महाराष्ट्र की देवेंद्र फडणवीस सरकार ने ‘महाराष्ट्र शासन कार्यपद्धति नियम, 2026’ को अधिसूचित कर दिया है। नए नियमों के लागू होने के बाद मुख्यमंत्री की प्रशासनिक शक्तियों को लेकर राज्य की राजनीति में नई बहस शुरू हो गई है। नियमों में मुख्यमंत्री को किसी भी मंत्री या विभाग के फैसले की समीक्षा करने और अगर उसे जनहित में जरूरी लगे तो उसमें बदलाव करने का स्पष्ट अधिकार दिया गया है। हालांकि, मुख्यमंत्री को ऐसा करते समय अपने फैसले के कारण लिखित रूप में दर्ज करने होंगे।
सरकार का कहना है कि नए नियम प्रशासनिक और कानूनी व्यवस्था को अधिक स्पष्ट बनाने के उद्देश्य से लाए गए हैं। लेकिन राजनीतिक नजरिए से देखें तो इनका महत्व काफी बड़ा है। इसकी सबसे बड़ी वजह महाराष्ट्र की महायुति गठबंधन सरकार है, जिसमें बीजेपी के साथ शिवसेना और एनसीपी समेत सहयोगी दल शामिल हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री के अधिकारों का विस्तार गठबंधन के भीतर सत्ता के संतुलन पर असर डाल सकता है।
1975 के नियमों की जगह नया ढांचा
महाराष्ट्र में सरकारी कामकाज को नियंत्रित करने वाले ‘रूल्स ऑफ बिजनेस’ कोई नई व्यवस्था नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 166 के तहत राज्य सरकार के कामकाज को संचालित करने के लिए पहले से नियम मौजूद थे। लेकिन पुराने ढांचे में मुख्यमंत्री और अलग-अलग विभागों के मंत्रियों के बीच अधिकारों की सीमा को लेकर कुछ स्थितियां पूरी तरह स्पष्ट नहीं थीं। लेकिम अब महाराष्ट्र गवर्नमेंट रूल्स ऑफ बिजनेस, 2026 में मुख्यमंत्री और विभागीय मंत्रियों की भूमिकाओं को ज्यादा स्पष्ट तरीके से परिभाषित किया गया है। सामान्य तौर पर विभाग का कामकाज और उससे जुड़े फैसले लेने की जिम्मेदारी संबंधित मंत्री के पास ही रहेगी। लेकिन अब मुख्यमंत्री के पास किसी फैसले की समीक्षा करने और जनहित में उसमें बदलाव करने का स्पष्ट नियम-आधारित अधिकार होगा।
इसका मतलब यह नहीं है कि मंत्रियों की स्वायत्तता पूरी तरह खत्म हो गई है। विभागीय मंत्री अपने विभाग के रोजमर्रा के प्रशासन और नीतिगत फैसलों के लिए जिम्मेदार रहेंगे। फर्क यह है कि किसी महत्वपूर्ण मामले में मुख्यमंत्री के पास अब स्पष्ट रूप से हस्तक्षेप करने की शक्ति होगी।
2023 के बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले ने क्या कहा था?
नए नियमों की पृष्ठभूमि में 2023 का एक अहम मामला भी देखा जा रहा है। उस समय एकनाथ शिंदे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री थे। चंद्रपुर जिला केंद्रीय सहकारी बैंक से जुड़े एक मामले में सहकारिता मंत्री के फैसले पर मुख्यमंत्री शिंदे ने रोक लगा दी थी।मामला बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच पहुंचा। अदालत ने मुख्यमंत्री के आदेश को रद्द करते हुए कहा था कि उस समय लागू रूल्स ऑफ बिजनेस के तहत मुख्यमंत्री को किसी विभागीय मंत्री के स्वतंत्र फैसले में इस तरह सीधे हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं था।
इस फैसले ने मुख्यमंत्री और विभागीय मंत्री के अधिकार क्षेत्र के बीच कानूनी सीमा को स्पष्ट कर दिया था। अदालत का मूल तर्क था कि मुख्यमंत्री होने मात्र से किसी विभागीय मंत्री के स्वतंत्र अधिकार अपने आप मुख्यमंत्री के अधीन नहीं हो जाते। इसके लिए स्पष्ट कानूनी प्रावधान जरूरी है। अब 2026 के नए नियमों में सरकार ने इसी स्थिति को नए तरीके से परिभाषित किया है और मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप की शक्ति को नियमों में स्पष्ट रूप से शामिल कर दिया है।
मुख्यमंत्री कब बदल सकेंगे मंत्री का फैसला?
