एक्सप्लेनर्स

फाइटर प्लेन के लिए क्यों अहम है 'सोर्स कोड'? जानें मिसाइल लगाने से लेकर उसके अपग्रेडेशन में क्या है इसकी भूमिका

फ्रांस की कंपनी डसाल्ट एविएशन ने राफेल को बनाया है। भारत के कहने पर उसने राफेल में भारतीय मिसाइलों जैसे बियोंड विजुअल रेंज एयर टू एयर मिसाइल अस्त्र मार्क-1 और स्मार्ट एंटी-एयरफील्ड वेपन लगाए हैं लेकिन किसी अभियान या मिशन के दौरान भारत राफेल में कोई नया हथिया लगाना चाहे तो यह संभव नहीं है। सोर्स कोड न होने की वजह से राफेल में हथियार लगाने या सेट करने का काम फ्रांस की कंपनी डसाल्ट ही करेगी।

Image

फाइटर प्लेन में 'सोर्स कोड' का काफी अहम रोल होता है।

What is Source Code of a fighter Jet : ऑपरेशन सिंदूर के बाद इन दिनों सोर्स कोड की भी बहुत चर्चा हो रही है। सोर्स कोड यानी फाइटर प्लेन का सोर्स कोड। कहा जा रहा है कि राफेल में अपनी मिसाइलें लगाने के लिए भारत ने फ्रांस से सोर्स कोड मांगा था लेकिन उसने इसे देने से इंकार कर दिया। सवाल है कि आखिर ये सोर्स कोड होता क्या है। 'सोर्स कोड' किसी फाइटर प्लेन का कंप्यूटर प्रोग्राम होता है। यह सोर्स कोड फाइटर प्लेन के लिए एक इंस्ट्रक्शन के रूप में काम करता है। यह फाइटर प्लेन के संवेदनशील ऑपरेशन एवं फंक्शन को नियंत्रित करता है। मतलब यदि किसी फाइटर प्लेन के रडार में किसी तरह का बदलाव करना है या उसमें कोई नया हथियार लगाना है तो यह 'सोर्स कोड' से ही संभव है। बिना 'सोर्ड कोड' के फाइटर जेट में मिसाइल या कोई हथियार नहीं लग सकता और न ही फाइटर प्लेन को अपग्रेड किया जा सकता है। यह सब करने के लिए फाइटर प्लेन के सोर्स कोड की जरूरत होती है।

सोर्स कोड होने पर ही फाइटर में लगते हैं हथियार

फ्रांस की कंपनी डसाल्ट एविएशन ने राफेल को बनाया है। भारत के कहने पर उसने राफेल में भारतीय मिसाइलों जैसे बियोंड विजुअल रेंज एयर टू एयर मिसाइल अस्त्र मार्क-1 और स्मार्ट एंटी-एयरफील्ड वेपन लगाए हैं लेकिन किसी अभियान या मिशन के दौरान भारत राफेल में कोई नया हथिया लगाना चाहे तो यह संभव नहीं है। सोर्स कोड न होने की वजह से राफेल में हथियार लगाने या सेट करने का काम फ्रांस की कंपनी डसाल्ट ही करेगी। भारत चाह कर भी खुद उसमें कोई हथियार लगा नहीं सकता और न ही कोई बदलाव कर सकता है। राफेल में यदि ब्रह्मोस लगाना है तो इसके लिए डसाल्ट एविएशन से रिक्वेस्ट करना होगा लेकिन यह जरूरी नहीं कि आप कहें और वह लगा दे। वह इसमें देरी कर सकता है। एक तरीके से यह वही बात है कि आपके पास हथियार है लेकिन अपनी मर्जी से चला नहीं सकते।

