चुनावों से पहले नेताओं का किसी दूसरे दलों में जाना कितना सही? जनता को वोट करते समय ध्यान रखनी चाहिए ये बात?

देश
लव रघुवंशी
Updated Mar 07, 2021 | 15:54 IST

पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले टीएमसी के कई सीनियर नेता पार्टी छोड़ बीजेपी में शामिल हुए हैं। ऐसे में सवाल है कि क्या इससे TMC को फर्क पड़ेगा और BJP को चुनावों में फायदा होगा?

dinesh trivedi
चुनाव से पहले टीएमसी छोड़ बीजेपी में शामिल हुए दिनेश त्रिवेदी  |  तस्वीर साभार: ANI

नई दिल्ली: राजनीति बहुत अजीब चीज है। हम देखते हैं कि ऐसे कई नेता होते हैं जो सिर्फ और सिर्फ जनता, गरीबों, पिछड़ों और शोषितों की बात करते हैं वो हर समय अपने हितों को अपने वोटों को साधने में लगे रहते हैं। जनता और जरूरतमंद लोगों को बहुत ही कम ऐसे नेताओं से मदद मिल पाती है। कई नेताओं के लिए कहा जा सकता है कि जो सामने से जनता के लिए काम करने वाले दिखते हैं दरअसल, वो वैसे होते नहीं है। सिर्फ वोटों के लिए वो जनता के सामने अच्छे से पेश आते हैं। चुनावों के समय ऐसे कई नेता भी होते हैं जो दलों को बदलते हैं। जिस पार्टी से राजनीति शुरू करते हैं, लंबा समय बिताते हैं, उसके टिकट पर जीतते हैं और एक समय बाद उसे छोड़ देते हैं।

पश्चिम बंगाल में चुनाव होने हैं और उससे ये देखने में खूब आ रहा है कि सत्ताधारी दल तृणमूल कांग्रेस (TMC) के न सिर्फ कार्यकर्ता बल्कि विधायक से लेकर मंत्री तक और कई सीनियर नेता पार्टी छोड़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल हो रहे हैं। 

टीएमसी के नेताओं की बीजेपी में शामिल होने की जैसे बाढ़ सी आ गई है। ये हैरान करने वाला है कि आखिर चुनाव से पहले ऐसा क्या हुआ कि पार्टी के दिग्गज नेता बीजेपी में चले गए। बीजेपी कहती है कि टीएमसी डूबता जहाज है, इसलिए लोग वहां से भाग रहे हैं। वहीं टीएमसी और ममता बनर्जी ने भी कहा कि अच्छा है, जिसे जाना है वो चला जाए। पार्टी पर या उन पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा।

चुनाव से पहले ही आपत्ति क्यों?

लेकिन सवाल ये है कि आखिर चुनाव से पहले नेता क्यों दलों को छोड़ते हैं। क्या उन्हें उस पार्टी में भविष्य नहीं दिखता? क्या उन्हें लगता है कि ये पार्टी अब सत्ता में नहीं लौटेगी? क्या उन्हें लगता है कि अब इस पार्टी से वो नहीं जीत पाएंगे? या जिस पार्टी में जाते हैं उसमें वो ज्यादा अच्छा भविष्य देखते हैं? कई नेता अपना दल छोड़ते समय कहते हैं कि अब वहां घुटन महसूस होती है, अब वहां जनता की बात नहीं की जाती, अब वहां नेता कार्यकर्ताओं की या अपनी पार्टी के नेताओं की नहीं सुनता है।  

क्या BJP को फायदा पहुंचाएंगे TMC से आए नेता?

सवाल है कि क्या ये सब चीजें चुनाव से पहले ही होती हैं। क्यों नेता चुनाव के बाद या चुनावों से सालों पहले दलों को इन शिकायतों की वजह से नहीं छोड़ते? जब उन्हें कोई पद मिलता है तो किसी गलत बात पर उसे ठुकरा कर दल कितने नेता छोड़ते हैं। ऐसा अपवाद होता है। खैर सवाल है कि चुनावों से पहले नेताओं का किसी दूसरे दलों में जाना कितना सही? एक सवाल ये भी है कि क्या जनता को वोट करते समय इस बात को ध्यान में रखना चाहिए? क्या उन्हें ऐसे नेताओं को अपना वोट देना चाहिए जो चुनाव से पहले अपने हितों को देखते हुए दल बदल देते हैं? देखने में आता है कि चुनाव से पहले दल बदलने वाले नेताओं को कई बार जनता फिर से चुनती है तो कई बार नकार भी देती है। अब देखना है कि पश्चिम बंगाल में क्या होता है। ममता बनर्जी के कई करीबियों और सीनियर नेताओं ने चुनाव से पहले टीएमसी छोड़ी है। वो बीजेपी में गए हैं। क्या उन्हें और बीजेपी को फायदा होगा या टीएमसी पर इसका असर नहीं पड़ेगा?

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