Towards Equality Report: महिला आरक्षण (Womens Reservation) के लिए भूमिका कई साल पहले ही बननी शुरू हो गई थी। 'टुवर्ड्स इक्वालिटी' रिपोर्ट भारतीय इतिहास का वह दस्तावेज है जिसने आज के 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' और महिला सशक्तिकरण के कई कानूनों की नींव रखी थी।आज हम जिस 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' (महिला आरक्षण बिल) को हकीकत बनते देख रहे हैं, उसका वैचारिक बीज 1974 की इसी रिपोर्ट में बोया गया था। यह रिपोर्ट आज भी नीति निर्माताओं के लिए एक मार्गदर्शिका की तरह है।
साल 1974 में एक ऐसी रिपोर्ट आई जिसने सरकार और समाज दोनों को आईना दिखाया। 'टुवर्ड्स इक्वालिटी' सिर्फ पन्नों का पुलिंदा नहीं था, बल्कि यह आजाद भारत में महिलाओं की दयनीय स्थिति का वो सच था जिसे अब तक अनदेखा किया गया था।
क्या थी Towards Equality Report?
1971 में भारत सरकार ने 'महिलाओं की स्थिति पर राष्ट्रीय समिति' (CSWI) का गठन किया था। इस समिति ने 1974 में अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसे 'टुवर्ड्स इक्वालिटी' नाम दिया गया। 'टुवर्ड्स इक्वालिटी' (Towards Equality) रिपोर्ट कोई साधारण रिपोर्ट नहीं थी; इसे भारतीय महिलाओं के अधिकारों का 'मैग्ना कार्टा' कहा जाता है। भारत सरकार ने 1971 में 'महिलाओं की स्थिति पर राष्ट्रीय समिति' (Committee on the Status of Women in India) बनाई थी। इसे बनाने का मकसद आजादी के लगभग इतने साल बाद यह जानना था कि भारतीय महिलाओं की संवैधानिक, प्रशासनिक और सामाजिक स्थिति वास्तव में कैसी है। इस समिति की अध्यक्ष डॉ. फूलरेणु गुहा थीं और सदस्य सचिव प्रसिद्ध शिक्षाविद् वीणा मजूमदार थीं।
Towards Equality Report kya hai
Towards Equality Report की क्यों पड़ी जरूरत?
संयुक्त राष्ट्र ने 1975 को 'अंतर्राष्ट्रीय महिला वर्ष' घोषित करने का निर्णय लिया था। इससे पहले भारत सरकार यह जानना चाहती थी कि संवैधानिक बराबरी के वादों के बावजूद महिलाएं असल में कहां खड़ी हैं।
'समान काम के लिए समान वेतन'
समिति ने पाया कि 'समान काम के लिए समान वेतन' केवल कागजों पर था। कृषि और असंगठित क्षेत्रों में महिलाओं का शोषण चरम पर था। रिपोर्ट ने साफ किया कि केवल कानून बना देने से समानता नहीं आती, उसे लागू करने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति चाहिए।
महिलाओं की राजनीति में भागीदारी
इस रिपोर्ट ने तर्क दिया कि जब तक महिलाएं नीति निर्धारण का हिस्सा नहीं बनेंगी, उनके हालात नहीं सुधरेंगे। यहीं से पंचायतों में आरक्षण की चर्चा शुरू हुई, जो अंततः 1992 के 73वें और 74वें संशोधन के रूप में सामने आई।
भारत में 'दूसरे चरण का नारीवाद'
इस रिपोर्ट के आने के बाद भारत में 'दूसरे चरण का नारीवाद' शुरू हुआ। दहेज विरोधी कानून, बलात्कार विरोधी कानून और घरेलू हिंसा जैसे मुद्दों पर महिलाओं ने संगठित होकर आवाज उठाना शुरू किया।
1974 में 480 पन्नों की रिपोर्ट आई, और नतीजे चौंकाने वाले थे
चौंका दिया था Towards Equality Report के खुलासों ने
कमेटी ने 2 साल देशभर में घूमकर डेटा जुटाया। 1974 में 480 पन्नों की रिपोर्ट आई, और नतीजे चौंकाने वाले थे-
घटती जनसंख्या: 1901 में 1000 पुरुषों पर 972 महिलाएं थीं, 1971 में घटकर 930 रह गईं। यानी विकास के बावजूद महिलाओं की स्थिति बिगड़ रही थी।
शिक्षा में भारी गैप: महिलाओं की साक्षरता दर सिर्फ 18.7% थी, पुरुषों की 39.5%
