हिंदू-हिंदुत्व पर छिड़ी है बहस, विवेकानंद ने 129 साल पहले अपने हिंदुत्व से दुनिया को कर दिया था मुरीद

Swami Vivekanand Janyanti: आज के राजनैतिक नेतृत्व को स्वामी विवेकानंद के हिंदुत्व को समझने की जरूरत है। जिन्होंने 128 साल पहले ही दुनिया को सहिष्णुता की सीख दी थी।

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विवेकानंद ने दुनिया को बनाया मुरीद  |  तस्वीर साभार: BCCL
मुख्य बातें
  • विवेकानंद ने कहा था कि मुझे एक ऐसे धर्म से जुड़े होने पर गर्व है जिसने दुनिया को सहिष्णुता का पाठ सिखाया है।
  • धर्म परिवर्तन पर भी सवाल खड़ा करते हुए कहा था कि भूखे लोगों को धर्म का उपदेश देना, उनका अनादर और तिरस्कार करना है।
  • उन्होंने कहा कि संप्रदायवाद, कट्टरता ,धर्मांधता ने इस खूबसूरत पृथ्वी को मनुष्य के खून से लथपथ कर दिया है ।

नई दिल्ली:  देश में इस समय हिंदू और हिंदुत्व के बीच बहस छिड़ी हुई है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने हिंदू और हिंदुत्व को अलग करते हुए कहा है "हिंदू सच बोलते हैं, हिंदुत्ववादी झूठ बोलते हैं"। वहीं भाजपा  कहती है कि कांग्रेस और गांधी परिवार का चरित्र रहा है कि जब भी उनको मौका मिलता है तो हिन्दू धर्म के ऊपर प्रहार जरूर करते हैं। इस बीच चुनावी लड़ाई में  80 बनाम 20 का भी मुद्दा उछल जाता है। जिसे भाजपा से लेकर अपने अनुसार व्याख्या करते हैं। 

लेकिन आज से 129 साल पहले एक युवा शख्स ऐसा था, जिसने अपनी हिंदुत्व की परिभाषा से पूरी दुनिया को मुरीद कर दिया था। और दुनिया के प्रमुख चिंतक, विचारक उनके दर्शन से प्रभावित हुए बिना नही रह सके। हम स्वामी  विवेकानंद की बात कर रहे हैं। जिन्होने 11 सितंबर 1893 को शिकागों में शुरू हुए हुए 17 दिन के विश्व धर्म सम्मेलन की धारा ही बदल दी थी।

उनके जन्मदिन के मौके पर आइए जानते हैं स्वामी विवेकानंद ने विश्व धर्म संसद में हिंदू धर्म के बारे में क्या कहा था...


स्वामी विवेकानंद के भाषण की शुरूआत ‘अमेरिकन बहन एवं भाइयों’ से हुई थी और ये दो शब्द कालजयी बन गए।  इन दो शब्दों ने सभा पर ऐसा चमत्कारिक प्रभाव छोड़ा था कि तालियों की गड़गड़ाहट खत्म होने का नाम नहीं ले रही थी। उसकी एक बड़ी वजह एक संन्यासी द्वारा स्त्री को पहला स्थान देना और सारे विश्व को परिवार मानकर संबोधित करना था। अपने छोटे से भाषण में ही,विवेकानंद ने दुनिया के सामने हिन्दू दर्शन एवं हिन्दुत्व को स्वीकार्यता दिला दी।

उन्होंने हिंदू धर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि मुझे एक ऐसे धर्म से जुड़े होने पर गर्व है जिसने दुनिया को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकृति दोनों सिखाई है। हम न केवल सार्वभौमिक सहिष्णुता में विश्वास करते हैं, बल्कि हम सभी धर्मों को सत्य मानते हैं। मुझे एक ऐसे राष्ट्र से जुड़े होने पर गर्व है, जिसने सभी धर्मों और पृथ्वी के सभी राष्ट्रों के पीड़ितो और शरणार्थियों को आश्रय दिया है। 

जिस वर्ष यहूदियों का पवित्र मंदिर रोमन जाति के अत्याचार से मिट्टी में मिला दिया गया था, उसी साल कुछ यहूदी दक्षिण भारत के तट पर आश्रय लेने  पहुंचे थे। तो हमारी जाति ने उन्हें सीने से लगा लिया। उन्हें अपनी उपासना पद्धति के अनुसार उपासना करने का भी मौका दिया। पारसियों की रक्षा की और अब भी भारत में उनका पालन-पोषण हो रहा है।

