महाराष्ट्र राजनीतिक संकट के बीच जानें कैसे बना दलबदल से संबंधित कानून

1967 में हरियाणा के एक विधायक ने एक ही दिन में तीन बार पार्टी बदली थी उसके बाद से यह महसूस किया गया कि विधायकों के पालाबादल पर रोक लगाने के लिए कानून बनना चाहिए

maharashtra, anti defection law, eknath shibde camp, shivsena, bjp
जानें- कैसे बना दलबदल से संबंधित कानून 
मुख्य बातें
  • एकनाथ शिंदे गुट का दावा, 39 से अधिक विधायक साथ में
  • डिप्टी स्पीकर ने 16 विधायकों को अयोग्यता का नोटिस दिया है
  • 16 विधायकों के अयोग्यता मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने 11 जुलाई तक लगाई है रोक

महाराष्ट्र में महाविकास अघाड़ी की सरकार कायम है। यह बात अलग है कि शिवसेना के ज्यादातर विधायक एकनाथ शिंदे कैंप के साथ गुवाहाटी में हैं। एकनाथ शिंदे कैंप जब मुंबई से सूरत पहुंचा तो तस्वीर साफ हो चली थी कि शिवसेना में जबरदस्त फूट पड़ चुकी है और आने वाला कल उद्धव ठाकरे के लिए मुश्किलों भरा साबित होने वाला है। उस परेशानी को डिप्टी स्पीकर ने समझा और एकनाथ शिंदे कैंप के 16 विधायकों को अयोग्य ठहराने का नोटिस थमा दिया। हालांकि शिंदे कैंप ने कहा कि जब बागी विधायकों की एक बड़ी संख्या को डिप्टी स्पीकर में भरोसा नहीं है तो वो अयोग्यता का नोटिस कैसे दे सकते हैं। मामला सुप्रीम कोर्ट में गया और 11 जुलाई तक बागियों को राहत मिल गई। इन सबके बीच एकनाथ शिंदे का कहना है कि वो फ्लोर टेस्ट के लिए गुरुवार को मुंबई जाएंगे। हालांकि महाविकास अघाड़ी कानूनी संभावनाओं को तलाश रहा है। लेकिन यहां पर हम 1967 के एक प्रसंग का जिक्र करेंगे जो आगे चलकर दलबदल कानून का आधार बना।

1967 का वो दिलचस्प प्रसंग
भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में आया राम गया राम  एक लोकप्रिय मुहावरा बन गया जब हरियाणा के एक विधायक गया लाल ने 1967 में एक ही दिन में तीन बार अपनी पार्टी बदली। उसके बाद विधायकों द्वारा दलबदल की वजह से कई सरकारों को समय से पहले जाना पड़ा। कई राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाया गया। इस तरह की प्रवृत्ति को रोकने के लिए संसद ने कानून बनाने पर विचार किया। 1985 में दलबदल के आधार पर अयोग्यता की अवधारणा को संस्थागत बनाने के लिए संविधान में संशोधन किया गया और दसवीं अनुसूची जोड़ी गई। इस अनुसूची को सामान्य तौर पर दलबदल विरोधी कानून के रूप में जाना जाता है। यह कानून लोकसभा और राज्य विधानसभाओं दोनों पर लागू होता है। इस कानून में व्यवस्था की गई कि एक विशेष राजनीतिक दल के उम्मीदवारों के रूप में चुने गए सदस्यों को अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा यदि वे स्वेच्छा से राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ देते हैं, या मतदान करते हैं, या पार्टी के किसी भी निर्देश (व्हिप) के विपरीत सदन में मतदान से दूर रहते हैं।

दल बदल कानून में किए गए संशोधन
2003 में संविधान के 91वें संशोधन ने एक राजनीतिक दल में विभाजन की अवधारणा को दूर कर दिया और दसवीं अनुसूची से लागू प्रावधान को हटा दिया। संशोधन के उद्देश्यों और कारणों के पीछे 1990 की चुनावी सुधार समिति (दिनेश गोस्वामी समिति), 1999 में भारत के विधि आयोग और 2002 में संविधान के कामकाज की समीक्षा करने के लिए राष्ट्रीय आयोग की सिफारिशों का हवाला दिया गया। दसवीं अनुसूची का पैराग्राफ 3 जो विभाजन के मामले में अयोग्यता से सुरक्षा प्रदान करता है। 2003 के संशोधन के परिणामस्वरूप विलय दल-बदल के नियम के खिलाफ एकमात्र अपवाद बन गया। दसवीं अनुसूची के पैराग्राफ 4(2) में कहा गया है कि केवल जब दो-तिहाई सदस्य किसी पार्टी के साथ विलय के लिए सहमत होते हैं, तो उन्हें अयोग्यता से छूट दी जाएगी। मूल पार्टी को किसी अन्य पार्टी के साथ विलय करना चाहिए, और उसके दो-तिहाई सदस्यों का समर्थन होना चाहिए।

