भारतीय सेना में गोरखा सैनिकों की बहाली का इतिहास 200 साल से भी अधिक पुराना है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से नेपाल से भारतीय सेना में गोरखा युवाओं की भर्ती पूरी तरह ठप पड़ी हुई है। अब नेपाल के भीतर ही पूर्व गोरखा सैनिकों और युवाओं ने अपनी ही सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। हाल ही में नेपाल के पोखरा शहर में पूर्व गोरखा सैनिकों के संगठन 'इंडियन पूर्व सैनिक गोरखा ब्रिगेड' ने बड़ा विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों की मांग है कि नेपाल सरकार भारतीय सेना की 'अग्निपथ योजना' के तहत नेपाली युवाओं को भर्ती होने की अनुमति तुरंत दे। क्या है पूरा मामला, अग्निपथ योजना में भर्ती की मांग क्यों हो रहा है, और नेपाली सरकार का रुख क्या है? विस्तार से इसे समझते हैं।
नेपाली गोरखा युवा क्यों कर रहे अग्निपथ योजना की मांग?
नेपाल के युवाओं और पूर्व सैनिकों का तर्क है कि भारत की अग्निपथ योजना 4 साल की अल्पकालिक सेवा भले ही हो, लेकिन यह खाड़ी देशों में मिलने वाली मजदूरी से सैकड़ों गुना बेहतर है। पूर्व गोरखा सैनिकों के अनुसार, अग्निपथ योजना के तहत 4 साल की सेवा के दौरान एक अग्निवीर लगभग 45 से 50 लाख नेपाली रुपये कमा लेता है, साथ ही अन्य सुविधाएं भी मिलती हैं। नेपाल के लाखों युवा रोजगार की तलाश में सऊदी अरब, कतर और यूएई जैसे खाड़ी देशों में जाते हैं, जहां 50 डिग्री सेल्सियस तापमान में उन्हें न्यूनतम वेतन पर सख्त काम करना पड़ता है। पूर्व सैनिकों का कहना है कि भारतीय सेना में सम्मानजनक सेवा खाड़ी देशों के लेबर जॉब्स से कहीं बेहतर विकल्प है। 1815 की सुगौली संधि और 1947 के त्रिपक्षीय समझौते के तहत गोरखा युवाओं का भारतीय सेना में शामिल होना केवल रोजगार नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही एक परंपरा और गर्व का विषय रहा है। भर्ती रुकने से इस ऐतिहासिक परंपरा पर खतरा मंडरा रहा है।
क्या है पूरा विवाद?
भारतीय सेना में नेपाली गोरखाओं की भर्ती प्रक्रिया 2020 में कोविड-19 महामारी के कारण स्थगित हुई थी। इसके बाद जून 2022 में भारत सरकार ने थल सेना, नौसेना और वायुसेना में भर्ती के लिए पुरानी प्रक्रिया को खत्म कर 'अग्निपथ योजना' शुरू कर दी। 1947 में भारत, ब्रिटेन और नेपाल के बीच एक संधि हुई थी। इसके तहत यह तय हुआ था कि भारतीय और ब्रिटिश सेना में सेवा देने वाले नेपाली सैनिकों को उनके अपने नागरिकों (भारतीय/ब्रिटिश) के समान ही सुविधाएं, वेतन और पेंशन मिलेगी। अग्निपथ योजना के तहत केवल 25% अग्निवीरों को ही स्थायी सेवा (पेंशन वाली) में बरकरार रखा जाता है, जबकि 75% को 4 साल बाद एकमुश्त राशि देकर कार्यमुक्त कर दिया जाता है।
नेपाल में अग्निपथ योजना को लेकर प्रदर्शन
क्या है नेपाल सरकार का तर्क?
नेपाल सरकार का मानना है कि 4 साल की यह संविदात्मक सेवा और पेंशन का न मिलना 1947 के त्रिपक्षीय समझौते की मूल भावना के खिलाफ है। इसी आधार पर नेपाल सरकार ने अपने नागरिकों को अग्निपथ के तहत भारतीय सेना में शामिल होने की अनुमति रोक दी थी। नेपाल की राजनीति में भारतीय सेना में गोरखा भर्ती हमेशा से एक संवेदनशील विषय रही है। जब भारत ने 2022 में अग्निपथ के तहत भर्ती रैलियां आयोजित करने का प्रस्ताव रखा, तब तत्कालीन काठमांडू सरकार ने भारत से आग्रह किया कि जब तक नेपाल की सभी राजनीतिक पार्टियां इस नई योजना की समीक्षा कर किसी आम सहमति पर नहीं पहुंच जातीं, तब तक इस भर्ती को टाल दिया जाए। नेपाल के कुछ वामपंथी और राष्ट्रवादी धड़ों का तर्क है कि 4 साल की सैन्य ट्रेनिंग लेकर वापस लौटने वाले युवाओं का इस्तेमाल गलत गतिविधियों में हो सकता है या वे बेरोजगार रह जाएंगे। इसके अलावा, नेपाल में चीन के बढ़ते प्रभाव के कारण भी इस मुद्दे पर कूटनीतिक हिचकिचाहट देखी गई है।
भारत सरकार और भारतीय सेना का रुख?
भारत सरकार और रक्षा विशेषज्ञों ने इस मुद्दे पर अपना रुख स्पष्ट रखा है। भारतीय रक्षा नेतृत्व (पूर्व सीडीएस जनरल अनिल चौहान सहित) ने स्पष्ट किया है कि भारत की सैन्य भर्ती प्रणाली अब पूरी तरह से अग्निपथ पर आधारित है। भारतीय नागरिकों और नेपाली नागरिकों के लिए अलग-अलग भर्ती नियम नहीं बनाए जा सकते। भारतीय रक्षा अधिकारियों का कहना है कि भारत ने अपनी ओर से संविदात्मक शर्तों का पूरा सम्मान किया है और अब यह फैसला काठमांडू को करना है कि वह अपने युवाओं को अग्निपथ योजना के तहत भारतीय सेना में भेजना चाहती है या नहीं।
भर्ती रुकने के क्या हैं मायने?
नेपाल में मौजूदा भारतीय सेना के 1,20,000 से अधिक पूर्व सैनिक रहते हैं। ये पूर्व सैनिक नेपाल में भारत के अनौपचारिक ब्रांड एंबेसडर की तरह काम करते हैं और नेपाल के सामाजिक-राजनीतिक जीवन में भारत का समर्थन करते हैं। भर्ती रुकने से दोनों देशों के बीच यह 200 साल पुराना भावनात्मक और ऐतिहासिक धागे पर असर पड़ रहा है। भारतीय सेना द्वारा नेपाली गोरखाओं को दी जाने वाली पेंशन और वेतन नेपाल की जीडीपी में लगभग 1.5% से 3% का योगदान देता है। विशेष रूप से ग्रामीण नेपाल (जैसे पोखरा, स्यांगजा, गुल्मी) की अर्थव्यवस्था भारतीय सैन्य पेंशन पर बहुत निर्भर रही है। भर्ती रुकने से नेपाल के ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक संकट बढ़ा है।
