खेती से ज्यादा मजदूरी से कमाई करने पर मजबूर किसान, हर महीने केवल 10 हजार रुपये इनकम

देश
प्रशांत श्रीवास्तव
Updated Sep 13, 2021 | 14:56 IST

NSS Report: National Sample Survey की रिपोर्ट के जो आंकड़े सामने आए हैं, उससे यही लगता है कि किसान की खेती में दिलचस्पी घटती जा रही है।

Farmers Income
कमाई गिरने से मजदूरी करने को मजबूर किसान  |  तस्वीर साभार: ANI

मुख्य बातें

  • किसानों की कुल कमाई में मजदूरी से होने वाली कमाई की हिस्सेदारी 10 फीसदी से बढ़कर 40 फीसदी हो गई है।
  • फसलों से होने वाली कमाई की हिस्सेदारी 50 फीसदी से घटकर 38 फीसदी रह गई है।
  • मोदी सरकार ने 2022-23 तक किसानों की इनकम डबल करने का लक्ष्य रखा है।

नई दिल्ली:  मोदी सरकार, जब साल 2014 में जब सत्ता में आई थे, तो उसका यह वादा था कि वह किसानों की इनकम दोगुना करेगी। और इसके लिए 2022-23 का लक्ष्य रखा गया है। लेकिन नेशनल सैंपल सर्वे की Situation Assessment of Agricultural Households and Land and Livestock Holdings of Households in Rural India 2019 रिपोर्ट के जो आंकड़े सामने आए हैं, उससे यही लगता है कि किसान की खेती में दिलचस्पी घटती जा रही है। सर्वेक्षण के अनुसार किसान की कमाई का एक बड़ा जरिया मजदूरी बन गई है। उसे करीब 40 फीसदी कमाई मजदूरी से हो रही है। 

खेती छोड़ मजदूरी कर रहे हैं किसान ?
 

सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार कृषि वर्ष  जुलाई 2018 -जून 2019  के दौरान किसान औसतन हर महीने 10,218 रुपये कमाता है। जिसमें से 4023 रुपये वह मजदूरी (Wages)से कमा रहा है। जबकि फसलों से होनी वाली कमाई 3798 रुपये हैं। वहीं अगर 2012 से तुलना की जाए तो वह औसतन हर महीने 6021.45 रुपये कमा रहा था । उसमें से मजदूरी से होने वाली कमाई केवल 621.69 रुपये थी। साफ है कि 7 साल में किसानों की मजदूरी पर निर्भरता बढ़ गई है। इस दौरान उसकी कुल कमाई में मजदूरी से होने वाली कमाई की हिस्सेदारी 10 फीसदी से बढ़कर 40 फीसदी हो गई है। मजदूरी से होने वाली कमाई की हिस्सेदारी बढ़ने पर कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल से कहते हैं "देखिए इसका सीधा मतलब है किसान अब धीरे-धीरे मजदूर बनते जा रहे हैं। और कृषि संकट  गहराता जा रहा है। यही नहीं अगर फसल के उत्पादन से होने वाली कमाई को देखा जाय तो रियल टर्म के आधार पर तो किसानों की इनकम 11.7 फीसदी कम हो गई है। देखिए यह सब इसलिए हो रहा है क्योंकि किसानों की इनकम जानबूझ कर कम रखी जाती है। जिससे कि लोग खेती को छोड़कर गांव से निकले और शहरों में पलायन करें। क्योंकि शहरों में सस्ते श्रम की जरूरत है।"

फसल से होने वाली कमाई घटी

कमाई की जरिया मासिक कमाई (रुपये में)
मजदूरी 4063
जमीन लीज पर देकर 134
फसल के जरिए नेट कमाई 3798
पशुपालन  1582
गैैर कृषि बिजनेस 641
कुल कमाई 10218

2012 के जुलाई-दिसंबर सीजन के दौरान किसान अपनी कुल मासिक कमाई में से 50 फीसदी कमाई फसलों से करता था।  2012 के दौरान उसकी कुल मासिक कमाई 6021.45 रुपये थी।  लेकिन 2019 में फसलों से होने वाली कमाई 38 फीसदी रह गई है। वह 2019 में 10218 रुपये में से मात्र 3798 रुपये फसलों से कमा रहा है। जबकि इस दौरान धान की एमएसपी (2012-13) से बढ़कर 2021-22 में 1940 रुपये, गेंहू की एमएमसपी 1350 रुपये से 2015  रुपये (2022-23  के लिए घोषित ) , अरहर की एमएमसपी 3850 रुपये से 6300 रुपये, चने की 3000 रुपये से बढ़कर 5100 रुपये (2021-22) तक पहुंच गई है। 

