US Iran Ceasefire: यह बात आप सबको पता है कि युद्ध रोकने के लिए अमेरिका और ईरान के बीच एक सीजफायर हुआ है। इस सीजफायर की अवधि लंबी नहीं है, दो सप्ताह की है और सीजफायर के ब्योरों एवं शर्तों पर आगे की बातचीत पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में होने जा रही है। हालांकि, इस बातचीत पर भी सस्पेंस बना हुआ है। ऐसा इसलिए क्योंकि ईरानी मीडिया में यह कहा गया है कि उसका कोई शिष्टमंडल इस्लामाबाद नहीं पहुंचा है और जिस तरह से सीजफायर का उल्लंघन हुआ, उसे देखते हुए इस बातचीत का कोई मतलब नहीं रह जाता। हाालंकि, अमेरिकी शिष्टमंडल के साथ बातचीत नहीं होगी ऐसा ईरान की तरफ से नहीं कहा गया है लेकिन एक हां और ना दोनों है। इस बीच, पाकिस्तान में बातचीत को लेकर तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा चुका है। इस्लामाबाद में सुरक्षा हाई अलर्ट पर है और जिस जगह या कहिए होटल में सीजफायर पर बातचीत होनी है, वहां सुरक्षा-व्यवस्था काफी चाक-चौबंद है।
बातचीत भी और हमले की तैयारी भी
सीजफायर की घोषणा होने के बाद जिस तरह की बयानबाजी सामने आई है और लेबनान पर हमला हुआ है, उससे सीजफायर के भविष्य पर सवाल उठने लगे हैं। ट्रंप बातचीत की तैयारी के साथ ईरान पर हमले की धमकी भी दे रहे हैं। अपने सोशल मीडिया अकाउंट ट्रुथ सोशल पर उन्होंने ईरान को धमकी देते हुए कहा है कि अगर डील नहीं हुई तो ईरान पर भीषण हमला होगा। अमेरिका सेनाएं नए हथियारों के साथ लॉक्ड एवं कॉक्ड हैं। तो वहीं, ईरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर अपने नियंत्रण एवं दूसरी शर्तों को मानने के लिए पूरा जोर लगाए हुए है। सीजफायर के लिए ईरान ने अमेरिका के सामने जो 10 शर्तें रखी हैं, उनमें से हो सकता है कि कुछ पर सहमति बन जाए लेकिन अगर ईरान सभी शर्तों को मनवाने पर अड़ा रहा तो सीजफायर के आगे बढ़ने पर संदेह है और इससे होर्मुज संकट भी जस का तस रहेगा।
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मध्य पूर्व के अपने बेस नहीं छोड़ेगा अमेरिका
इन 10 शर्तों में एक शर्त ऐसी है जिस पर अमेरिका कभी राजी नहीं होगा। वह शर्त यह है कि मध्य पूर्व में अमेरिका के जितने भी सैन्य बेस हैं, वहां से वह निकल जाए। यानी मध्य पूर्व में सैन्य रूप में अमेरिका का कोई फुट प्रिंट्स ईरान देखना नहीं चाहता। सवाल है कि क्या अमेरिका ऐसा करेगा तो जवाब होगा बिल्कुल नहीं। अमेरिका कभी भी मध्य पूर्व से नहीं निकलेगा। बाकी शर्तों में ईरान पर हमला न करने, नुकसान की भरपाई करने, अपने ऊपर से प्रतिबंध हटाए जाने, यूरेनियम संवर्धन जारी रखने सहित अन्य शर्तें शामिल हैं। इन शर्तों में से कुछ को अमेरिका यदि मान भी लेता है तो इस बात की संभावना बहुत कम है कि इजराइल भी इसके लिए तैयार होगा। ईरान से असली खतरा इजराइल को है न कि अमेरिका को। ईरान का मिसाइल, बैलिस्टिक प्रोग्राम और यूरेनियम संवर्धन जारी रखना ऐसी शर्तें हैं कि इजराइल इसे स्वीकार्य नहीं करेगा। तीन चार मुद्दों पर पेच फंस सकता है। कई एक्सपर्ट्स मानते हैं कि इस्लामाबाद वार्ता से भी कुछ नहीं निकलेगा।
सीजफायर में एक नहीं कई अड़चनें हैं
अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच स्थायी सीजफायर में एक नहीं कई अड़चनें हैं और इनमें से सबसे बड़ी वजह भरोसे की कमी और अविश्वास है। अमेरिका और इजराइल दोनों ईरान पर भरोसा नहीं करते और ईरान इन दोनों मुल्कों पर। ईरान यह पहले देख चुका है कि बातचीत का झांसा देकर पहले भी उस पर दो बार उस पर हमला किया जा चुका है। तो अमेरिका और इजराइल को लगता है कि ईरान अ-सैन्य परमाणु कार्यक्रम के नाम पर अपना न्यूक्लियर हथियार तैयार कर रहा है। दूसरा, इस सीजफायर वार्ता में न तो इजराइल शामिल है और न मध्य पूर्व का कोई देश। इरान ने इजराइल के अलावा सऊदी अरब, कतर, यूएई, बहरीन सहित खाड़ी के कई देशों पर हमले किए हैं। ये देश इस युद्ध में हिस्सेदार हैं लेकिन उन्हें इस महत्वपूर्ण बातचीत का हिस्सा नहीं बनाया गया है। सीजफायर के लिए ईरान की 10 शर्तों में खाड़ी देशों का कोई जिक्र नहीं है। बिना इनकी राय और रजामंदी के कोई स्थायी सीजफायर मुमकिन नहीं है।
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इस युद्ध के धार्मिक, आर्थिक, भू-राजनीतिक पहलू हैं
ईरान की एक शर्त यह भी है कि उसके जितने एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस यानी हमास, हिज्बुल्ला और हूती हैं उन पर भी हमला नहीं होना चाहिए। यह ऐसी शर्त है जिसकी गारंटी इजराइल नहीं दे सकता। जिस दिन सीजफायर की घोषणा हुई उसके करीब चार घंटे बाद ही इजराइल ने हिज्बुल्ला को निशाना बनाते हुए बेरूत में भीषण हवाई हमले किए। रिपोर्टों की मानें तो यह बहुत ही भीषण हमला था। करीब 10 मिनट में 100 हमलों की बात कही जा रही है। इन हमलों में करीब 300 लोगों के मारे जाने की बात कही गई है। जवाब में हिज्बुल्ला ने भी तेल अवीव पर रॉकेट से कई हमले किए। खाड़ी के अन्य इलाकों में भी हमले होने की खबर है। यानी बड़े परिप्रेक्ष्य में देखें तो हमले पूरी तरह से रुक नहीं हैं। हिज्बुल्ला और इजराइल में तो भीषण जंग जारी है। ऐसे में स्थायी सीजफायर की तरफ कैसे बढ़ा जा सकता है। बात यह है कि यह युद्ध केवल दो या तीन मुल्कों का मसला नहीं है। इस युद्ध के धार्मिक, आर्थिक, भू-राजनीतिक पहलू हैं और किसी स्थायी समाधान पहुंचने के लिए इन सभी मुद्दों को सुलझाया जाना जरूरी है।