us

us

IAF 1980 से उड़ा रही मिराज-2000

फ्रांस तो भारत का बहुत करीबी और सहयोगी देश माना जाता है। संकट के समय वह भारत का साथ देता आया है। रक्षा संबंध भी उसके साथ पुराने हैं तो फिर वह ऐसा क्यों कर रहा है। बात सही है, भारत और फ्रांस के बीच रक्षा सहयोग दशकों पुराना है। भारतीय वायुसेना में मिराज-2000 की पूरी फ्लीट फ्रांस से आई है। भारत ने इन फाइटर जेट्स को 1980 के दशक में फ्रांस से खरीदा था तब से लेकर दोनों देशों में रक्षा सहयोग चला आ रहा है। हैरान करने वाली बात यह भी है कि भारतीय वायु सेना चार दशकों से ज्यादा समय से मिराज उड़ा रही है लेकिन फ्रांस ने आज तक मिराज का सोर्स कोड नहीं दिया। ऐसे में मिराज में बहुत कम मात्रा में भारतीय हथियार लग पाते है।

miraz

miraz

भारत के पास एक से एक बेहतरीन मिसाइलें

चलिए मान लेते हैं कि 1980 के दशक से लेकर बाद के कुछ दशकों तक भारत के पास फाइट प्लेन में लगाने के लायक मिसाइलें नहीं थीं लेकिन अब तो एक दो नहीं दर्जन भर ऐसी मिसाइलें हैं जो मिराज या राफेल में लगाई जा सकती हैं। भारत की ये मिसाइलें ऐसे हवा में नहीं बनाई गई हैं बल्कि अपने दुश्मन देशों को ध्यान में रखकर बनाई गई हैं। ऐसे में जरूरी है कि भारत के जो आधुनिक फाइटर प्लेन हैं उनमें ये हथियार लगें। अगर नहीं लगेंगे तो ये हथियार किस काम के, भारी भरकम पैसा खर्च करके ये फाइटर प्लेन 26 जनवरी की परेड केवल उड़ाने के लिए तो खरीदे नहीं गए हैं।

अमेरिका, फ्रांस, स्वीडन बेचना चाहते हैं अपना फाइटर

दरअसल, सोर्स कोड न देने की वजह जो हमें नजर आती है, वह है फ्रांस, अमेरिका सहित पश्चिमी देशों का हथियार बनाने का दबदबा हथियारों का बाजार बहुत बड़ा है और भारत उसका एक बाजार है। फाइटर प्लेन की कीमत बहुत ज्यादा होती है। वे फाइटर प्लेन बेचकर भी उसकी असली चाबी अपने पास रखना चाहते हैं। दूसरा उनको लगता है कि टेक्नॉलजी और सोर्स कोड का ट्रांसफर करने से उनकी महारथ चली जाएगी। अमेरिका अपना पांचवीं पीढ़ी का एफ-35 बेचना चाहता है, फ्रांस राफेल, यूरोपीय यूनियन अपना यूरो फाइटर और स्वीडन अपना ग्रिपेन भारत को बेचना चाहता है। ये सभी बेचना चाहते हैं लेकिन न तो टेक्नॉलजी ट्रांसफर करेंगे और न ही सोर्स कोड देंगे। बड़ा सवाल यह है कि बिना सोर्स कोड के भारतीय मिसाइलें इन उन्नत और स्टील्थ फीचर वाले फाइटर प्लेन में कैसे लगेंगी। इनकी मिसाइलों से बेहतर और किफायती मिसाइलें भारत के पास मौजूद हैं। पश्चिमी देश अपनी मिसाइलों के लिए ऊंची कीमत वसूलते हैं। जब इनसे उम्दा, ज्यादा मारक, सटीक क्षमता और कम लागत वाली मिसाइलें भारत के पास उपलब्ध हैं तो वह मोटा पैसा देकर इनकी मिसाइलें क्यों ले।

