क्या है AFSPA कानून जिस पर सरकार ने बनाई कमेटी, होगा ऐतिहासिक फैसला !

  • Authored by: टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल
  • Updated Dec 27, 2021, 08:46 PM IST

AFSPA : सरकार AFSPA कानून की समीक्षा के लिए सचिव स्तर के अधिकारी विवेक जोशी की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय कमेटी का गठन कर दिया है। जो कि 45 दिन में अपनी सिफारिशें पेश करेगी।

क्या  है AFSPA कानून जिस पर सरकार ने बनाई कमेटी, होगा ऐतिहासिक फैसला !
Photo Credit: BCCL

नई दिल्ली: बीते 4 दिसंबर को नगालैंड के मोन जिले में सुरक्षा बलों की गोलीबारी में 14 आम नागरिकों के मारे जाने की घटना के बाद,  'सशस्त्र बल (विशेष शक्ति) अधिनियम, 1958 (AFSPA) को वापस लेने की जोर पकड़ती मांग के बीच 26 दिसंबर को गृह मंत्रालय ने एक कमेटी का गठन कर दिया है। कमेटी AFSPA को वापस लेने की संभावना पर विचार करेगी। उच्च स्तरीय कमेटी का गठन सचिव स्तर के अधिकारी विवेक जोशी की अक्ष्यक्षता में किया गया है। जो कि 45 दिनों में अपनी  रिपोर्ट सौंपेगी।

गृहमंत्री अमित शाह ने जताया था खेद

नगालैंड में 14 बेकसूर नागरिकों की मौत के बाद केंद्रीय गृह मंत्री ने अमित शाह ने संसद ने खेद जताया था। और उन्होंने कहा था कि घटना की पूरी जांच के लिए एक विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया गया है। जिसे एक महीने के अंदर जांच पूरी करने को कहा गया है। 

क्या है  AFSPA 

AFSPA कानून अशांत क्षेत्र में सशस्त्र बलों को विशेष शक्तियां प्रदान करता है। जो कि देश में 1958 से लागू  है। शुरूआत में यह पूर्वोत्तर राज्यों में लगाया था। उसके बाद  पंजाब में उग्रवाद बढ़ने पर वहां के कई  क्षेत्रों में लगाया गया।  इन राज्यों में घोषित किए गए अशांत क्षेत्र की सीमाएं पाकिस्तान, चीन, बांग्लादेश और म्यांमार से सटी हुईं थीं।

इसके पहले 1958 में नगालैंड में उग्रवादी गतिविधियाों के देखते हुए कानून लागू करते समय तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि छह महीने के लिए सेना भेजी जा रही है, हालात काबू होते ही सैन्य बलों को वापस बुला लिया जाएगा। लेकिन जब हालात काबू में नहीं आ पया तो अध्यादेश संसद से पारित कराकर लागू कर दिया गया।

सुरक्षा बलों को क्या अधिकार मिलते हैं

AFSPA के तहत सुरक्षा बलों को कई विशेष अधिकार मिल जाते हैं। इसके तहत सुरक्षा बल संदेह के आधार पर किसी को भी गोली मार सकते हैं, बिना किसी वॉरंट के घर की तलाशी ले सकते हैं, किसी को भी हिरासत में लिया जा सकता है। सबसे बड़ी बात है कि इसके सुरक्षा बलों को कानूनी कार्रवाई से भी सुरक्षा मिल जाती है। केवल केंद्र की मंजूरी के बाद ही कार्रवाई हो सकती है।

इन राज्यों में लागू है कानून

AFSPA जम्मू और कश्मीर,  असम,  नगालैंड, मणिपुर (इंफाल म्‍यूनिसिपल इलाके को छोड़कर), अरुणाचल प्रदेश के तिराप, छांगलांग और लांगडिंग जिले और असम से लगी सीमा पर यह कानून लागू है। इसके अलावा मेघालय में भी असम से लगी सीमा पर यह कानून लागू है।

क्यों होता है विरोध

अधिकार मिलने के नाम पर सुरक्षा बलों के उपर मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगते रहे हैं। इसके  तहत फर्जी एनकाउंटर, यौन उत्पीड़न आदि के आरोप लगते रहे हैं। नगालैंड में आम नागरिकों के मारे जाने की घटना के बाद इन आरोपों को और बल मिला है। हालांकि कानून के समर्थकों का कहना है अशांत क्षेत्रों में उग्रवादी गतिविधियों पर लगाम लगाने में कानून का प्रमुख सहयोग रहा है।

इन जगहों से हट चुका है AFSPA

AFSPA शुरूआत में असम और मणिपुर में लागू किया गया था। फिर  बाद में त्रिपुरा, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम और नगालैंड सहित पूरे पूर्वोत्तर भारत में लागू कर दिया गया। बाद में पंजाब, चंडीगढ़ और जम्मू-कश्मीर भी इसके दायरे में आ गया। पंजाब में उग्रवाद खत्म होने के बाद 1997 में  कानून को वापस ले लिया गया था। इसी तरह 2015 में त्रिपुरा में उग्रवाद शांत होने पर कानून हटाया गया। AFSPA हटाने की पहल  केंद्र सरकार और राज्य सरकार कर सकती हैं। लेकिन अंतिम फैसला लेने का अधिकार केंद्र सरकार को ही प्राप्त है।

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