US Iran Ceasefire: अपनी करतूतों की वजह से वैश्विक मोर्चे पर अलग-थलग और गुमनामी में रहने वाला पाकिस्तान इन दिनों काफी चहक रहा है। उसे लग रहा है कि ईरान युद्ध पर सीजफायर में अपनी भूमिका के लिए दुनिया भर में वह सराहा जाएगा। अमेरिका के वह ज्यादा करीब आएगा और क्षेत्रीय जियोपॉलिटिक्स में उसका कद बढ़ जाएगा। राजधानी इस्लामाबाद में सीजफायर पर वार्ता आयोजित कर वह इतरा रहा है लेकिन उसे नहीं मालूम 'खुशी' का उसका गुब्बारा जल्द फूटने वाला है। 'चार दिनों की चांदनी फिर अंधेरी रात' वाली कहावत उस पर जल्द चरितार्थ होगी। इसकी एक नहीं कई वजहें हैं।
दुनिया के सबसे बड़े गैस फील्ड को बनाया निशाना
पाकिस्तान की आर्थिक हालत कैसी है सभी को पता है। बीते वर्षों में वह कई बार दीवालिया होने की कगार तक पहुंचा है। अपने खर्चों को पूरा करने के लिए वह कभी चीन, कभी वैश्विक वित्तीय संस्थाओं और कभी खाड़ी देशों के आगे गिड़गिड़ाता रहा है। समय-समय पर अमेरिका से भी उसे वित्तीय मदद मिल जाती रही है। खाड़ी देशों से भी वह पैसे और कर्ज लेता आया है। इस युद्ध में ईरान ने खाड़ी के देशों कतर, बहरीन, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) पर अपने ड्रोन एवं मिसाइलों से हमले किए। इन हमलों में इन देशों के तेल एवं गैस संयंत्रों को भारी नुकसान पहुंचा है। उनके नागरिक मारे गए हैं। ईरान ने इन देशों बड़े पैमाने पर आर्थिक नुकसान किया है। कतर के पास दुनिया का सबसे बड़ा गैस फील्ड है। ईरान के मिसाइल हमले में उसके रास लाफान गैस फील्ड को भारी क्षति पहुंची है। कतर का कहना है कि उसके इस संयंत्र के पूरी तरह से ठीक होने में करीब पांच साल लगेंगे।
सऊदी की रिफाइनरी पर ईरान का हमला
इसी तरह सऊदी अरब की सबसे बड़ी तेल रिफाइनरी रास तनुरा पर ईरान ने हमला किया। हमले में इस संयंत्र को भी काफी नुकसान हुआ। तो वहीं, इजराइल के बाद ईरान से सबसे ज्यादा मिसाइल एवं ड्रोन यूएई पर बरसाए। इन हमलों से यूएई की अर्थव्यवस्था को भारी चोट पहुंची है। कहने का मतलब है कि खाड़ी के इन सभी देशों पर ईरान ने कहर बरपाया है। अब तक ये देश रहने और निवेश के लिए बेहद सुरक्षित माने जाते थे। यूएई तो पर्यटन का एक बड़ा केंद्र बनकर उभरा था लेकिन हमलों के बाद इनकी छवि को गहरा धक्का लगा है। अब ये देश भी सुरक्षित नहीं माने जा रहे। युद्ध से पहले की स्थिति में आने में इन्हें काफी समय लग सकता है।
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यूएस-ईरान का 'कूरियर ब्वॉय' बना PAK
फिलहाल, अमेरिका और ईरान के बीच दो सप्ताह के लिए सीजफायर पर सहमति बन जाने के बाद इन देशों को फौरी राहत मिली है। हालांकि, रिपोर्टों की मानें तो ये देश चाहते थे कि ईरान पर अमेरिका हमले रुके नहीं, वे जारी रहें। सऊदी अरब तो हमले तेज करने के लिए यूएस से कह चुका था। यूएई भी चुप नहीं बैठा था, वह जंग में उतरने की तैयारी कर रहा था कि इसी बीच, यूएस के सीजफायर का मामला पाकिस्तान लेकर आ गया। उसने 'कूरियर ब्वॉय' के रूप में अमेरिका की 'बातों एवं शर्तों' को ईरान तक और ईरान के रुख को यूएस तक पहुंचाया। बात किसी तरह सीजफायर तक पहुंच गई। अब इस सीजफायर में पाकिस्तान अपनी 'जीत' देख रहा है जबकि खाड़ी के देश अपनी 'हार'। इसके पीछे 'बिचौलिए' की भूमिका निभाने वाला पाकिस्तान है। ईरान के सताए खाड़ी के देश चाहते थे कि यूएस से उसे और मार पड़े। उनकी मंशा थी कि ईरान इस कदर टूटा जाए कि वह दोबारा उनके लिए खतरा न बन पाए लेकिन तेहरान को घायल करके छोड़ दिया गया है। ऐसे में उसके पहले से कही ज्यादा 'खतरनाक' होकर उभरने की आशंका है।
समय पर पाकिस्तान का 'हिसाब' करेंगे खाड़ी देश
जहां तक बात पाकिस्तान की है तो सीजफायर की उसकी कवायद ने सऊदी अरब, यूएई, कतर की मंशा पूरी नहीं होने दी। वह एक तरह से रोड़ा बनकर सामने आ गया। पाकिस्तान से सबसे ज्यादा निराशा सऊदी अरब और यूएई को हुई है। बीते सितंबर में तो सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच एक रक्षा डील हुई है। इस डिफेंस डील को NATO जैसा बताया गया। यानी कि एक देश पर हमला दूसरे देश पर हमला माना जाएगा। ईरान ने तो सऊदी अरब पर हमला कर दिया। इस डील के मुताबिक पाकिस्तान को सऊदी अरब के साथ खड़ा होना चाहिए था लेकिन साथ आने तो छोड़िए वह पूछने तक नहीं गया कि 'भाईजान' को किसी चीज की जरूरत पड़ सकती है।
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यूएई ने पाकिस्तान को करीब 3.5 अरब डॉलर की वित्तीय मदद और कर्ज दिया है। अब उसने इस रकम को वापस करने के लिए कहा है। यह ऐसे नहीं है। पाकिस्तान के रवैये को देखकर यूएई ने अपने पैसे मांगे हैं। यही नहीं लाखों की संख्या में पाकिस्तानी ईरान में नहीं बल्कि सऊदी अरब और यूएई में रहते हैं। खाड़ी के देशों को पाकिस्तान को जब ज्यादा जरूरत थी तो वह 'महान डिप्लोमैट' बनने का प्रपंच रच रहा था। शेख इसे भूलेंगे नहीं, समय आने पर पाकिस्तान के साथ अपना 'हिसाब' बराबर करेंगे।