काम में भागीदारी घटी: 1911 में 33.7% महिलाएं वर्कफोर्स में थीं, 1971 में सिर्फ 11.9% रह गईं
कानून सिर्फ कागज़ पर: दहेज, बाल-विवाह, बराबर वेतन जैसे कानून तो थे, पर ज़मीन पर लागू नहीं हो रहे थे
राजनीति से गायब: पंचायत से संसद तक महिलाओं की भागीदारी न के बराबर थी
घटती जनसंख्या और शिक्षा में भारी गैप
Towards Equality Report की मुख्य सिफारिशें-
राजनीति और फैसले लेने में भागीदारी
पंचायत-नगरपालिका में आरक्षण: स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए सीटें रिजर्व की जाएं। इसी सिफारिश के 18 साल बाद 1992 में 73वां-74वां संशोधन आया और 33% आरक्षण मिला।
राजनीतिक दलों में कोटा: पार्टियों को टिकट बंटवारे में महिलाओं को जगह देने को कहा गया।
प्रशासन में भागीदारी: नीति बनाने वाली समितियों और बोर्ड में महिलाओं की अनिवार्य मौजूदगी।
शिक्षा में बराबरी
- लड़कियों के लिए खास स्कीम: मुफ्त शिक्षा, छात्रवृत्ति, हॉस्टल और मिड-डे मील ताकि ड्रॉपआउट रुके।
- पाठ्यक्रम बदला जाए: किताबों से लैंगिक भेदभाव हटे। लड़की-घर, लड़का-बाहर वाला नैरेटिव खत्म हो।
- प्रौढ़ शिक्षा: बड़ी उम्र की महिलाओं के लिए पढ़ाई के विशेष कार्यक्रम।
रोजगार और आर्थिक स्थिति
- बराबर काम, बराबर वेतन: Equal Remuneration Act को सख्ती से लागू किया जाए। ये कानून 1976 में बना।
- महिलाओं के लिए काम: सरकारी नौकरियों और ट्रेनिंग में महिलाओं को प्राथमिकता।
- असंगठित क्षेत्र: घरेलू कामगार, खेतिहर मजदूर महिलाओं के लिए सामाजिक सुरक्षा और न्यूनतम वेतन।
- मैटरनिटी बेनिफिट: कामकाजी महिलाओं के लिए मातृत्व अवकाश और क्रेच की सुविधा।
कानून और सामाजिक सुधार
- दहेज कानून सख्त हो: Dowry Prohibition Act 1961 को और धारदार बनाया जाए। दहेज से हुई मौत पर अलग से सजा।
- बाल-विवाह रोके जाएं: शादी की उम्र लड़कियों के लिए 18 साल सख्ती से लागू हो।
- संपत्ति का अधिकार: बेटियों को पिता की संपत्ति में बेटों जैसा हक मिले। ये 2005 में Hindu Succession Act संशोधन से हुआ।
- पारिवारिक कानून एक जैसे हों: सभी धर्मों के लिए शादी, तलाक, गुजारा भत्ता के नियमों में समानता लाई जाए।
- बलात्कार कानून में बदलाव: पीड़िता की सहमति का मतलब साफ हो और मुकदमे में पीड़िता को न घसीटा जाए।
स्वास्थ्य और परिवार नियोजन
महिलाओं का स्वास्थ्य प्राथमिकता: सिर्फ बच्चे पैदा करने की मशीन न समझा जाए। एनीमिया, मातृ-मृत्यु दर घटाने पर फोकस।
परिवार नियोजन महिला की मर्ज़ी: नसबंदी का टारगेट पुरुषों पर भी हो, सिर्फ महिलाओं पर नहीं।
ग्रामीण स्वास्थ्य: हर गांव तक प्राइमरी हेल्थ सेंटर और महिला डॉक्टर।
संस्थागत बदलाव
राष्ट्रीय महिला आयोग: महिलाओं की स्थिति पर नज़र रखने और सरकार को सलाह देने के लिए एक स्थायी बॉडी बने। ये 1992 में बना।
महिला एवं बाल विकास विभाग: महिलाओं के मुद्दे अलग मंत्रालय देखें। ये 1985 में बना।
Women's Studies सेंटर: यूनिवर्सिटीज में महिलाओं पर रिसर्च को बढ़ावा दिया जाए।
डेटा कलेक्शन: जनगणना और NSSO सर्वे में महिलाओं से जुड़ा डेटा अलग से और बेहतर तरीके से जुटाया जाए।
मीडिया और सोच में बदलाव
विज्ञापनों पर लगाम: मीडिया में महिलाओं को सिर्फ वस्तु की तरह दिखाने पर रोक लगे।
जागरूकता अभियान: टीवी, रेडियो से दहेज, बाल-विवाह के खिलाफ कैंपेन चलें।
'टुवर्ड्स इक्वालिटी' 1974 की रिपोर्ट ने सिर्फ समस्याएं नहीं गिनाईं, बल्कि उन्हें ठीक करने के लिए 200+ ठोस सिफारिशें भी दीं। ये सिफारिशें ही आगे चलकर भारत में महिला नीतियों की नींव बनीं।
