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RBI की महंगाई से लड़ाई, पिटाई आपके जेब की! क्या है रेपो रेट, CPI और EMI का कनेक्शन?

महंगाई बढ़ती है, तो आम आदमी सरकार से राहत चाहता है। लेकिन, होता उल्टा है। RBI अक्सर महंगाई से लड़ाई में रेपो रेट बढ़ा देता है, जिससे EMI का बोझ बढ़ जाता है। आखिर ऐसा क्यों किया जाता है?

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बढ़ती महंगाई बढ़ाएगी EMI का बोझ
Authored by: यतींद्र लवानिया
Updated Oct 5, 2026, 12:18 IST
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RBI Repo Rate, CPI and EMI : अक्सर आम लोगों को यह समझ नहीं आता है कि आखिर उनकी जेब पर EMI का बोझ बढ़ाकर कैसे महंगाई कम की जाती है? क्योंकि, जब भी महंगाई RBI टारगेट और टोलरेंस बैंड से बाहर जाती है, तो महंगाई पर होने वाले वार का भार बढ़ी हुई EMI के तौर पर आम आदमी के जेब पर पड़ता है। ऐसा क्यों होता है, समझते हैं, महंगाई, रेपो रेट और EMI का पूरा खेल।

क्या होती है महंगाई?

महंगाई को हम अक्सर वस्तुओं और सेवाओं के लिए ज्यादा कीमत चुकाने के तौर पर देखते हैं और कहते हैं कि चीजें महंगी हो गई हैं। हालांकि, इसका दूसरा पहलू यह भी है कि आपके पास जो मुद्रा है, असल में वस्तुओं की तुलना में उसका अवमूल्यन हो गया है। इसका मतलब हुआ कि पहले आपके पास जिस 100 रुपये की क्रय शक्ति पूरी 100 रुपये की थी, वह घट गई है। इस तरह की स्थिति आने पर रोजमर्रा की हर चीज आपको महंगी लगने लगती है, क्योंकि आपकी उन्हें खरीदने की क्षमता घट जाती है।

क्यों बढ़ती है महंगाई?

महंगाई बढ़ने के पीछे अर्थशास्त्र का बुनियादी डिमांड और सप्लाई का सिद्धांत काम करता है। जब वस्तुओं और सेवाओं की डिमांड बढ़ती है, लेकिन सप्लाई कम होती है, तो महंगाई बढ़ने लगती है। मसलन, आप पहले 40 रुपये किलो चीनी खरीदते थे। लेकिन, अलग-अलग वजहों से गन्ने की डिमांड बढ़ गई, जिससे चीनी का उत्पादन घट गया। चूंकि अब चीनी सप्लाई कम है और डिमांड पहले जितनी है, तो जाहिर है लोग इसके लिए ज्यादा कीमत चुकाने को तैयार हो जाएंगे। महंगाई बढ़ने के पीछे वस्तुओं के उत्पादन से लेकर उनकी सप्लाई चेन और टैक्स जैसे फैक्टर होते हैं, जो तय करते हैं कि आप तक पहुंचने तक कीमत क्या होगी।

महंगाई से रेपो रेट का क्या रिश्ता?

महंगाई बढ़ने के पीछे एक और वजह होती है पर्याप्त या जरूरत से ज्यादा कैश और लिक्विडिटी होना। असल में जब सिस्टम में पर्याप्त या जरूरत से ज्यादा नकदी होती है, तो लोग वस्तुओं को महंगे दाम पर भी खरीदने लगते हैं, क्योंकि कैपिटल कॉस्ट कम रहती है। इस चेन को तोड़ने के लिए रिजर्व बैंक को रेपो रेट यानी नीतिगत ब्याज दरों को बढ़ाना पड़ता है। जब रेपो रेट बढ़ती है, तो यह बैंकों से लेकर आम आदमी तक पूंजी की पहुंच को सीमित और महंगी कर देती है। आसान शब्दों में कहें तो इकोनॉमी का बड़ा हिस्सा कर्ज पर चल रहा है। जब कर्ज महंगा होता है, तो पूंजी का प्रवाह भी कम होता है, जिससे आखिर में रुपये की सप्लाई कम होती है।

कैसे रेपो रेट से कम होती है महंगाई?

