EXCLUSIVE: खास बातचीत में बोले दिनेश त्रिवेदी, मां, माटी और मानुष के आदर्श से भटक चुकी है टीएमसी

  • Authored by: टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल
  • Updated Mar 13, 2021, 07:00 PM IST

दिनेश त्रिवेदी अब टीएमसी छोड़कर बीजेपी में आ चुके हैं। टीएमसी में रहते हुए उन्होंने जो कुछ अनुभव किया और विधानसभा चुनाव 2021 क्यों पहले से अलग है उस विषय पर खास चर्चा की।

EXCLUSIVE: खास बातचीत में बोले दिनेश त्रिवेदी, मां, माटी और मानुष के आदर्श से भटक चुकी है टीएमसी

नई दिल्ली।  दिनेश त्रिवेदी ने जब राज्यसभा से इस्तीफा दिया था तो उसी वक्त से कयास लग रहे थे कि वो बीजेपी का हिस्सा होंगे। सभी तरह के कयासों पर लगाम लगाते हुए बीजेपी का हिस्सा भी बन गए। उन्होंने बताया कि आखिर वो कौन सी वजह थी कि उन्हें टीएमसी में बने रहना नागवार लगने लगा। इन्हीं सब विषयों पर TIMES NOW की सीनियर एडिटर मेघा प्रसाद से उन्होंने खास बातचीत की। 

चंदा लेने वाली पार्टी करोड़ों का खर्च पीआर पर कर रही
कहीं न कहीं अगर आप टीएमसी के मूल को देखें तो पार्टी  'मा, माटी, मानुष' के उद्देश्य पूरी तरह से खो गए हैं ... लोग इस तरह के आख्यान से नाराज हैं, यह बंगाल की संस्कृति नहीं है। जब टीएमसी का गठन हुआ था, तब हम 5000 रुपये, 7000 रुपये, 10000 रुपये इत्यादि के लिए संघर्ष करते थे, अब, यदि टीएमसी सैकड़ों सलाहकारों को करोड़ों का भुगतान कर रही है, तो यह किसका पैसा है ?:


ममता बनर्जी ने पहले कुछ और बाद में कुछ कहा
शुरू में, ममता बनर्जी ने बताया कि 5 लोगों ने आकर उन्हें कार के दरवाजे से अपना पैर कुचलते हुए कार में धकेल दिया। अस्पताल के बिस्तर से ममता जी के दूसरे संस्करण में, उन्होंने ऐसी किसी भी चीज का जिक्र नहीं किया।यदि आप बंगाल के किसी भी हिस्से की सड़कों पर लोगों से पूछते हैं, तो वे आपको बताएंगे कि यह वही नेता (ममता बनर्जी) नहीं हैं, जिनका इस्तेमाल किया गया था।दिन के अंत में, हम किसी व्यक्ति या परिवार के लिए काम नहीं करते हैं। यह एक परिवार के लिए काम कर रहा है - जैसे गुरु और (लगभग पसंद) दास

अल्पसंख्यक समाज की सोच में बड़ा बदलाव
अब समय आ गया है कि अल्पसंख्यक समुदाय को भी एहसास हो कि वे मुख्यधारा में आने से बेहतर हैं। मुसलमानों ने मुझे बंगाल से यह कहते हुए बुलाया है कि इस बार वे भाजपा को वोट देंगे। दिनेश त्रिवेदी कहते हैं कि पहले क्या होता था कि राजनीतिक दल किसी मस्जिद के इमाम से अपने पक्ष में फतवा जारी कराते थे और अल्पसंख्यक उसका अनुसरण करता था। लेकिन अब आश्चर्य की बात यह है कि अल्पसंख्यक समाज जाग गया है और मेन स्ट्रीम में जुड़ रहा है। निश्चित तौर पर इस तरह के बदलाव का श्रेय पीएम नरेंद्र मोदी को तो जाता ही है।

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