Women Reservation Bill: भारत की राजनीति में इस समय महिलाओं के हक को लेकर बहस तेज है। महिला आरक्षण को लेकर देश में नई सुगबुगाहट शुरू जरूर हुई लेकिन सरकार को बड़ा झटका लगा और महिला आरक्षण कानून और डीलिमिटेशन से जुड़ा 131वां संवैधानिक संशोधन विधेयक लोकसभा में गिर गया। विधेयक पर वोटिंग के दौरान पक्ष में 298 वोट पड़े, जबकि विरोध में 230 सांसदों ने वोट दिया। वहीं, सदन में मौजूद कुल 528 सदस्यों में से बिल को पास कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत यानी 352 वोटों की जरूरत थी बीते 12 सालों में ऐसा पहली बार हुआ जब केंद्र की मोदी सरकार द्वारा पेश किया गया कोई संवैधानिक संशोधन विधेयक सदन में पारित नहीं हो सका। विपक्ष जहां इसे बड़ी जीत की तरह देख रहा है,वहीं मोदी सरकार का कहना है कि वो देशभर में इस बात को बताएगी कि विपक्ष आधी आबादी को उसका हक ही नहीं देना चाहती। इस बीच, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को अपने पुराने अंदाज में देश के नाम अपना संबोधन दिया। इसकी शुरुआत में ही उन्होंने देश की आधी आबादी से हाथ जोड़कर माफी मांगी। इसके बाद उन्होंने विपक्ष को आड़े हाथों लेना शुरू किया। करीब 40 मिनट के अपने संबोधन में पीएम मोदी ने चार दलों कांग्रेस, डीएमके, टीएमसी और समाजवादी पार्टी का बार-बार जिक्र कर बिल के पारित न होने के लिए पूरी तरह जिम्मेदार ठहराया। इसके साथ ही उन्होंने पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु का भी जिक्र किया, ये दोनों वही राज्य हैं जहां आगामी 23 और 29 अप्रैल को मतदान होना है।
देश के नाम संबोधन में क्या बोले पीएम मोदी?
महिला आरक्षण के मुद्दे पर देश के नाम अपने संबोधन में पीएम मोदी ने विपक्ष पर खूब तंज कसा। उनके पुराने कारमाने याद दिलाए खास तौर पर कांग्रेस को। उन्होंने कांग्रेस पर हर मुद्दे को लटकाने का आरोप लगाया। पीएम मोदी ने कहा कि कांग्रेस, डीएमके, टीएमसी और समाजवादी पार्टी जैसे दलों की स्वार्थी राजनीति का नुकसान देश की नारी शक्ति को उठाना पड़ा है। कल देश की करोड़ों महिलाओं की नजर संसद पर थी। देश की नारी शक्ति देख रही थी। मुझे भी यह देखकर दुख हुआ कि जब नारी हित का प्रस्ताव गिरा तो कांग्रेस, डीएमके, टीएमसी, सपा जैसी परिवारवादी पार्टियां खुशी से तालियां बजा रही थीं। महिलाओं के अधिकार छीनकर ये लोग मेजें थपथपा रहे थे?
इसे भी पढ़ें- नारी शक्ति वंदन विधेयक की राह आसान या सियासी गणित में फंसेगा मामला? संसद में पक्ष-विपक्ष का संख्याबल क्या?
डीएमके,तृणमूल, सपा के पास मौका था...
चुनावी राज्यों का जिक्र कर पीएम मोदी ने कहा कि यह संशोधन विधेयक सभी दलों के लिए अपनी छवि सुधारने का एक मौका था। अगर यह पारित होता तो तमिलनाडु,बंगाल,यूपी सभी राज्यों की सीटें बढ़तीं,लेकिन अपनी स्वार्थी राजनीति के लिए इन राज्यों ने अपने लोगों को भी धोखा दे दिया। डीएमके के पास मौका था कि वह और ज्यादा तमिल लोगों को सांसद बना सकती थी और तमिल लोगों की आवाज मजबूत कर सकती थी। टीएमसी के पास भी बंगाल के लोगों को आगे बढ़ाने का मौका था,लेकिन उन्होंने यह मौका गंवा दिया। इसी तरह पीएम मोदी ने सपा का भी जिक्र किया और कहा कि वो इस बिल का समर्थन करके अपनी महिला विरोधी होने का अपना दाग धुल सकती थी, लेकिन उन्होंने भी मौका गंवा दिया। पीएम ने कहा कि यूपी सहित देश की महिलाएं इसे कभी नहीं भूलेंगी।
क्या गिरने के लिए ही पेश किया गया था विधेयक?