इकोनॉमी मांग और आपूर्ति के दो पहलुओं पर चलती है। रिजर्व बैंक का काम इन दोनों पहलुओं में मौद्रिक नीति के जरिये संतुलन बनाए रखना है। चूंकि, हर चीज के लिए पूंजी और मुद्रा की जरूरत होती है। ऐसे में रिजर्व बैंक एक-एक चीज की कीमत को तय करने की जगह मुद्रा के प्रावह को नियंत्रित करता है, जिससे सहज रूप से महंगाई और मंदी के बीच संतुलन बना रहता है। जब महंगाई बढ़ती है, तो इसका मतलब होता है कि मुद्रा या पूंजी की सप्लाई बढ़ गई है। रिजर्व बैंक इस सप्लाई को रेपो रेट से घटा देता है।

आलू बनाम रुपया

इसे एक उदाहरण से समझ सकते हैं। एक किसान है, जिसने आलू की फसल पैदा की है। वह इस फसल को बचेकर रुपये चाहता है। जब वह बाजार में जाता है, तो कई लोग उससे आलू खरीदना चाहते हैं और वह सबसे ज्यादा दाम देने वाले को आलू बेच देता है। वहीं, जब वह दूसरी बार जाता है, तो उतने खरीदार नहीं मिलते हैं। इसके चलते वह रुपये की तुलना में अपने आलुओं की कीमत घटाने को मजबूर हो जाता है। इसका मतलब हुआ कि आलू की सप्लाई तो पहले जितनी ही थी, लेकिन रुपये की सप्लाई कम हो गई, जिससे आलू की तुलना में रुपये की क्रय शक्ति बढ़ गई।

रिजर्व बैंक बढ़ा सकता है ब्याज दर

रिजर्व बैंक बढ़ा सकता है ब्याज दर

क्या करता है CPI?

CPI यानी कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स को आसान भाषा में आम लोगों के इस्तेमाल की चीजों और सेवाओं की कीमतों में बदलाव का पैमाना कह सकते हैं। इसमें खाने-पीने की चीजों से लेकर कपड़े, घर, ईंधन और सेवाएं शामिल होती हैं। जब CPI इन्फ्लेशन बढ़ता है, तो इसका मतलब यह होता है कि एक सामान्य कंज्यूमर बास्केट की कीमतें पिछले साल की तुलना में तेज रफ्तार से बढ़ रही हैं। यही रिटेल इन्फ्लेशन यानी खुदरा महंगाई है, जिसके आधार पर RBI की MPC का फोकस रहता है।

क्या है RBI का महंगाई पर लक्ष्य?

भारत में RBI का मीडियम टर्म इन्फ्लेशन टार्गेट 4% है, जबकि टोलरेंस बैंड 2% से 6% है। अगस्त 2026 में रिटेल इन्फ्लेशन 4.82% पहुंच गया यानी महंगाई अब रिजर्व बैंक के लक्ष्य से ऊपर है। हालांकि, अभी 6% की उपर टोलरेंस लिमिट के भीतर है। इसका मतलब है कि महंगाई उस सीमा तक पहुंच चुकी है, जहां से RBI इसके लिए चिंतित हो सकता है। इसके अलावा पॉलिसी रेट के जरिये आने वाले दिनों में महंगाई को और बढ़ने से रोकने के कदम उठा सकता है।

अभी क्यों चर्चा में यह मुद्दा?

देश में फिलहाल महंगाई (CPI) लगातार रिजर्व बैंक की टारगेट रेंज यानी 4% से ऊपर है। फिलहाल, 5 से 7 अक्टूबर के बीच रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक हो रही है। 7 अक्टूबर को रिजर्व बैंक MPC रेपो रेट पर अपना फैसला देगी। चूंकि, महंगाई लगातार ऊंची बनी हुई है। ऐसे में कयास लगाए जा रहे हैं कि इकोनॉमी को वैश्विक परिदृश्य में प्रतिस्पर्धी बनाए रखने के लिए रिजर्व बैंक ब्याज दर (Repo Rate) को 25 आधार अंक बढ़ा सकती है।

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