उन्होंने इस अवसर एक भजन की पंक्तियां भी सुनाई थी जैसे विभिन्न धाराओं के स्रोत अलग-अलग जगहों पर होते हैं, वे सभी समुद्र में जाकर एक हो जाते हैं। उसी तरह हे भगवान, मनुष्य अपनी इच्छा के अनुरूप अलग-अलग मार्ग चुनता है, जो देखने में भले ही सीधे या टेढ़े-मेढ़े लगें, परंतु सभी आप तक ले जाते हैं। 

विवेकानंद ने गीता के उद्धरण का उल्लेख करते हुए कहा कि ईश्वर कहते हैं 'जो कोई भी मेरे पास किसी भी रूप से मेरे पास आता है, मैं उस तक पहुंचता हूँ। सभी मनुष्य उन रास्तों से संघर्ष कर रहे हैं जो अंत में मुझ तक ले आते हैं।'  उन्होंने कहा संप्रदायवाद, कट्टरता , धर्मांधता ने इस खूबसूरत पृथ्वी को मनुष्य के खून से लथपथ कर  दिया है और कई सभ्यताओं को नष्ट कर दिया है। अब इसे खत्म करने का समय है।

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हिंदु धर्म का ऐसे हुआ उद्भव

हिंदुओं ने अपना धर्म  वेदों के माध्यम से प्राप्त किया है।  वेद आदि और अंत के बिना हैं। सुननें में यह अजीब लग सकता है कि एक किताब बिना शुरुआत या अंत के कैसे हो सकती है? लेकिन वेदों का कोई उद्भव और अंत नहीं है। उनका अर्थ, अलग-अलग लोगों द्वारा अलग-अलग समय में खोजे गए आध्यात्मिक नियमों का संचित खजाना है। जैसे गुरुत्वाकर्षण का नियम, उसकी खोज से पहले मौजूद था, और अगर पूरी मानवता इसे भूल जाती है, तो भी यह अस्तित्व में रहेगा। ऐसा ही आध्यात्मिक दुनिया को नियंत्रित करने वाले नियमों के साथ भी है। 

इन नियमों के खोजकर्ताओं को ऋृषि कहा जाता है। और मुझे बताते हुए खुशी हो रही है कि इन ऋृषियों में से कुछ सबसे महान महिलाएं थीं। वेद हमें सिखाते हैं कि सृष्टि का आदि या अंत नहीं है।

हिंदू धर्म क्यों खास

उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म की शक्ति अनेक पंथों-मतों के उद्भव में है। इसके विपरीत यहूदी धर्म, ईसाई धर्म को नहीं पचा पाने के कारण अब केवल अवशेष मात्र रह गया है। हिंदू धर्म में आत्मा व्याख्या है, पश्चिम में आत्मा जैसी कोई कल्पना नहीं है। पुनर्जन्म, कर्मवाद, निष्काम कर्म पर भारतीय चिंतन में प्रकाश डाला गया है। मनुष्य पापी नहीं, अमृत पुत्र है। उसमें स्वयं भगवान बनने की क्षमता है। मूर्ति पूजा प्रथम सीढ़ी है। विवेकानंद ने भारत में मिशनरियों द्वारा चलाये जा रहे धर्म परिवर्तन पर भी सवाल खड़ा करते हुए कहा- भूखे लोगों को धर्म का उपदेश देना, उनका अनादर एवं तिरस्कार करना है। हिंदुस्तान के लोगों को अन्न-रोटी और वस्त्र की आवश्यकता है। आध्यात्मिक ज्ञान की नहीं है।

हिंदू के लिए, विभिन्न धर्मों की पूरी दुनिया केवल एक यात्रा है। जिसमें  पुरुषों और महिलाओं का उद्देश्य विभिन्न परिस्थितियों के माध्यम से, एक ही लक्ष्य हासिल करना है। प्रत्येक धर्म भौतिक मनुष्य से केवल एक ईश्वर का विकास कर रहा है, और वही ईश्वर उन सभी का प्रेरक है। 

(स्रोत: बेलूर मठ द्वारा प्रकाशित भाषण के अंश)

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