क्या है उच्च न्यायलयों की व्याख्या
उच्च न्यायालयों के कुछ नवीनतम फैसलों ने अकेले संख्या पर भरोसा किया है कि अगर दो-तिहाई विधायक किसी अन्य राजनीतिक दल के साथ विलय करते हैं तो वे अयोग्यता से मुक्त हो जाएंगे। जुलाई 2019 में गोवा में कांग्रेस के 15 में से 10 विधायक भाजपा में शामिल हो गए जिससे 40 सदस्यीय सदन में सत्तारूढ़ दल की संख्या 27 हो गई। चूंकि उन्होंने विधायक दल की इकाई की ताकत का दो-तिहाई हिस्सा बनाया, बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ ने माना कि वे दलबदल विरोधी कानून को आकर्षित नहीं करेंगे। उच्च न्यायालय के फैसले के साथ-साथ अध्यक्ष द्वारा उन्हें अयोग्य घोषित न करने का निर्णय सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती के अधीन है।

तेलंगाना का मामला सामने आया
इसी तरह, तेलंगाना में, 2016 में, 158 कांग्रेस विधायकों में से 12 सत्तारूढ़ टीआरएस में शामिल हो गए, और अध्यक्ष ने इस आधार पर अलग हुए गुट के विलय को मंजूरी दे दी कि उनके पास विधायी ताकत का कम से कम दो-तिहाई हिस्सा है। ये फैसले शिंदे खेमे के काम आएंगे। अब सवाल यह है कि  क्या शिंदे कैंप का शिवसेना पर दावा ठोंक सकता है तो जवाब हां में है। विवाद, हालांकि, चुनाव आयोग (ईसी) के समक्ष सुलझाया जाएगा, जहां शिंदे और उनके समर्थकों को चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968 के तहत पार्टी और उसके प्रतीक पर दावा करना होगा और बहुमत के बारे में चुनाव आयोग को संतुष्ट करना होगा। .

क्या शिवसेना पर एकनाथ शिंदे के दावे में है दम
प्रतीक आदेश का अनुच्छेद 15 चुनाव आयोग को दोनों पक्षों को सुनने के बाद एक अलग समूह को मूल राजनीतिक दल के रूप में मान्यता देने का अधिकार देता है। इसमें कहा गया है कि चुनाव आयोग मामले के सभी उपलब्ध तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखेगा और किसी एक गुट को मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के रूप में घोषित करने से पहले वर्गों या समूहों और अन्य व्यक्तियों के ऐसे प्रतिनिधियों को सुनने की इच्छा के रूप में सुनवाई करेगा।

सादिक अली बनाम माननीय चुनाव आयोग और एक अन्य, 1972 में, सुप्रीम कोर्ट ने एक राजनीतिक दल को मान्यता देने में एक महत्वपूर्ण कारक के रूप में बहुमत पर चुनाव आयोग के विचारों की पुष्टि की। इसने माना कि बहुमत और संख्यात्मक शक्ति का परीक्षण एक बहुत ही मूल्यवान और प्रासंगिक परीक्षा है। "सरकार या संगठन की किसी अन्य प्रणाली में जो भी स्थिति हो, सरकार या राजनीतिक व्यवस्था की लोकतांत्रिक व्यवस्था में संख्याओं की प्रासंगिकता और महत्व होता है और उनकी दृष्टि खोना न तो संभव है और न ही अनुमेय है। वास्तव में, यह बहुमत का दृष्टिकोण है जो अंतिम विश्लेषण में लोकतांत्रिक व्यवस्था में निर्णायक साबित होता है, ”शीर्ष अदालत ने कहा।चुनाव आयोग ने 2017 में समाजवादी पार्टी के नेतृत्व से संबंधित एक विवाद का फैसला करते हुए कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक संस्था में जो राजनीतिक दल हैं, पार्टी के आंतरिक कामकाज में बहुमत की इच्छा प्रबल होनी चाहिए और यदि बहुमत दबा दिया जाएगा या उचित अभिव्यक्ति की अनुमति नहीं है, यह अल्पसंख्यकों के अत्याचार के समान होगा।"

Times Now Navbharat पर पढ़ें India News in Hindi, साथ ही ब्रेकिंग न्यूज और लाइव न्यूज अपडेट के लिए हमें गूगल न्यूज़ पर फॉलो करें ।

Times Now Navbharat
Times now
zoom Live
ET Now
ET Now Swadesh
Live TV
अगली खबर