बिल पेश करने से पहले ही भाजपा को मालूम था कि इसे पास कराने के लिए उन्हें दो तिहाई बहुमत की आवश्यकता पड़ेगी, लेकिन उसे हासिल करने के लिए सत्ताधारी गठबंधन ने कोई विशेष प्रयास ही नहीं किया। राजनीतिक विश्लेषकों का और विपक्ष का कहना है कि भाजपा असल में महिला आरक्षण के सहारे परिसीमन को लागू कराना चाहती थी, लेकिन इसके लिए भी उन्होंने विपक्ष को भरोसे में नहीं लिया। सरकार की तैयारियों को अगर देखें तो यह दिखता है कि इसके लिए भारतीय जनता पार्टी उन तैयारियों के साथ नहीं आई थी, जो वह आमतौर पर किसी बड़े मुद्दे पर कानून बनाने के लिए करती है फिर चाहे वह तीन-तलाक का मुद्दा हो या जम्मू-कश्मीर से धारा 370 को हटाने का। कई बड़े वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अगर सरकार इस दिशा में असल में काम करना चाहती थी को वह 2023 में इसके पारित होने के बाद 2024 से इस पर काम कर सकती थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
पीएम मोदी ने DMK-TMC, कांग्रेस और सपा का ही नाम क्यों लिया?
पीएम मोदी के संबोधन को सुनने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि क्या सिर्फ इन्हीं चार दलों के कारण ही लोकसभा में नारी शक्ति वंदन विधेयक 2026 गिर गया? इसका जवाब जानने से पहले ये जानना जरूरी है कि लोकसभा में इन दलों के कितने सांसद हैं और किसी विधेयक को पारित होने से रोकने के लिए ये दल कितने ताकतवर हैं तो हम आपको बता दें कि संसद के निचले सदन यानी लोकसभा में समाजवादी पार्टी के 37, तृणमूल कांग्रेस के 28,द्रमुक (DMK) के 22 और कांग्रेस के 98 सांसद हैं। इस संख्या को देखें तो यह साफ हो जाता है कि लोकसभा में विपक्षी दलों में ये चार दल सबसे बड़े दलों में शामिल हैं। ऐसे में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और डीएमके जैसे बड़े दल इस पूरे समीकरण में अहम भूमिका निभाते हैं। ये पहले से ही साफ था कि इन दलों का रुख ही तय करेगा कि विधेयक की राह आसान होगी या मुश्किल।
क्या शिकस्त को भी भुनाना चाहती है भाजपा?
हालांकि अब जब लोकसभा में यह बिल गिर गया है तो भाजपा का आगे का क्या कदम होगा इस पर सबकी नजर है। पीएम मोदी ने भी अपने संबोधन में भविष्य के संकेत दे दिए है। उन्होंने चुनावी राज्यों के जिक्र के साथ ही यह कहकर कि भले ही संसद में वे जरूरी मत प्रतिशत नहीं हासिल कर सके हैं, लेकिन देश की नारियां उन्हें अपना पूरा आशीर्वाद देंगी। पीएम ने यह भी कहा कि हम महिला आरक्षण के रास्ते में आने वाली हर रुकावट को खत्म करके रहेंगे। हमारा हौसला बुलंद है,आगे और मौके आएंगे बस हमें वक्त का इंतिजार है। पीएम मोदी के संबोधन को देखें तो यह झलकता है कि भाजपा इस शिकस्त को भी भुनाने में लग गई है और इसकी शुरुआत भी हो गई है। पीएम मोदी का आज का देश के नाम संबोधन भी उसी का एक हिस्सा दिखता है।
चुनाव में मिलेगा फायदा?
चुनावी राज्यों की बात करें तो पश्चिम बंगाल में टीएमसी, तमिलनाडु में डीएमके सत्ताधारी दल है। वहीं, यूपी में सपा मुख्य विपक्षी पार्टी है, हालांकि वहां अभी चुनाव दूर हैं। ऐसे में अब भाजपा देश के आम जनमानस के मन में यह नैरेटिव सेट करके कि विपक्ष नारी विरोधी है, का फायदा हालिया तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव और अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में उठाना चाहेगी।