CJP Protest: दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के प्रदर्शन के मद्देनजर मेट्रो और रेलवे सेवाओं पर प्रतिबंध लगाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दाखिल की गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि दिल्ली पुलिस, केंद्र सरकार और मेट्रो व रेलवे से जुड़े अधिकारियों ने 9 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट की ओर से दिए गए आदेश का जानबूझकर उल्लंघन किया। याचिकाकर्ता ने संबंधित अधिकारियों के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई शुरू करने और मेट्रो व रेलवे सेवाओं पर लगाए गए व्यापक प्रतिबंध तत्काल हटाने की मांग की है।
सुप्रीम कोर्ट में रविवार को अवमानना याचिका पर होगी सुनवाई (फाइल फोटो)
सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर उपलब्ध कॉज लिस्ट के मुताबिक, याचिका को 11 अक्टूबर, रविवार को जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की विशेष पीठ के सामने सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है। मामले में याचिकाकर्ता वकील शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी हैं और याचिका उनके वकील चांद कुरैशी के माध्यम से दाखिल की गई है।
किसके खिलाफ दाखिल हुई अवमानना याचिका?
याचिका में केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन, दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार और DMRC की चेयरपर्सन डी. थारा को प्रतिवादी बनाया गया है। याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 129 और अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 12 के तहत कार्रवाई शुरू करने की मांग की है।
याचिका के मुताबिक, दिल्ली पुलिस और परिवहन अधिकारियों की ओर से जारी निर्देशों के बाद दिल्ली मेट्रो के 57 स्टेशनों पर प्रवेश और निकास बंद करने तथा नई दिल्ली और हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशनों पर आने वाली मेल और एक्सप्रेस ट्रेनों के परिचालन को रोकने या रद्द करने के निर्देश दिए गए थे।
सुप्रीम कोर्ट ने 9 अक्टूबर को क्या कहा था?
9 अक्टूबर को मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने मेट्रो और रेलवे सेवाओं पर पूर्ण प्रतिबंध के मुद्दे पर सुनवाई की थी। पीठ ने कहा था कि आवश्यक सार्वजनिक परिवहन पर पूरी तरह रोक लगाने वाले निर्देश जरूरत से ज्यादा कठोर प्रतीत होते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल के आश्वासन को दर्ज करते हुए स्पष्ट किया था कि मेट्रो ट्रेनों और अन्य रेल सेवाओं की आवाजाही पर पूरी तरह रोक नहीं होनी चाहिए। हालांकि, कानून-व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए सेवाओं का संचालन उचित नियमन के साथ किया जा सकता है।
पीठ ने यह भी निर्देश दिया था कि परिवहन सेवाओं के संचालन से संबंधित निर्णय का व्यापक प्रचार किया जाए, ताकि लोगों को असुविधा न हो। इसके अलावा, शहर में वाहनों की सुचारु आवाजाही के लिए अखबारों और ऑनलाइन माध्यमों पर ट्रैफिक एडवाइजरी जारी करने को कहा गया था। दिल्ली मेट्रो, संबंधित रेलवे अधिकारियों और दिल्ली पुलिस (ट्रैफिक) को चार दिनों के भीतर अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश भी दिया गया था।
याचिका में क्या आरोप लगाए गए हैं?
शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी ने अपनी याचिका में दावा किया है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद मेट्रो स्टेशनों के प्रवेश द्वार बंद रखे गए और सार्वजनिक परिवहन पर प्रतिबंध जारी रहे।
याचिका के अनुसार, याचिकाकर्ता ने 9 अक्टूबर की रात करीब 9:30 बजे जीटीबी नगर और विश्वविद्यालय मेट्रो स्टेशनों का दौरा किया था। उनका दावा है कि वहां प्रवेश द्वार बंद थे और निकास को नियंत्रित किया जा रहा था। याचिका में यह भी कहा गया है कि दिल्ली मेट्रो ने अपने आधिकारिक 'एक्स' अकाउंट पर सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए कई स्टेशनों के प्रवेश और निकास बंद रहने की जानकारी दी थी।
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याचिकाकर्ता का आरोप है कि अधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद व्यापक प्रतिबंध जारी रखे और यात्रियों के लिए पारदर्शी एवं स्पष्ट परिवहन संबंधी जानकारी उपलब्ध नहीं कराई। उनके मुताबिक, इससे दिल्ली में आम लोगों और जरूरी काम से यात्रा करने वालों को परेशानी हुई।
सुप्रीम कोर्ट से क्या मांग की गई है?
अवमानना याचिका में अदालत से तीन प्रमुख राहतें मांगी गई हैं:
1. सुप्रीम कोर्ट के 9 अक्टूबर के आदेश की कथित जानबूझकर अवहेलना के लिए संबंधित अधिकारियों के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू की जाए।
2. गृह सचिव, दिल्ली पुलिस कमिश्नर और दिल्ली मेट्रो के चेयरमैन को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होकर यह बताने का निर्देश दिया जाए कि उनके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई क्यों न की जाए।
3. मेट्रो और रेलवे सेवाओं पर लगाए गए व्यापक प्रतिबंध तत्काल हटाने और सार्वजनिक सूचना के साथ नियमन के तहत सेवाओं का संचालन सुनिश्चित करने का अंतरिम निर्देश दिया जाए।
टीएमसी सांसद की याचिका पर भी कल ही सुनवाई
इसी मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता और तृणमूल कांग्रेस की राज्यसभा सांसद मेनका गुरुस्वामी ने भी दिल्ली में विरोध प्रदर्शन के दौरान विपक्षी नेताओं को एहतियातन हिरासत में लिए जाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है।
उनकी याचिका पर भी कल ही यानी रविवार को सुप्रीम कोर्ट की विशेष बेंच के सामने सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है। याचिका में चार पूर्व मुख्यमंत्रियों समेत विपक्षी नेताओं को हिरासत में लिए जाने की पुलिस कार्रवाई को चुनौती दी गई है।
मेनका गुरुस्वामी ने दलील दी है कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के मौलिक अधिकार को दबाने के लिए एहतियातन हिरासत का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। उन्होंने प्रदर्शनकारियों को सड़कों से और विपक्षी नेताओं को उनके आवासों से हिरासत में लिए जाने पर सवाल उठाए हैं। उनकी याचिका में कहा गया है कि शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार लोकतांत्रिक व्यवस्था का अहम हिस्सा है और राजनीतिक नेताओं के खिलाफ इस तरह की कार्रवाई के जरिए इसे बाधित नहीं किया जाना चाहिए।