नए नियमों के मुताबिक मुख्यमंत्री किसी मंत्री या विभाग के फैसले की समीक्षा कर सकते हैं। अगर मुख्यमंत्री को लगता है कि किसी फैसले में बदलाव जनहित में जरूरी है, तो वह उसमें बदलाव कर सकते हैं। हालांकि यह शक्ति पूरी तरह असीमित नहीं है। मुख्यमंत्री को हस्तक्षेप या बदलाव के कारण लिखित रूप में दर्ज करने होंगे। यानी अगर किसी मंत्री के फैसले को बदला जाता है तो उसके पीछे का आधार सरकारी रिकॉर्ड का हिस्सा बनेगा। इस प्रावधान का एक अहम पहलू यह है कि भविष्य में किसी फैसले को लेकर विवाद या कानूनी चुनौती सामने आती है तो मुख्यमंत्री द्वारा दर्ज किए गए कारणों की भी जांच हो सकती है।
क्या मंत्री अब सिर्फ नाम के विभाग प्रमुख रह जाएंगे?
ऐसे में अब यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या मंत्रियों की शक्ति कम हो जाएगी और क्या वे महज नाम के लिए विभाग के प्रमुख रह जाएंगे। इसे लेकर राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ऐसा नहीं है कि सीएम की शक्तियों में इजाफा कर देने भर से ही मंत्रियों की शक्तियां कम हो जाएंगी। नए नियम मंत्रियों से उनके विभागीय अधिकार नहीं छीनते। किसी विभाग का रोजमर्रा का प्रशासन,नीतिगत फैसले और विभागीय जिम्मेदारी संबंधित मंत्री के पास ही रहेगी।
हालांकि, पहले की तुलना में अब मुख्यमंत्री की स्थिति अधिक मजबूत हो गई है। अगर किसी बड़े, विवादित या राजनीतिक रूप से संवेदनशील फैसले पर मुख्यमंत्री को लगता है कि उसमें जनहित के आधार पर बदलाव जरूरी है, तो वह हस्तक्षेप कर सकते हैं।
मुख्यमंत्री अब किसी भी विभाग की फाइल भी मंगा सकेंगे
नए नियमों का एक और महत्वपूर्ण पहलू मुख्यमंत्री को दी गई फाइल और दस्तावेज मंगाने की स्पष्ट शक्ति है। मुख्यमंत्री किसी भी विभाग से किसी महत्वपूर्ण मामले की फाइल या दस्तावेज मांग सकते हैं। ऐसी स्थिति में संबंधित मंत्री और विभाग के सचिव के लिए जरूरी होगा कि वे मुख्यमंत्री को मांगे गए दस्तावेज उपलब्ध कराएं। ऐसे में मुख्यमंत्री के पास किसी विवादित मामले में जानकारी जुटाने और उसके बाद हस्तक्षेप करने के लिए पहले से ज्यादा स्पष्ट संस्थागत व्यवस्था होगी।
फडणवीस बनाम शिंदे को लेकर खड़े हो रहे सवाल
ऐसे में राज्य के राजनीतिक हलकों में ‘महाराष्ट्र शासन कार्यपद्धति नियम,2026’ को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा इसके राजनीतिक प्रभावों की हो रही है। दिलचस्प बात यह है कि जिस 2023 के मामले ने मुख्यमंत्री की शक्तियों को लेकर कानूनी विवाद पैदा किया था,उसमें उस समय मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे थे, लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है। देवेंद्र फडणवीस मुख्यमंत्री हैं और एकनाथ शिंदे उपमुख्यमंत्री।
इसे देखते हुए,राजनीतिक हलकों में सवाल उठ रहे हैं कि क्या ये नए नियम केवल एक कानूनी खामी को दूर करने के लिए लाए गए हैं,या इसका उद्देश्य गठबंधन सरकार के भीतर मुख्यमंत्री की स्थिति को और मजबूत करना भी है? राजनीतिक जानकारों का कहना है कि भले ही फडणवीस सरकार कितना ही क्यों न कहे कि ये नियम प्रशासनिक और कानूनी सुधार के लिए लाए गए हैं, बावजूद इसके यह फडणवीस और शिंदे के बीच सत्ता के संतुलन को काफी हद तक प्रभावित कर सकता है।
महायुति में कैसे बदलेगा सत्ता संतुलन?
बता दें कि महाराष्ट्र की महायुति सरकार में भाजपा के साथ शिवसेना और रांकपा और अन्य सहयोगी दल शामिल हैंऔर गठबंधन सरकारों में विभागों का बंटवारा राजनीतिक शक्ति का भी महत्वपूर्ण आधार होता है। जिस पार्टी के पास कोई बड़ा विभाग होता है,उसका मंत्री उस विभाग से जुड़े फैसलों पर महत्वपूर्ण प्रभाव रखता है। लेकिन नए नियमों के बाद मुख्यमंत्री के पास यह स्पष्ट अधिकार होगा कि वह किसी फैसले को जनहित के आधार पर बदलने का निर्देश दे सकें।