Power Corridor: उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक (DGP) सुलखान सिंह ने टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल के खास कार्यक्रम 'पावर कॉरिडोर' में पुलिसिंग, महिला सुरक्षा, अपराध के आंकड़ों, पुलिस की कार्यशैली और कानून के शासन को लेकर खुलकर बात की।
1980 बैच के आईपीएस अधिकारी सुलखान सिंह ने अपने पुलिस करियर की शुरुआत वाराणसी से की थी। बाद में वह लखनऊ के कप्तान रहे और उत्तर प्रदेश के डीजीपी पद तक पहुंचे। टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल की डॉ. रमा सोलंकी के साथ बातचीत में सुलखान सिंह के लंबे पुलिस करियर के अनुभवों के साथ-साथ पुलिस व्यवस्था को लेकर उनकी व्यक्तिगत धारणाएं भी सामने आईं।
महिला सुरक्षा पर क्या बोले पूर्व DGP?
महिला सुरक्षा के सवाल पर सुलखान सिंह ने कहा कि देशवासियों को आश्वस्त करने के लिए यह कहना जरूरी है कि तमाम घटनाओं के बावजूद हमारा देश अन्य सभ्य देशों के मुकाबले महिला अपराधों, खासकर बलात्कार के मामलों में बहुत सुरक्षित है। उन्होंने 2023 के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि भारत में प्रति लाख आबादी पर बलात्कार के करीब 4.4 मामले दर्ज हुए, जबकि अमेरिका में 41.4, फ्रांस में 62 और बांग्लादेश में प्रति लाख 8 मामले हैं।
हालांकि, ये आंकड़े पूरी तरह विश्वसनीय नहीं हैं, क्योंकि यहां रिपोर्टिंग और रिकॉर्डिंग कम होती है, लेकिन फिर भी भारत में कोई पैनिक सिचुएशन नहीं है। अगर एजेंसियां और प्रोटोकॉल ठीक से काम करें तो स्थिति काफी सुधारी जा सकती है। उन्होंने कहा, ''प्रोटोकॉल का पालन न होने का मुख्य कारण जवाबदेही तय न होना है। राजनेता और जिम्मेदार लोग ऐसे लोगों को बचाते हैं, जिससे वे अंत में सजा से बेदाग बरी हो जाते हैं। जब तक कोई दबाव न हो, लोग ठीक से काम नहीं करते हैं।
इस दौरान उन्होंने बस का उदाहरण देते हुए कहा कि अवैध बसें पर्दे डालकर लोकल सवारियां उठाती हैं, लेकिन उन पर या ट्रांसपोर्ट विभाग पर कोई कार्रवाई नहीं होती है... उन्होंने आगे निर्भया कांड में इस्तेमाल होने वाली बस का भी उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि इंग्लैंड में यदि कोई गंभीर हादसा होता है तो उसकी अलग से विभागीय जांच होती है कि क्या लापरवाही हुई, जिससे वहां एक्सीडेंट रेट हमारे यहां से बहुत कम है।
कम रिपोर्टिंग और पुलिस पर अविश्वास
पूर्व डीजीपी ने कहा कि भारत में रेप के मामलों की रिपोर्टिंग और रिकॉर्डिंग बहुत खराब है। पुलिस के प्रति विश्वास की कमी के कारण पीड़िताएं थाने जाने से कतराती हैं, क्योंकि उन्हें डर रहता है कि पुलिस उचित कार्रवाई करने के बजाय उन्हें ही बदनाम कर देगी।
उन्होंने कहा कि भारत में आम लोगों में उदंडता बहुत ज्यादा है, जो जनरल डिसऑर्डर और उदंडता वर्चुअल स्पेस या सोशल मीडिया में दिखती है, वही फिजिकल स्पेस में भी रिफ्लेक्ट होती है। सरकार को नियमित जांच करानी चाहिए और कमिशंस बनाकर इसे सुधारना चाहिए। सुलखान सिंह ने आगे कहा कि आज सुनसान सार्वजनिक स्थानों में पुलिस आपको मिल जाए तो आप नर्वस फील करेंगे, न की सुरक्षित।
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क्या विभाग की जवाबदेही तय होनी चाहिए? इस सवाल पर उन्होंने कहा कि बिल्कुल, जब भी कोई मास मर्डर या दिन-दहाड़े मारपीट व अपराध की घटना होती है, तो जांच के अलावा प्रिवेंटिव एक्शन और अकाउंटेबिलिटी तय होनी चाहिए। पब्लिक स्पेस में जो डिसऑर्डर है, उसे रोकने के लिए सरकार को व्यवस्था बनानी चाहिए और पालन न करने वाले अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि पहले क्राइम मीटिंग्स में प्रिवेंटिव पुलिसिंग पर भी चर्चा होती थी। जैसे हमारे समय में एंटी-मजनू स्क्वाड बनाया गया था। पुलिस को सादे कपड़ों में उदंड तत्वों और क्रिमिनल्स को ट्रैप करना चाहिए। अवैध बसों, अवैध टैक्सियों, और फर्जी नंबरों से संचालित मोबाइल व गाड़ियों पर निरोधात्मक कार्रवाई होनी चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता है, तो डिस्ट्रिक्ट पुलिस चीफ (एसपी/कमिश्नर) को जिम्मेदार थानेदारों पर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए और उन्हें दोबारा चार्ज नहीं देना चाहिए। बिना सजा के डर (फियर ऑफ पनिशमेंट) के लोग ठीक से काम नहीं करते। उन्होंने आगे कहा, ''पब्लिक सर्वेंट इस मामले में बड़े ढीठ होते हैं।''
Sulkhan Singh Interview
क्या थानों के अंदर के सिस्टम को भी दुरुस्त करने की जरूरत है? इस सवाल पर उन्होंने कहा कि थानों में सिस्टम पहले से ही मौजूद है, लेकिन उसे फॉलो नहीं किया जा रहा है। डीजी ट्रेनिंग रहते हुए मैंने थानों में बच्चों, महिलाओं और रेप पीड़ितों से व्यवहार के लिए सीरियल नंबर वाली बुकलेट्स सप्लाई करवाई थीं। लेकिन पुलिसकर्मी थानों में कैजुअल तरीके से लेटकर मोबाइल देखते हैं, जिससे कोई पीड़ित उनके पास जाने में कतराता है...। इंग्लैंड में कांस्टेबल तमीज से सर या मैडम कहकर बात करता है, जबकि हमारे यहां ठीक से बात नहीं की जाती और इस पर उसको कोई सजा नहीं मिल रही है।
'अपराधियों को कानून का डर होना चाहिए'
इस दौरान उन्होंने जंजीर और दीवार फिल्म का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा, ''जब 70 के दशक की फिल्मों में आप पुलिस का आचरण देखें तो अब बहुत ज्यादा गिरावट आई है। आप जंजीर फिल्म को देखें तो उसमें कहते हैं 'मिस्टर तेजा' यू आर अंडर अरेस्ट... तमीज से बात करते हैं।'' उन्होंने कहा कि जब पुलिस बदतमीजी करती है, तो वह कानून का डर नहीं, बल्कि पुलिस का डर पैदा करती है, जिससे बेईमान पुलिस वालों की वसूली तो बढ़ जाती है, लेकिन अपराधियों के मन में खौफ पैदा नहीं होता है। अपराधियों में कानून का डर होना चाहिए कि यदि अपराध किया तो पुलिस छोड़ेगी नहीं।
