Global Health Diplomacy:रुपया बड़ा या मदद ? भारत और वैश्विक साझेदारों के तालमेल की कहानी

देश
प्रभाकर चतुर्वेदी
Updated Jan 12, 2022 | 19:55 IST

याद ये भी करना होगा कि जब भारत कोरोना के दूसरी लहर की गिरफ्त में था तो उन्ही फ़्रांस अमेरिका जर्मनी जैसे देशों ने ऑक्सीजन कॉन्सेंट्रेटर समेत कई  और भी उपयोगी उपकरण मुहैया कराये, हालांकि बाद में भारत ने मेडिसिन प्रोडक्शन में अपनी जरूरतें अपने से पूरी करने के लिए खुद आत्मनिर्भर भारत के तहत कई प्रयास किये सफलता भी पायी है।

CORONA
Corona: भारत और वैश्विक साझेदारों के तालमेल की कहानी (प्रतीकात्मक फोटो) 

अगर कोरोना ने कुछ हमें सिखाया है तो वो ये कि इस लड़ाई में विश्व के देशों का परस्पर एवं सक्रिय सहयोग बहुत ही जरुरी दशा है, इसीलिए ' ग्लोबल हेल्थ डिप्लोमैसी ' देशों के परस्पर संबंधों में और नये ढंग से जुड़ा है जाहिर है कि ऐसे वैश्विक खतरे से निपटने का एक ही उपाय है, ''वैश्विक साझेदारी'' इस क्रम में भारत ने अपनी  सनातनी परम्परा के अनुरूप 'विश्वबंधुत्व' (brotherhood) के सिद्धांत का पालन कर के विश्व को सन्देश जरूर दिया है कि समय रहते नहीं चेता गया तो दुनिया को तैयार रहना पड़ेगा।

फिर से ओमीक्रॉन जैसे नए वैरिएंट से सामना करने के लिए, जरुरत है कि आज विश्व समझे भारत के वैक्सीन इंटरननैशनलिज्म की महत्ता आपको याद है जब भारत ने वैक्सीन की कई खेपें न सिर्फ नेपाल बांग्लादेश श्रीलंका जैसे पड़ोसियों को भेजी बल्कि हमारे जहाज वैक्सीन लेकर अफ्रीका यूरोप और उत्तरी अमेरिका तक भी पहुंचे,आपको याद होगा ब्राजील के राष्ट्रपति का भगवान हनुमान की तस्वीर धन्यवाद भारत कहते हुए दूसरी तरफ भारत ने अमेरिका समेत तमाम यूरोपियन देशों जिनमे ब्रिटैन जर्मनी और फ़्रांस भी शामिल थे को भी हाईड्रोक्सीक्लोरोक्विन और रैमडेसिविर की कोरोना रोधी मेडिसिन पहुंचाई थीं।

आज दुनिया के तमाम ऐसे देशों को सहायता की आवश्यकता है मध्य और पश्चिम एशिया के देशों और विशेषकर अफ्रीका के संसाधनरहित देशों को ग्लोबल हेल्थ की बात हम 1948 के जमाने से विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संस्थानों जिनमे प्रमुख है, यूनाइटेड नेशन और विश्व स्वास्थ्य संगठन,के माध्यम से कर रहे है  पर अभी भी हम नाइजर, सिएरा लिओन, चाड, माली जैसे अनेक अफ़्रीकी देशों में पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएँ नहीं मुहैया करा पाए हैं। 

चीन की बात करनी जरुरी

भारत के प्रयासों के इतर ग्लोबल वैक्सीन डिप्लोमैसी के पीछे बहुत बड़ा सच ये भी है कि विभिन्न देशों में या तो वैक्सीन नेशनलिज्म की भावना बहुत प्रबल की गयी है या ये देश उन्ही देशों को सहायता दे रहे है जिनको या तो वे उन देशों को अपने बाजार के रूप में देख रहे हो या सुरक्षा साझेदार के रूप में, चीन की बात करनी जरुरी है। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने हालिया महीनो में अफ्रीकन यूनियन  के साथ एक समिट में अफ्रीका के देशों को 1 बिलियन वैक्सीन देने का वायदा किया जिनमे लगभग आधे तो वे चीन में बनी वैक्सीन देंगे पर तकरीबन आधी मात्रा का  उत्पादन अफ्रीका में ही करेंगे जो मुख्य तौर पर बाजार की बात ही है, चीन की महत्वकांक्षी बेल्ट रोड परियोजना  के लिए ये प्रयास जगजाहिर है तो जाहिर है ऐसे देशों द्वारा आपदा में अवसर ढूँढना मानवीय संकट के बीच एक शर्मनाक है।

"आज इन्ही यूरोपियन देशों में विश्व के सबसे ज्यादा डेली केसेस आ रहे है"

एशिया के इस महाशक्ति से इतर बात किया जाए अगर यूरोप के देशो की तो यहाँ भी नियत कोई बहुत अच्छी नहीं दिखती है मई  2021 में भारत और साऊथ अफ्रीका ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (WTO) में वैक्सीन उत्पादन बढ़ाने के लिए Trade-Related aspects of Intellectual Property Rights वेवर यानि छूट के लिए एक प्रस्ताव लाया जिसे 100 से ज्यादा देशों ने समर्थन दिया पर विकसित देशों ने सिरे से नकार दिया और आज इन्ही यूरोपियन देशों में विश्व के सबसे ज्यादा डेली केसेस आ रहे है ताजा आंकड़ों में जहाँ अमेरिका 10 लाख की रोजाना कोविड  केसेस के साथ सबसे आगे है वहीं फ्रांस दूसरे नंबर पर बना हुआ है इस क्रम में ब्रिटेन भी पीछे नहीं है और हालात बुरे ही बने हुए है।

अब भी इसका तांडव वैसे ही पूरी दुनिया में फैला हुआ है 

सवाल आज ये उठते हैं कि क्या सोच है वैक्सीन विश्व के अनेक देशों की क्यों वैक्सीन जैसे बेहद जरुरी चीज की टेक्नोलॉजी आईपीआर अन्य देशो को दिया जा रहा है क्या आज यूरोप में या अन्य कहीं ओमिक्रोन के केसेस से अपना स्वास्थ्य गंवाने वालों की कीमत वैक्सीन के बिजनेस से पूरी होगी? कहने का मतलब ये भी है कि ऐसे दोमुंहे रवैये से किसी एक देश का नहीं बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था  की रफ़्तार पर असर पर असर पड़ रहा है, भारत जैसे अनेक देशों का जनसांख्यिकीय लाभांश (DEMOGRAPHIC DIVIDEND) को सीधा घाटा हो रहा है और हमारी युवा पीढी आर्थिक लाभ का हिस्सा न होकर अनेक प्रकार के अनैतिक कार्यो में की तरफ जा रही है। वैक्सीन आने के बाद एक आस ये बनी थी कि कोविड अब शांत हो जाएगा पर अब भी इसका तांडव वैसे ही पूरी दुनिया में फैला हुआ है तो आज अमेरिका यूरोप के देशों को व्यापार छोड़ कर, ग्लोबल हेल्थ डिप्लोमैसी को भारत के वैक्सीन इंटरनैशनलिज्म के नजरिये से देखा जाना चाहिए।  

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