nirbhaya gangrape verdict: जिंदगी की जंग हार कर भी जीत गई, मैं हूं निर्भया

देश
ललित राय
Updated Jan 07, 2020 | 18:28 IST

अगर वो जिंदा होती तो बात कुछ और होती है। वो कहती है कि देर से ही सही इंसाफ तो मिला। सात साल की लड़ाई और दांवपेंच में निर्भया के दोषियों का भविष्य तय हो चुका है। उन्हें फांसी के फंदे पर लटकना ही होगा।

nirbhaya gangrape verdict: सात साल बाद इंसाफ पर लगी अंतिम मुहर, मां- अब मुझे सुकून है
निर्भया केस में सात साल बाद इंसाफ पर लगी अंतिम मुहर 

मुख्य बातें

  • निर्भया के चारों दोषियों की फांसी की सजा बरकरार, 22 जनवरी के लिए डेथ वारंट जारी
  • पटियाला हाउस कोर्ट की तरफ से डेथ वारंट जारी
  • दोषियों के सामने अब करीब करीब सभी विकल्प समाप्त

नई दिल्ली। निर्भया के दोषियों की फांसी की तारीख मुकर्रर हो चुकी है। 22 जनवरी सुबह सात बजे उस कलेजे को सबसे ज्यादा ठंडक मिलेगी जो पिछले सात साल से तिल तिल कर मर रही थी। उसकी जिंदगी की सिर्फ एक ख्वाहिश ही थी कि निर्भया के गुनहगारों की सजा फांसी से कम किसी भी कीमत पर नहीं होनी चाहिए। सात साल के बाद सात जनवरी को पटियाला हाउस कोर्ट ने डेथ वारंट पर मुहर लगा दी कि ऐसे दरिंदों को समाज में बने रहने का अधिकार नहीं है।

निर्भया के कुल थे 6 गुनहगार
निर्भया के कुल छ गुनहगार थे जिसमें मुख्य अभियुक्त  राम सिंह मे शर्मनाक और हैवानियत से भरे कांड को अंजाम देने के कुछ महीने के बाद ही तिहाड़ जेल में फांसी लगा ली थी। शेष पांच आरोपियों के मामले अलग अलग स्तर की अदालतों में चला और पांच बचे आरोपियों में से एक को उसके नाबालिग होने का लाभ मिला और तीन साल तक सुधार गृह में रहने के बाद वो रिहा हो गया। इस तरह से चार आरोपियों पवन गुप्ता, विनय शर्मा, मुकेश सिंह और अक्षय सिंह का मामला एक अदालत की दहलीज से दूसरी अदालत की दहलीज तक पहुंचा। ये बात अलग है कि फैसले उनके खिलाफ थे। लेकिन कानूनी दांवपेंच का इस्तेमाल करते हुए वो मामले को लटकाने की कोशिश करते रहे है। 

दोषियों की अपील और दलील नहीं आई काम
इस मामले में ताजा अपील अक्षय सिंह की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कुतर्क से भरे जिरह पर फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया था कि अदालत की नजर में उसकी अपील में मेरिट नहीं है और एक तरह से साफ हो गया कि ये दोषी सिर्फ समय गिन रहे हैं। जिस दिन सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया उसी दिन पटियाला हाउस कोर्ट में निर्भया की मां की अपील पर भी सुनवाई हुई। लेकिन जजों ने कहा कि वो उनके दुख को समझते हैं। लेकिन दोषियों के भी कुछ अधिकार हैं जिन्हें समझना चाहिए और इस तरह के तारीख सात जनवरी की मुकर्रर कर दी थी। 

16 दिसंबर की वो काली रात
16 दिसंबर की रात निर्भया नाम की लड़की अपने दोस्त के साथ बस पर सवार होती है। उन दोनों के साथ बस में 6 और लोग होते हैं लेकिन वो यात्री नहीं थे। 6 दरिंदे बारी बारी से निर्भया के साथ दुष्कर्म करते हैं, बेरहमी से मारपीट करते हैं और महिपालपुर में सड़क पर फेंक देते हैं। उस वहशियना हरकतों की साक्षी वो रात बनती है, सड़कें बनती हैं। गंभीर हालात में निर्भया को सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया जाता है, वो जिंदगी के लिए जंग लड़ती है और दिल्ली के साथ साथ देश के अलग अलग हिस्सों में लोग सड़कों पर उतर जाते हैं। 

जब संसद भी रो पड़ी
दिल्ली की सड़कों पर आम लोग बिना किसी नेतृत्व के सड़कों पर उतरे और तत्कालीन सरकार हरकत में आई। बेहतर इलाज के लिए निर्भया को सिंगापुर के माउंट एलिजाबेथ अस्पताल ले जाया गया लेकिन 29 दिसंबर को वो जिंदगी की जंग हार गई। सरकार की तरफ से महिला सुरक्षा के लिए निर्भया फंड बनाया गया और आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन किया गया। इस बीच निर्भया गैंगरेप के मुख्य गुनहगार राम सिंह ने तिहाड़ जेल में खुदकुशी कर ली। आरोपियों  में से एक नाबालिग था जिसका केस जुवेनाइल कोर्ट में चला और उसे सुधार गृह भेजे जाने के तीन साल बाद रिहा कर दिया गया।

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