम कर रहा है। यह 11वीं शताब्दी का एक खमेर मंदिर है, जो शुरू में भगवान शिव को समर्पित था और बाद में एक बौद्ध पूजा स्थल में बदल गया।
श्रीलंका (Thiruketheeswaram): पाक जलडमरू मध्य के पार, एएसआई श्रीलंका के ऐतिहासिक थिरुकेतीश्वरम मंदिर के संरक्षण में शामिल रहा है, जो भगवान शिव को समर्पित पूजनीय 'पंच ईश्वरम' में से एक है। 2012 में शुरू हुआ यह प्रोजेक्ट अब पूर्णता की ओर है।
भारत की 'हेरिटेज डिप्लोमेसी' का बढ़ता दायरा
मोदी सरकार ने सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को अपनी विदेश नीति (Foreign Policy) का एक बेहद मजबूत टूल बना दिया है। विदेश मंत्रालय (MEA) के आंकड़ों के अनुसार:
-भारत अब तक विदेशों में 50 से अधिक सांस्कृतिक और विरासत परियोजनाओं को पूरा कर चुका है।
-वर्तमान में लगभग 25 से अधिक परियोजनाएं विभिन्न देशों (इंडोनेशिया, वियतनाम, लाओस, कम्बोडिया आदि) में चल रही हैं।
केवल हिंदू मंदिर ही नहीं: भारत का यह दृष्टिकोण किसी एक धर्म तक सीमित नहीं है। भारत ने म्यांमार के प्रसिद्ध 'आनंद मंदिर' और बागान के बौद्ध पैगोडा के साथ-साथ कई ऐतिहासिक इस्लामिक और अन्य सांस्कृतिक स्मारकों के संरक्षण में भी तकनीकी और वित्तीय योगदान दिया है।
