आजादी से नगालैंड का चल रहा है विवाद,जानें क्यों नहीं सुलझा, मोदी सरकार ने 2015 में किया था समझौता

Nagaland Violence: नगालैंड का विवाद आजादी के बाद से ही चला आ रहा है। साल 2015 में मोदी सरकार के समय भी एक समझौता हुआ था।

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नगालैंड   |  तस्वीर साभार: ANI
मुख्य बातें
  • एक दिसंबर 1963 को नगालैंड भारत का 16वां राज्य बन गया। 1964 यहां पहली बार चुनाव कराए गए।
  • सोमवार को संसद में गृहमंत्री अमितशाह ने बयान दिया कि नगालैंड में सेना की फायरिंग एक गलती थी।
  • फायरिंग में 14 नागरिकों की मौत हो गई है। जबकि एक सेना का जवान शहीद हो गया।

नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने सोमवार को संसद में स्वीकार किया कि नगालैंड में सेना की फायरिंग एक गलती थी। फायरिंग में 14 नागरिकों की मौत के बाद संसद में जवाब देते हुए गृहमंत्री अमित शाह बताया कि सेना ने नागरिकों को पहचानने में गलती की। इस घटना की जांच के लिए SIT बनाई जाएगी, जो एक महीने के अंदर रिपोर्ट सौंपेगी। इस बीच नागालैंड पुलिस ने भारतीय सेना  के 21 पैरा स्पेशल फोर्सेज के खिलाफ FIR दर्ज की है।

4 दिसंबर को क्या हुआ

गृह मंत्री ने बताया कि सेना को ओटिंग, मोन में चरमपंथियों की गतिविधि की सूचना मिली थी। इसी आधार पर 21 कमांडो ने संदिग्ध इलाके में घात लगाकर हमला किया। एक वाहन वहां पहुंचा, उसे रुकने का इशारा किया लेकिन उसने भागने की कोशिश की। वाहन में उग्रवादी होने के संदेह में वाहन पर हमला किया गया। वाहन में सवार 8 लोगों में से 6 की मौत हो गई। 

बाद में पता चला कि यह गलत पहचान का मामला है। घायल हुए 2 अन्य लोगों को सेना द्वारा निकटतम स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया। इसकी खबर मिलते ही स्थानीय ग्रामीणों ने आर्मी यूनिट को घेर लिया, 2 वाहनों में आग लगा दी और उन पर हमला कर दिया। जिसकी वजह से एक जवान शहीद हो गया और कई जवान घायल हो गए। सुरक्षा बलों को आत्मरक्षा के लिए और भीड़ को तितर-बितर करने के लिए फायरिंग का सहारा लेना पड़ा। इससे 7 और नागरिकों की मौत हो गई, कुछ अन्य घायल हो गए। स्थानीय प्रशासन-पुलिस ने स्थिति सामान्य करने की कोशिश की।

उन्होंने कहा कि घटना के बाद 5 दिसंबर की शाम लगभग 250 लोगों की उत्तेजित भीड़ ने मोन शहर में असम राइफल्स के कंपनी ऑपरेटिंग बेस (COB) में तोड़फोड़ की और उसमें आग लगा दी। भीड़ को तितर-बितर करने के लिए असम राइफल्स को गोलियां चलानी पड़ीं। इससे एक और नागरिक की मौत हुई।

2015 में मोदी सरकार ने किया था समझौता

 2014 में नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद नगा विवाद को शांत करने की तेज कर दी थी। और 2015 में केंद्र सरकार ने एनएससीएन के इसाक मुइवा गुट के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। वर्ष 2017 में भी नगा नेशनल पॉलिटिकल ग्रुप जैसे सात विद्रोही गुटों को शांति समझौते में शामिल कर लिया गया। हालांकि, अभी तक इस समझौते के बिंदुओं की जानकारी सामने नहीं आ पाई है। इस बीच एनएससीएन (आईएम) ने फ्रेमवर्क समझौते को लेकर हाल ही में एक बयान जारी किया था। जिसमें  कहा गया, 'छह साल बीतने के बाद भी भारत सरकार की ओर से अब तक कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली है। नागाओं के साथ ऐसा सलूक नहीं किया जा सकता।' उधर सरकार का कहना है कि इस विवाद को सुलझाने के लिए बातचीत जारी है। जल्द ही सकारात्मक नतीजे सामने आएंगे। 

क्या है विवाद

भारत की आजादी के तत्काल बाद अंग्रेजों के साथ हुए समझौते के तहत कई ऐसे राज्य थे, जो भारत में शामिल नहीं होना चाह रहे थे। उस समय मुस्लिम लीग की तरह नागा नेशनल काउंसिल  भारत में शामिल होने के लिए तैयार नहीं  थी। एनएनसी का गठन 1946 में नागा नेता अंगामी जापू फिजो ने किया था। वह नगालैंड को अलग देश का दर्जा दिलाने की मांग कर रहे थे। साथ ही उनका दावा था कि ब्रिटेन ने नगालैंड के कई इलाकों को असम में शामिल कर दिया । इसे भी वापस नगालैंड में शामिल करने की मांग वह कर रहे थे। तब  प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने नागा इलाके को असम का हिस्सा बताते हुए इनकी मांगों को खारिज कर दिया। 

1956 में उन्होंने भारत सरकार को चुनौती देते हुए नागा फेडरल गवर्नमेंट यानी एनएफजी का गठन कर लिया। ये लोग अंडरग्राउंड होकर भारत सरकार के समानांतर अपनी अलग सरकार चलाने लगे थे। अंगामी ने नागा फेडरल आर्मी का भी गठन किया था। इस आर्मी के जरिए आतंकी घटनाओं को अंजाम दिया जाने लगा।  बाद में  1960 में भारत सरकार और नागा पीपुल्स कन्वेंशन के नेताओं के बीच 16 बिंदुओं पर समझौता किया। इस समझौते के बाद एक दिसंबर 1963 को नगालैंड भारत का 16वां राज्य बन गया। 1964 यहां पहली बार चुनाव कराए गए, लेकिन जिन बिंदुओं पर सहमति बनी थी, उसी पर बाद में विवाद शुरू हो गया और आज भी ये विवाद जारी है। 

विवाद की मुख्य वजहें

विवाद की सबसे बड़ी वजह नागा लोगों का मांग है कि उनके दावे के क्षेत्र कि असम में शामिल नगालैंड के हिस्सों को वापस कराया जाए।  नागा नेताओं का कहना है कि ये जमीन उनकी जनजाति की है और उसे प्रधानमंत्री नेहरू वापस करने का वादा किया था। 

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