Women's Day: अद्भुत हैं ये महिलाएं, जिन्होंने कुरीतियों के खिलाफ लड़कर जीती जंग

देश
किशोर जोशी
Updated Mar 08, 2021 | 06:05 IST

8 मार्च की तारीख का एक खास महत्व है। विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं के प्रति सम्मान और प्यार प्रकट करते हुए इस दिन को महिलाओं की विभिन्न उपलब्धियों के उपलक्ष्य में उत्सव के तौर पर मनाया जाता है।

These women are incredibale, whose achievements are proud of every Indian
अद्भुत हैं ये महिलाएं,जिनके कारनामों पर हर भारतीय को है गर्व 

मुख्य बातें

  • महिला दिवस पर हम कई महिलाओं का कर रहे हैं जिक्र जिन्होंने समाज को दिखाया आइना
  • सावित्रीबाई फुले ने महिला सुधार के लिए जो काम किया वो आज भी प्रेरणा देता है
  • समाज की कुरीतियों को लेकर और भी महिलाओं ने दिया महत्वपूर्ण योगदान

नई दिल्ली: महिलाओं को सम्मान देने और उनकी उपलब्धियों को सम्मान देने के लिए हर साल 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है। इस बार 8 मार्च को सोमवार है। पहली बार अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस सबसे पहले 1909 में मनाया गया था। भारतीय महिलाओं का डंका देश ही नहीं विदेशों में भी बजा है और आज जल हो या थल या फिर नभ, हर जगह महिलाएं अपनी काबिलियत के बल नए-नए कीर्तिमान स्थापित कर रही हैं। आइए कुछ ऐसी ही भारतीय महिलाओं से आपका परिचय कराते हैं जिन्होंने समाज की बुराइयों को हटाने और कुरीतियों को हटाने में वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बनाईं।

सावित्रीबाई फुले

सावित्रीबाई फुले का नाम भला कौन नहीं जानता है। भारत की प्रथम भारतीय महिला शिक्षिका सावित्राबाई फुले ने 19वीं सदी में स्त्रियों के अधिकारों, अशिक्षा, छुआछूत, सतीप्रथा, बाल या विधवा-विवाह जैसी कुरीतियों के खिलाफ ऐसी आवाज उठाई कि वो महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्त्रोत बन गईं। 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सातारा जिले के नायगांव में जन्मी सावित्रीबाई की शादी 9 साल की उम्र में ज्योतिराव फुले से हो गई। जब उन्होंने लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला था तो इसका ब्राह्मणों ने जमकर विरोध किया क्योंकि उस समय लड़कियों की शिक्षा की खिलाफत होती थी। उसके बाद सावित्री बाई ने एक लंबी लड़ाई लड़ी और इसके लिए उन्हें भारी मुसीबतों का भी सामना करना पड़ा था।

डॉ एनी बेसेन्ट
एनी बेसेंट अग्रणी आध्यात्मिक, थियोसोफिस्ट, महिला अधिकारों की समर्थक, लेखक, वक्ता एवं भारत-प्रेमी महिला थीं। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्षा बनी एनी बेसेंट के जीवन का मूलमंत्र था कर्म, वह जो ठान लेती थी उसे धरातल पर उतारकर रहती थीं।  शिक्षा में धार्मिक शिक्षा का समावेश चाहने वाली एनी बेसेंट ने 1898 में वाराणसी में सेन्ट्रल हिन्दू स्कूल की स्थापना की। बाल विवाह, जाति व्यवस्था, विधवा विवाह, विदेश यात्रा आदि को खत्म करने के लिए एक संस्था का गठन किया था जिसमें शामिल होने के लिए एक प्रतिज्ञापत्र पर हस्ताक्षर करने पड़ते थे।
 

मदर टेरेसा
 मदर टेरसा रोमन कैथोलिक नन थीं, जिन्होंने १९४८ में स्वेच्छा से भारतीय नागरिकता ले ली थी। मदर टेरेसा 1950 में कोलकाता में मिशनरीज़ ऑफ चैरिटी की स्थापना की। समाज के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाली मदर टेरेसा ने दशकों तक गरीब, बीमार, अनाथ और मरते हुए लोगों की इन्होंने मदद की। मदर टेरेसा ने एचआईवी/एड्स, कुष्ठ और तपेदिक के रोगियों के लिए धर्मशालाएं बनवाई और अनाथ बच्चों के लिए स्कूल और आश्रम खोले।

कमलादेवी चट्टोपाध्याय
कमलादेवी चट्टोपाध्याय के बारे में बहुत कम लोग जानते होंगे। महात्मा गांधी ने 'नमक सत्याग्रह' के लिए दांडी मार्च किया और बंबई में 'नमक सत्याग्रह' का नेतृत्व करने के लिए सात सदस्यों वाली टीम बनाई जिसमें कमलादेवी और अवंतिकाबाई गोखले शामिल थीं। यहां से कमलादेवी की इमेज एक ऐसी महिला की बनी जो पुरुष प्रधान समाज में कंधे से कंधा मिलाकर चल सकती हैं। बीबीसी के मुताबिक, 19वीं सदी में लड़कियों के लिए स्कूल की व्यवस्था नहीं थी लेकिन कमलादेवी की मां गिरजाबाई की पढ़ाई-लिखाई घर पर ही पंडितों के ज़रिए हुई। फिल्मों में भी अभिनेत्री के तौर काम कर चुकी कमलादेवी बाद में कांग्रेस में शामिल हुई। 1926 में तब के मद्रास प्रोविंशियल लेजिसलेचर (आज के विधानसभा के समकक्ष) के लिए चुनाव हुए और कमलादेवी ने चुनाव लड़ा लेकिन वह बहुत कम मतों से हार गई लेकिन हारते- हारते इतिहास बना गईं और चुनाव लड़ने वाली भारत की पहिला महिला बनीं।

मुथुलक्ष्मी रेड्डी 
मुथुलक्ष्मी रेड्डी को 'कई पहलें करने वाली' महिला के तौर पर जाना जाता है।  वह पहली हाउस सर्जन, भारत की पहली महिला विधायक और मद्रास विधान परिषद की पहली महिला उपाध्यक्ष बनीं थी।बचपन से ही पढ़ने लिखने में तेज रेड्डी ने कई मुसीबतों का सामना भी किया। रूढ़िवादी समाज ने उनके स्कूल पढ़ाने को लेकर बहुत हंगामा किया। उन्होंने महिलाओं के अधिकारों और सशक्तीकरण के लिए काम किया। बाल विवाह रोकने से लेकर देवदासी प्रथा को खत्म करने और वेश्वालय बंद करने जैसे कई कार्यों में मुथुलक्ष्मी रेड्डी का महत्वपूर्ण योगदान रहा।

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