साफ है कि एमएसपी (MSP) बढ़ने के बावजूद किसानों की फसलों से कमाई घटी है। ऐसा क्यों हो रहा है इस पर कृषि कानून विशेषज्ञ विजय सरदाना टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल से कहते हैं " देखिए सवाल यह है कि किसान गरीब क्यों  है ? किसान जिस एपीएमसी(APMC) सिस्टम को बचाने की बात कर रहे हैं, उससे क्या उनका भला होगा ?  मंडियों ने किसानों को बर्बाद कर दिया है। मेरा मानना है कि कृषि क्षेत्र में सुधार की जरूरत है।  नए कृषि कानून इन्हीं सुधारों की बात कर रहे हैं।"

हालांकि देविंदर शर्मा दूसरी तस्वीर पेश करते हुए कहते हैं "मुझे दुनिया में किसी एक देश का उदाहरण दे दीजिए, जहां पर मुक्त व्यापार आने के बाद किसानों की इनकम बढ़ी है।  विकसित देशों का उदाहरण देखिए, सभी देशों में किसानों की इनकम गिरी है और वह खेती छोड़ रहे हैं। अमेरिका, कनाडा, यू.के. फ्रांस में तो किसानों के लड़कों की शादियां नहीं हो रही है। देखिए अगर किसानों की स्थिति सुधारनी है, तो 3 नए तरह के कानून की जरूरत है। 

पहला तो यह है कि एमएसपी (MSP) को कानूनी अधिकार बनाया जाना चाहिए। अभी 7000 मंडियां हैं, उसके नेटवर्क को बढ़ाकर 42 हजार (हर 5 किलोमीटर पर किसान के पास मंडी की पहुंच) करनी चाहिए। इसके तहत नियम और रेग्युलेशन को एक समान कर निजी क्षेत्रों को भी शामिल करना चाहिए । तीसरा अहम काम है कि को-ऑपरेटिव सेक्टर को मजबूत किया जाय। जिस तरह अमूल ने सफलता की मिसाल पेश की है, उसी तरह हमें फलों, सब्जियों, दालों आदि फसलों के लिए को-ऑपरेटिव सेक्टर का मॉडल लागू करना चाहिए। कोऑपरेटिव मॉडल में हमेशा किसान को उत्पाद की बेहतर कीमत मिलती है। इसे मुक्त बाजार के मॉडल से समझा जा सकता है। अमेरिका में जब किसी कृषि उपज को उपभोक्ता खरीदता है, तो किसान को कीमत का  सिर्फ 8 फीसदी हिस्सा मिलता है। जबकि भारत में कोऑपरेटिव मॉडल में किसान को 70 फीसदी तक हिस्सा मिलता है। हमें इस मॉडल की जरूरत है।"

गतिरोध खत्म होना जरूरी

नए कृषि कानूनों के बाद पैदा हुए गतिरोध के देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2021 में एक कमेटी बनाई थी। जिसका काम ऐसा ऐसे  रास्ते का सुझाव देना था, जो इस गतिरोध को खत्म करने में सहयोग कर सके। सुप्रीम कमेटी के सदस्य और शेतकारी संगठन के अध्यक्ष अनिल जयसिंग घनवट टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल से कहते हैं "कमेटी ने मार्च 2021 में रिपोर्ट सौंपी दी है, अब उसे सार्वजनिक होना चाहिए। क्योंकि  रिपोर्ट को जितनी जल्द सार्वजनिक किया जाएगा और उस पर चर्चा होगी, उतनी जल्द किसान आंदोलन और दूसरी समस्याओं के समाधान का रास्ता निकलेगा।" जाहिर है कि किसानों की इनकम एक बड़ी समस्या बनी हुई है। ऐसे में यह बेहद जरूरी है कि सरकार-किसानों के बीच चल रहे मौजूदा गतिरोध को खत्म कर आगे का रोडमैप तैयार किया जाय।।

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