gripen

gripen

SU-57E को भारत में बनाने की पेशकश कर चुका है रूस

बस रूस ही है जो अपना पांचवी पीढ़ी का फाइटर प्लेन एसयू-57ई भारत में बनाना और 100 प्रतिशत टेक्नॉलजी ट्रांसफर करने की पेशकश कर चुका है। उसने तो यह भी कहा है कि भारत जो अपना पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान एडवांस्ड मल्टीरोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी अमका बना रहा है, उसके विकास में यानी उसके इंजन, एवियोनॉइक्स, रडार और स्टील्थ फीचर में मदद करेगा। पश्चिमी देशों की इसी रवैये की वजह से विदेश मंत्री एस जयशंकर उन्हें सुनाते रहते हैं। आप भारत को जो चाहिए वो देंगे नहीं और उम्मीद करेंगे कि जरूरत पड़ने पर वह आपकी मदद कर। रिश्ता पारस्परिक होता है। यानी दो कदम आप चलेंगे तो दो कदम हम चलेंगे। आप यह उम्मीद नहीं कर सकते कि आप चलें भी नहीं और हम दौड़कर आपके पास आ जाएं। आप तकनीक-हथियार नहीं देंगे तो कोई और देगा, सब पैसे का खेल है। देश भारत की शर्तों पर हथियार और तकनीक देने के लिए तैयार बैठे हैं।

plane

plane

राफेल-M का सौदा रद्द कर सकता है भारत

पांचवीं पीढ़ी के फाइटर के लिए एक तरफ अमेरिका है तो एक तरफ रूस है। पांचवीं पीढ़ी का फाइटर प्लेन भारत को यदि खरीदना है तो यही दो देश विकल्प हैं। भारत या तो अमेरिकी F-35 खरीदे या रूस का SU-57E अमेरिका अपना फाइटर प्लेन बेच तो देगा लेकिन टेक्नॉलजी ट्रांसफर नहीं करेगा। वह 'मेक इन इंडिया' भी नहीं करेगा। दूसरा वह इतने नियम-कानून और शर्तें थोप देगा कि इसे अपनी मनमर्जी से ऑपरेट करना मुश्किल हो जाएगा। पांचवीं पीढ़ी का फाइटर प्लेन खरीदना भारत के लिए जरूरत बन गया है लेकिन सोर्स कोड को लेकर फ्रांस ने जो रवैया दिखाया है उसके बाद रक्षा सौदे को लेकर भारत उससे दूरी बना सकता है। रिपोर्टें तो ऐसी भी हैं कि अपनी नौसेना के लिए भारत ने जो 26 राफेल-एम का सौदा फ्रांस से किया है, उसे रद्द भी कर सकता है। अगर ऐसा हुआ तो फ्रांस के लिए यह बहुत बड़ा झटका होगा और यह भी हो सकता है कि भारत 5वीं पीढ़ी के लिए रूस के SU-57 को चुन ले।

Alok Rao
आलोक कुमार रावauthor

19 वर्षों से मीडिया जगत में सक्रिय आलोक राव ने प्रिंट, न्यूज एजेंसी, टीवी और डिजिटल चारों ही माध्यमों में काम किया है। इस लंबे अनुभव ने उन्हें समाचारों की समझ, प्रेजेंटेशन, डिटेलिंग और न्यूजरूम डायनेमिक्स में असाधारण दक्षता प्रदान की है। राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों में विशेष रुचि रखने के साथ-साथ जियो-पॉलिटिक्स एवं डिफेंस की स्टोरीज में इनकी खासी दिलचस्पी है। आलोक ने अलग-अलग माध्यमों में काम करते हुए समाचारों की समझ, प्रस्तुति और विश्लेषण में मजबूत दक्षता विकसित की है और अब तक 25,000 से अधिक आर्टिकल तैयार कर चुके हैं। तथ्यों की गहन जांच, मजबूत न्यूज सेंस और तेज निर्णय क्षमता उनकी पत्रकारिता की प्रमुख खासियतें हैं।

और पढ़ें
End of Article